भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ५/६८-७२ उनके निश्वाससे ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और प्रश्वाससे लय :- पुरुष-नासाते यबे बाहिराय श्वास। निश्वास सहिते हय ब्रह्माण्ड-प्रकाश॥६८॥ पुनरपि श्वास यबे प्रवेशे अन्तरे। श्वास-सह ब्रह्माण्ड पैशे पुरुष-शरीरे॥६९॥ अनुवाद-आदि पुरुषावतार जब नासिकासे श्वासको बाहर छोड़ते हैं, तब उस श्वासके साथ सभी ब्रह्माण्ड प्रकट हो जाते हैं। पुनः जब वे श्वासको भीतर लेते हैं, तब उस श्वासके साथ सभी ब्रह्माण्ड उनके शरीरमें प्रवेश कर जाते हैं॥६८-६९॥ उनके लोमकूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड-समूह :- गवाक्षेरे रन्ध्रे येन त्रसरेणु चले। पुरुषेर लोमकूपे ब्रह्माण्डरे जाले॥७०॥ अनुवाद-झरोखेके छिद्रोंमेंसे जैसे धूलिकण आते-जाते हैं, वैसे ही उन पुरुषके रोमकूपोंमेंसे ब्रह्माण्ड आते-जाते हैं॥७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तीन परमाणुओंका एक त्रसरेणु होता है॥७०॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २०/२७७-२८० संख्या द्रष्टव्य है॥६९-७०॥ ब्रह्मसंहिता (५/४८)- यस्यैकनिश्वासित-कालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥७१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनकी कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥७१॥ अनुभाष्य-अथ यस्य लोमविलजाः (लोमकूपात् जाताः) जगदण्डनाथाः (ब्रह्माण्डपतयः समष्टिविष्णवादयः) एकनिश्वासितकालं (निश्वासैकपरिमितकालम्) अवलम्ब्य (आश्रित्य) इह जीवन्ति (आविर्भूताः भवन्ति) सः महान् विष्णुः यस्य (गोविन्दस्य) कलाविशेषः, तमादिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/११)- क्वाहं तमो-महदहं-ख-चराग्निवार्भू- संवेष्टिताण्डघट-सप्तवितस्तिकायः क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्या- वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम्॥७२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ २८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत