भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ ५/५८-६१ है, उसे ही 'अव्यक्त', 'प्रधान' और 'प्रकृति' कहा जाता है। 'अव्यक्त'-संज्ञा निर्देश करनेका कारण यह है—यह विशेषरहित है अर्थात् तीनों गुण साम्यावस्थामें होनेके कारण उनका विशेषधर्म अप्रकाशित है, इसलिये प्रधानको 'अव्याकृत' कहा जाता है। 'प्रधान'-संज्ञाका कारण—विशेषकी भाँति मायाके स्वकार्यरूप महात्तत्त्वादि विशेषसमूहका आश्रयरूप होनेके कारण उनसे श्रेष्ठ है।"॥५८॥ गुणमयी माया कभी भी जगत्का मुख्य कारण नहीं :- जगतकारण नहे, प्रकृति जड़रूपा। शक्ति सञ्चारिया तारे कृष्ण करे कृपा॥५९॥ भगवान्के ईक्षणके प्रभावसे प्रकृति जगत्का गौण-कारण :- कृष्णशक्त्ये प्रकृति हय गौण-कारण। अग्निशक्त्ये लौह यैछे करये जारण॥६०॥ भगवान् ही जगत्के मूलकारण :- अतएव कृष्ण मूल-जगतकारण। प्रकृति-कारण, यैछे अजा-गलस्तन॥६१॥ अनुवाद—माया जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि प्रकृति जड़रूपा है। श्रीकृष्ण ही कृपा करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चारित करते हैं। जैसे अग्निसे शक्ति प्राप्त करके लोहा जला सकता है, वैसे ही कृष्णशक्तिके द्वारा प्रकृति सृष्टिका गौण कारण है। इसलिये श्रीकृष्ण ही जगत्के मूल कारण हैं। बकरेके गलेमें स्तन जैसे मांसपिण्ड [जो दूध नहीं दे सकते], उसके समान ही प्रकृति भी जगत्का कारण दिखलायी देती है॥५९-६१॥ अनुभाष्य—मध्यलीला २०/२५९-२६१ संख्या द्रष्टव्य है। बहिरङ्गा मायाशक्ति जगत्के उपादानांशसे 'प्रधान' और 'प्रकृति' [प्रकृतिको कहीं प्रधान और कहीं माया भी कहा गया है] नामसे प्रसिद्ध है और जगत्के निमित्तांशसे 'माया' नामसे परिचित है। जड़रूपा प्रकृति जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण कारणोदकशायी महाविष्णुरूपमें प्रकृतिमें उपादान या द्रव्यशक्ति प्रदानकर 'शक्ति' सञ्चार करते हैं। उदाहरण स्वरूप, जिस प्रकार लोहेकी जलाने या ताप देने आदिकी शक्ति नहीं है, किन्तु अग्निके स्पर्शसे तप्त लोहा दूसरे वस्तुओंको जलानेमें या ताप प्रदान करनेमें समर्थ हो जाता है, उसी प्रकार लोहेकी भाँति जड़ा-प्रकृतिकी भी द्रव्य या उपादान होनेकी स्वतन्त्रता नहीं है। [अग्नि-सदृश] कारणोदकशायीकी ईक्षणशक्ति सञ्चारित होनेपर ही [लोहे-सदृश] प्रकृति उपादानके समान शक्तिविशिष्टा हो जाती है। उपादानके रूपमें परिचित प्रकृतिको उपादान-कारण मानना भ्रान्ति मात्र है। श्रीकपिलदेवने भी कहा है (भाः ३/२८/४०)— “यथोल्मुकाद्विस्फुलिङ्गात् धूमाद्वापि स्वसम्भवात्। अप्यात्मत्वेनाभिमताद् यथाग्निः पृथगुल्मुकात्॥” अर्थात् “अग्निके साथ आपाततः एक प्रतीत होनेपर भी जिस प्रकार धुआँ, जलती हुई लकड़ी और चिङ्गारियाँ—तीनों ही अग्निसे पृथक् हैं, उसी प्रकार जलती हुई लकड़ी स्थानीय 'प्रधान', धुआँ स्थानीय 'पञ्चभूत, इन्द्रियों और अन्तकरण' (स्थूल और सूक्ष्म देह) तथा चिङ्गारी २८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत