भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

यह श्रुतिके द्वारा सिद्ध है। भक्तवात्सल्यके कारण वे स्वेच्छासे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, यह बात पञ्चरात्र-शास्त्रके विरुद्ध नहीं है। इस शास्त्रमें सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध-क्रमशः जीव, मन और अहङ्कार सत्त्वसमूहके अधिष्ठातृदेव हैं, इसलिये 'जीवादि' शब्दके द्वारा इनका जो उल्लेख किया गया है, वह शास्त्र विरुद्ध नहीं है। जैसे 'आकाश' और 'प्राणादि' शब्दोंसे कभी ब्रह्मको सम्बोधित किया जाता है (४४ सूः)। इस शास्त्रमें जीवोत्पत्तिका निषेध हुआ है। क्योंकि परम-संहितामें कहा है-'अचेतन, दूसरोंके द्वारा प्रयोगके योग्य और सदा विकारयोग्य त्रिगुण ही कर्मियोंका क्षेत्र है-यही प्रकृतिका रूप है। इसका परब्रह्मके साथ सम्बन्ध व्याप्ति रूपमें है, वे भी अनादि हैं और यह भी सत्य है।' इस प्रकार सभी संहिताओंमें ही 'जीव' को नित्य कहा गया है, इसलिये पञ्चरात्र-मतमें उसकी उत्पत्तिका निषेध हुआ है। जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश अवश्यम्भावी है,-यदि जीवकी उत्पत्तिको स्वीकार किया जाता है, तो उसके विनाशको भी स्वीकार करना होगा। किन्तु जीव जब नित्य है, तब नित्यत्व होनेके कारण उसकी उत्पत्तिका स्वयं ही निषेध होगा। परमसंहिताके प्रारम्भमें कहा गया है-'प्रकृतिका रूप सदा विकारयुक्त है', इसलिये उत्पत्ति और विनाशादिको इस 'सदा विकार'के अन्तर्गत जानना होगा। इसलिये सङ्कर्षणादि जीवरूपसे उत्पन्न होते हैं, ऐसा कहकर श्रीशङ्कराचार्यने जो दोष दिखलाये हैं, उसका खण्डन हुआ है (४५ सूः)। भागवत ३/१/३४ श्लोककी श्रीधरस्वामीकी टीका द्रष्टव्य है। 'श्रीशङ्कराचार्यके चतुर्व्यूहवादखण्डन'के खण्डनको विस्तृत रूपसे जाननेके इच्छुक श्रीभाष्यकी श्रीमत्सुदर्शनाचार्यकृत "श्रुतप्रकाशिका" टीकाकी आलोचना करें॥४१-४८॥ अष्टम श्लोकेर कैल संक्षेप विवरण। नवम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥४९॥ अनुवाद-आठवें श्लोकका मैंने संक्षेपमें वर्णन किया। नवें श्लोकका अर्थ अब ध्यानपूर्वक श्रवण करो॥४९॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें नवें श्लोकका अर्थ :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- मायाभर्त्ताजाण्डसङ्घाश्रयाङ्गः शेते साक्षात् कारणाम्भोधि-मध्ये। यस्यैकांशः श्रीपुमानादिदेव- स्त श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥५०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके एक अंशस्वरूप मायाके स्वामी, ब्रह्माण्डोंके आश्रयरूप कारणाब्धिशायी, आदिदेव पुरुषावतार हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥५०॥ अनुभाष्य-साक्षात् मायाभर्त्ता (मायायाः भर्त्ता अधीश्वरः) अजाण्डसङ्घाश्रयाङ्ग (अजाण्डानां ब्रह्माण्डानां सङ्घः समूहः तस्य आश्रयः अङ्ग यस्य सः) कारणाम्भोधिमध्ये (कारणसमुद्र-जलोपरि) शेते, असौ श्रीपुमान् आदिदेवः (आदिपुरुषावतारः) यस्य (श्रीनित्यानन्दस्य) एकांश तं श्रीनित्यानन्दरामम् [अहं] प्रपद्ये। पाँचवाँ अध्याय | २८१