श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/५०-५६ श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ कारणजलका वर्णन :- वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ज्योतिर्मय धाम। ताहार बाहिरे 'कारणार्णव' नाम॥५१॥ परव्योमकी सीमापर कारण-सागर :- वैकुण्ठ बेड़िया एक आछे जलनिधि। अनन्त, अपार-तार नाहिक अवधि॥५२॥ अनुवाद-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय ब्रह्मधाम है और उसके बाहर 'कारण-समुद्र' है। वैकुण्ठके बाहर एक अनन्त-अपार जलराशि है, जिसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है॥५१-५२॥ अनुभाष्य-'जलनिधि'-'विरजा' या 'कारणजल' (मध्यलीला १५/१७५-१७६, मध्यलीला २०/२६८-२६९ और मध्यलीला २१/५२ द्रष्टव्य हैं)॥५२॥ वैकुण्ठमें स्थित महाभूतादि मायातीत :- वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल चिन्मय। मायिक भूतेर तथि जन्म नाहि हय॥५३॥ अनुवाद-वैकुण्ठके पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशादि शुद्धसत्त्वसे उत्पन्न होनेके कारण पूर्ण रूपसे चिन्मय है, उसमें मायाके पञ्चमहाभूतोंका लेशमात्र भी नहीं है॥५३॥ अनुभाष्य-'मायिक भूत' अर्थात् पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत॥५३॥ कारणजलकी चिन्मयता :- चिन्मय-जल सेइ परम-'कारण'। यार एक कणा गङ्गा पतितपावन॥५४॥ अनुवाद-कारण-समुद्र इस जगत्का मूल कारण है और उसका जल पूर्ण चिन्मय है। उसकी एक बूँद स्वरूप गङ्गा हैं, जो पतितोंको पवित्र करनेवाली हैं॥५४॥ अनुभाष्य-'कारण'-माया-सम्बन्धयुक्त उपाधि होनेपर भी वस्तुतः मिश्र रज-तमसे शून्य या सत्त्वमय है। आदिलीला २/५३ द्रष्टव्य है॥५४॥ परव्योममें स्थित सङ्कर्षण ही एकांशसे कारणोदशायी :- सेइ त' कारणार्णवे सेइ सङ्कर्षण। आपनार एक अंश करेन शयन॥५५॥ अनुवाद-उस कारण समुद्रमें वे सङ्कर्षण अपने एक अंश कारणोदशायी विष्णु रूपमें शयन करते हैं॥५५॥ वे ही आदि पुरुषावतार और मायाके ईक्षणकर्त्ता :- महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो जगत्-कारण। आद्य-अवतार करे मायार दरशन॥५६॥ २८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत