श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थानीय 'जीव', सभी अग्नि स्थानीय सर्व-उपादान भगवान्से शक्ति प्राप्तकर अपना-अपना पृथक् परिचय देते हैं; इसलिये भगवान् ही सबके उपादान हैं।" जगत्का उपादान कहकर जिस 'प्रधान' को स्थिर किया जाता है, उस प्रधानमें भगवान्के द्वारा प्रदत्त उपादानसे ही उसका इस प्रकार परिचय है। 'प्रधान' का उपादानत्व भगवान्से स्वतन्त्र विषय नहीं हो सकता। उपादानके मूलाश्रय श्रीकृष्णको भूलकर सांख्यवादियोंका प्रकृतिमें उपादानत्व आरोप करना-बकरेके गलेमें स्थित स्तनाकृति-मांसपिण्डकी दूध देनेमें असमर्थताके समान निष्फल प्रयास मात्र है॥५९-६१॥ श्रीनारायण ही निमित्त कारण :- माया-अंशे कहि तारे निमित्त-कारण। सेइ नहे, याते कर्त्ता-हेतु-नारायण॥६२॥ मूल-परिचालक विभु-चैतन्य भगवान् :- घटेर निमित्त-हेतु यैछे कुम्भकार। तैछे जगतेर कर्त्ता-पुरुषावतार ॥६३॥ मायाके द्वारा श्रीकृष्णकी जगत्की सृष्टि :- कृष्ण-कर्त्ता, माया ताँर करेन सहाय। घटेर कारण-चक्र-दण्डादि उपाय॥६४॥ अनुवाद-'माया' अंशसे जिसे निमित्त कारण कहा जाता है, वह भी सत्य नहीं है, क्योंकि नारायण ही वास्तविक निमित्त-कारण हैं। कुम्हार जैसे घटका निमित्त-कारण है, वैसे ही प्रथम पुरुषावतार ही जगत्के निमित्त कारण हैं। श्रीकृष्ण ही जगत्के सृष्टिकर्त्ता हैं। इस कार्यमें माया केवल उनकी सहायिका है, जैसे चक्र-दण्डादि घट निर्माणमें उपाय (सहायक) हैं॥६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय 'ब्रह्मधाम' है और उसके बाहर 'कारणसमुद्र' है। चिन्मय जगत् कारण-शून्य है अर्थात् उसका कोई कारण नहीं है और माया कारणमयी है। इन दोनोंके मध्यवर्ती-स्थलको चिन्मयजलनिधिके रूपमें 'कारण-समुद्र' कहा गया है; क्योंकि उसी जलमें शयन करनेवाले महाविष्णुका ईक्षण ही उसके बाहर स्थित मायाको लक्ष्य करके सृष्टि आदि क्रिया करता है। सृष्टिादि-क्रियाशून्य श्रीकृष्ण और परव्योमनाथ नारायणके स्वरूपमें कोई माया-सम्बन्धी क्रिया नहीं होती। महासङ्कर्षण कारणजलमें शयन करते हुए अपने सुदूर ईक्षणांशसे महत्तत्त्वकी सृष्टि करते हैं, ये आदि-अवतार हैं। कारणजलके बाहर मायाशक्तिकी अवस्थिति है; भगवान् उसके प्रति दृष्टिपात करते हैं। माया कारण-समुद्रको स्पर्श नहीं कर सकती। भगवान्का ईक्षण मायामें प्रवेश करके मायाको क्रियाशील बनाता है। मायाशक्तिकी दो रूपोंमें अवस्थिति है-जगत्के उपादानरूपमें 'प्रधान' और जगत्के निमित्तरूपमें 'माया'। वास्तवमें प्रकृति जड़रूपा है। जिस प्रकार आग लोहेके अन्दर प्रवेशकर जलानेकी शक्ति प्रदान करती है, उसी प्रकार भगवान्की ईक्षणशक्ति सञ्चारित होनेसे प्रकृति उस शक्तिबलसे जगत्-सृष्टिका 'गौण कारण' होती है। इसलिये श्रीकृष्ण ही जगत्के मूल कारण हैं, बकरेके गलेके स्तनकी भाँति प्रकृतिका केवल द्रव्यरूप कारणत्व है। माया-अंशसे अर्थात् गुणरूप अंशसे जिसे निमित्त कारण कहा जाता है, उसमें भी नारायण ही निमित्त कारण हैं। घड़ेके निर्माणमें