श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/५९-६७ ] जीवका बकरीके दूध प्रसव करनेवाले स्तन देखकर भी उसके गलेमें स्तनाकृति मांसपिण्डसे दुग्धके लिये प्रार्थना करना जिस प्रकार विफल मनोरथ होता है, उसी प्रकार अचित्-मूला प्रकृतिको अचित्-जगत्का कारण कहना मूर्खता ही है। भगवान्की अचित्-शक्ति 'माया'-'निमित्त' और 'उपादान'के रूपमें हरिविमुख जीवोंके निकट प्रकट होकर उनको सत्यवस्तु ग्रहण करनेसे विमुख कराती है। जीव, स्वरूप-ज्ञान उदय होनेपर ही अचित्-शक्तिकी 'आवरणी' और 'विक्षेपात्मिका'-इन दो प्रकारकी चेष्टाओंको समझ पाता है। निमित्त-कारणरूपमें कुम्हार और उपादान-कारण एवं उपायरूपमें मिट्टी तथा चक्र-दण्डादि जैसे घड़ा बनानेमें जैसे दो कारण हैं, वैसे दृश्यजगत् और भूतसमूहके भी नियामकरूपमें वस्तुविचारसे शक्तिमान् तत्त्व ही निर्दिष्ट हुए हैं। शक्तिभेद-विचारसे त्रिगुणमयी माया गुणोंके द्वारा उपादानांश भूतसमूहका परिचालन करती है। तटस्थाशक्ति जीव इस दृश्यजगत्में हरिविमुख होकर भोक्ता होनेका अभिमान ग्रहण करता है। दृश्यजगत्में वस्तुकी अचित् प्रतीति श्रीकृष्ण-विमुखताका ही फलमात्र है। अचित् प्रतीतिमें भोग-प्रवृत्ति अर्थात् इन्द्रिय-परायणता दिखलायी देती है, किन्तु सेवोन्मुखतासे भगवत्-प्रतीतिमें अपने सम्बन्धका दर्शन होता है। श्रीकृष्ण ही नित्य चित्-जगत्का कारण हैं, वे ही आवृत-सत्य अचित्-जगत्का कारण हैं और वे ही तटस्था नामक जीवका मूल-कारण तथा विधाता हैं। अचित्-प्रतीति भगवान्की बहिरङ्गा-शक्तिकी क्रिया और चित्-प्रतीति अन्तरङ्गा-शक्तिकी क्रिया हैं। चिन्मय-प्रतीतकी वाणीसे अर्थात् गुरु-परम्परासे प्राप्त शास्त्रज्ञानसे हम लोग जान पाते हैं कि सभी स्वतःकर्तृत्व-धर्म और सबका मूल कारण भगवत्तामें प्रतिष्ठित हैं। वही वस्तु बृहद् है, उनके खण्डांश ही 'जीव' कहलाते हैं। वही भगवत्-वस्तु विभक्त होकर भी खण्डित होनेका धर्म प्रकाश नहीं करती अर्थात् विभक्त होनेपर भी वह पूर्ण ही रहती है, परन्तु खण्ड-प्रतीति कभी भी अखण्ड-प्रतीतके साथ अभिन्न नहीं होती अर्थात् उनमें सदा भेद रहता है। व्याप्य-व्यापक विचारमें ब्रह्म और जीव सजातीय होनेपर भी ईशवस्तु-मायाके प्रभु, और वश्यवस्तु (जीव) - मायाके अधीन है। जब मायाधीन मायाधीशके अधीन हो जाता है, तब उसकी मायाधीनता और नहीं रहती ॥ ५९-६६॥ मध्यलीला २०/२७१-२७३ और भागवत ३/५/२६ एवं ३/२६/१८ श्लोक द्रष्टव्य हैं॥६५-६६॥ कारणोदशायीके ईक्षणका फल :- अगण्य, अनन्त यत अण्ड-सन्निवेश। ततरूपे पुरुष करे सबाते प्रवेश ॥ ६७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार अगणित, अनन्त जितने भी ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि होती है, वे पुरुष उतने रूप धारण करके उन सभी ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश कर जाते हैं॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कारणाब्धिशायी पुरुष दूरसे ही मायाके प्रति दृष्टिपात करते हैं, वह दृष्टि चित्फलस्वरूप होकर दो प्रकारसे कार्य करती है। अर्थात् वह उनके किरणकलारूपसे अनन्त जीवोंको मायामें प्रवेश कराती है और स्वयं अङ्गाभाससे मायासे योग करके अगण्य अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करती है। उन प्रत्येक ब्रह्माण्डमें वे पुरुष एक-एक पुरुषाकारमें प्रवेश कर जाते हैं। 'अङ्गाभास'का अर्थ अङ्गमिलनका आभासमात्र है, वास्तविक अङ्गमिलन नहीं॥६५-६७॥ पाँचवाँ अध्याय | २८७