श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/५६-५८ ] कारण-समुद्र मायाके स्पर्शसे अतीत :- मायाशक्ति रहे कारणाब्धिर बाहिरे। कारण-समुद्र माया परशिते नारे॥५७॥ अनुवाद—आदि-अवतार, महत्-तत्त्वकी सृष्टि करनेवाले और जगत्के कारणस्वरूप, कारणोदशायी विष्णु मायापर दृष्टिपात करते हैं। कारण-समुद्र चिन्मय होनेके कारण मायाशक्ति उसके बाहर ही अवस्थान करती है, वह उसे स्पर्श नहीं कर सकती॥५६-५७॥ मायाके दो रूप, प्रधान और प्रकृति :- सेइ त' मायार दुइविध अवस्थिति। जगतेर उपादान 'प्रधान', 'प्रकृति'॥५८॥ अनुवाद—मायाशक्तिकी दो प्रकारसे अवस्थिति है। एक वह जगत्के उपादान कारण 'प्रधान' के रूपमें और दूसरे वह जगत्के निमित्त कारण 'प्रकृति' के रूपमें अवस्थान करती है॥५८॥ अनुभाष्य—'प्रधान' और 'प्रकृति' इस विषयमें मध्यलीला २०/२७१ द्रष्टव्य है। श्रीजीव गोस्वामीकृत परमात्मसन्दर्भ (४९ संख्या)में— “तस्याः मायायाश्चांशद्वयम्। तत्र गुणरूपस्य मायाख्यस्य निमित्तांशस्य, द्रव्यरूपस्य प्रधानाख्यस्योपादानांशस्य च परस्परं भेदमाह चतुर्भिः (भाः ११/२४/१)”×× (५३ संख्या) “अन्यत्र तयोरुपादाननिमित्तयोरंशेन वृत्तिभेदेनभेदानप्याह (भाः १०/६३/२६)— 'कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो, द्रव्यं क्षेत्रं प्राणमात्मा विकारः। तत्सङ्घातो बीजरुहप्रवाहस्तन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये॥' अत्र कालदैवकर्मस्वभावा निमित्तांशाः, अन्ये उपादानांशाः, तद्वान् जीवस्तूभयात्मकस्तथोपादानवर्गे निमित्तशक्त्यंशोऽप्यनुवर्त्तते।' ×× (५५ संख्यामें) “निमित्तांशरूपया मायाख्ययैव प्रसिद्धा शक्तिस्त्रिधा दृश्यते—ज्ञानेच्छाक्रियारूपत्वेन। ×× अथोपादानांशस्य प्रधानस्य लक्षणः (भाः ३/२६/१०)—'यत्तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्। प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत्॥' यत् खलु त्रिगुणं सत्त्वादिगुणत्रय- समाहारस्तदेवाव्यक्तं प्रधानं प्रकृतिञ्च प्राहुः। तत्राव्यक्तसंज्ञत्वे हेतुः—'अविशेषं गुणत्रयसाम्यरूपत्पादनभि-व्यक्तविशेषम्, अतएवाव्याकृतसंज्ञञ्चेति गमितम्। प्रधानसंज्ञत्वेहेतुः—विशेषवत् स्वकार्यरूपाणां महदादिविशेषाणामाश्रयरूपतया तेभ्यः श्रेष्ठम्।' ×× निमित्तांशो माया, उपादानांशः प्रधानमिति।” ‘भगवान्की बहिरङ्गा-शक्ति मायाके दो अंश हैं—निमित्तांश 'गुणरूपा माया' और उपादानांश 'द्रव्यरूप प्रधान'—इन दोनों संज्ञाका भेद भागवतके चार श्लोकों (११/२४/१-४) में वर्णित हुआ है।' अन्यत्र १०/६३/२६ में उपादान और निमित्त, इन दो अंशोंका वृत्ति भेदसे विभाग वर्णित हुआ है—“हे भगवन्! क्षोभक 'काल', निमित्त 'कर्म', फलरूपमें प्रकाशित 'दैव' और उसका संस्कार 'स्वभाव'—ये चारों निमित्तांशयुक्त बद्धजीव—सूक्ष्मभूतसमूह 'द्रव्य', प्रकृति 'क्षेत्र', सूत्र 'प्राण', अहङ्कार आत्मा और ग्यारह इन्द्रियाँ और पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये सोलह विकार',—इन सबका एकत्रित रूप 'देह' है। देहसे बीजरूप कर्म और कर्मसे अङ्कुररूप देह, इस प्रकारका पुनः-पुनः प्रवाह—यही 'माया' है। हे प्रभो! आप मायाके निषेध-अवधिभूत तत्त्व हैं, मैं आपका भजन करता हूँ।” जीव निमित्तशक्त्यांश होनेपर भी उभयात्मक अंशविशिष्ट जीव उपादानवर्गका भी अनुसरण करते हैं। निमित्तांशरूपा 'माया' शक्तिके—'ज्ञान', 'इच्छा' और 'क्रिया' रूप तीन विभाग देखे जाते हैं। उपादानांश 'प्रधान'के लक्षण—'जहाँ सत्त्व, रजो और तमो गुणोंकी साम्यावस्था
पाँचवाँ अध्याय | २८३