भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

[ ५/४१-४८ आशङ्का करके उसका त्याग किया है।' पञ्चरात्र-शास्त्रमें कहा गया है—'परमकारण ब्रह्मस्वरूप वासुदेवसे 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति हुई है, सङ्कर्षणसे 'प्रद्युम्न' नामक मनकी उत्पत्ति और मनसे 'अनिरुद्ध' नामक अहङ्कारकी उत्पत्ति हुई है।' किन्तु यहाँपर जीवकी उत्पत्ति कहा नहीं जा सकता, क्योंकि यह श्रुतिविरुद्ध है। (कठोपनिषद् २/१८) में कहा है—'चिन्मय जीवात्माका कभी भी जन्म या मृत्यु नहीं होती।' यह वाक्य और सभी श्रुतियाँ ही जीवको अनादि या उत्पत्तिरहित कहती हैं। इसलिये यहाँपर सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको क्रमशः जीव, मन और अहङ्कारके अधिष्ठातृदेव कहा गया है और उत्पत्ति शब्दके द्वारा उनका आविर्भाव ही उद्दिष्ट हुआ है (४२ सू०)। सङ्कर्षणसे प्रद्युम्न नामक मनकी उत्पत्ति कही गयी है। यहाँ भी कर्त्ता-जीवसे करण-मनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुतिमें कहा गया है—“परमात्मासे ही प्राण, मन और इन्द्रियों, सभीकी उत्पत्ति होती है।" इसलिये यदि जीवसे मनकी उत्पत्ति कही गई है, तब 'परमात्मासे इन सबकी उत्पत्ति होती है', इस प्रकार श्रुतिवचनसे उसका विरोध होता है। यह वाक्य श्रुतिविरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, इसलिये इसका प्रमाणके रूपमें निषेध किया है (४३ सू०)। सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इनमें परब्रह्मभाव विद्यमान रहनेके कारण उसके प्रतिपादक शास्त्रोंकी प्रमाणिकताको कभी भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अर्थात् ये सङ्कर्षणादि व्यूह साधारण जीवकी भाँति मायावशयोग्य रूपमें अभिप्रेत नहीं हैं—ये सभी ईश्वर हैं—सभी ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि षडैश्वर्यसम्पन्न हैं, इसलिये पञ्चरात्रका मत अप्रमाणिक नहीं है। जो पञ्चरात्र या भागवत-प्रक्रियासे अनभिज्ञ हैं, उनके पक्षमें ही ‘(पञ्चरात्रादिमें) जीवोंकी उत्पत्तिरूपा विरुद्धकथा अभिहित हुई है'—इस प्रकार अशास्त्रीय बात कहना सम्भव है। भागवत-प्रक्रिया इस प्रकार है—'जिन्हें स्वाश्रितभक्तवत्सल, वासुदेव नामक परब्रह्म कहा गया है, वे स्वेच्छासे स्वाश्रित और समश्रेणियताके लिये चार प्रकारसे अवस्थान करते हैं। जैसे पौष्कर-संहितामें कहा गया है—'जो शास्त्र ब्राह्मणोंके द्वारा क्रमागत (वंशपरम्पराप्राप्त) संज्ञाओंके द्वारा अवश्य-कर्त्तव्य रूपमें चतुर्व्यूहकी उपासनाका निर्देश करते हैं, वे शास्त्र ही 'आगम' हैं।' सात्वत-संहितामें भी कहा गया है कि इन चतुर्व्यूहकी उपासना वासुदेव नामक परब्रह्मकी ही उपासना है। वासुदेव नामक परब्रह्म, सम्पूर्ण षडैश्वर्ययुक्त विग्रह, सूक्ष्म, व्यूह और विभव, इन सब भेदभिन्न और अधिकारानुसारसे भक्तोंके द्वारा ज्ञानपूर्वक कर्मके द्वारा अर्चित होकर सम्यक् रूपसे उनको प्राप्त होते हैं। विभव अर्थात् नृसिंहदेव, रघुनाथ (रामचन्द्र) या मत्स्य-कूर्मादि अवतारोंके अर्चनसे सङ्कर्षणादि व्यूहकी प्राप्ति होती है और उस व्यूहके अर्चनसे वासुदेव-नामक परब्रह्मकी प्राप्ति होती है। क्योंकि पौष्कर-संहितामें कहा है—'इस शास्त्रकी विधि अनुसार ज्ञानपूर्वक कर्मोंके द्वारा वासुदेव-नामक अव्यय परमब्रह्मकी प्राप्ति होती है।' इसलिये सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका भी परब्रह्मत्व सिद्ध हुआ है, क्योंकि वे भी स्वेच्छासे विग्रह-विशिष्ट हैं अर्थात् उन्होंने स्वेच्छासे वे विशिष्ट विग्रह धारण किये हैं। 'वे प्राकृत प्राणीकी भाँति जन्म ग्रहण ना कर अनेक रूपोंमें अवतीर्ण अथवा प्रकटित होते हैं', २८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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