श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/७२-७६ ] अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चभूतोंसे बना अपने हाथसे मापकर सात हाथके जितना बड़ा कहाँ मैं, और समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुरूपमें जिनके रोमकूपोंमें विचरण करते हैं, कहाँ वे आप ? आपकी महिमा कैसी है ? अर्थात् मेरा ब्रह्माण्ड-विग्रह आपकी महिमाकी तुलनामें कुछ भी नहीं है ॥ ७२ ॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने गो-वत्स हरण करनेके बाद अपना अपराधके निवारणके लिये जो स्तव किये, उनमेंसे यह एक है, - तमोमहदहं-ख-चराग्नि-वार्भू-संवेष्टिताण्ड-घट-सप्तवितस्ति कायः (तमः अव्यक्तं, महत्तत्त्वम् अहङ्कारः, खम् आकाशम्, चरः वायुः, अग्निस्तेजः वार्ज्जलं, भूः पृथिवी, एतैः प्रधानादि-क्षित्यन्तैः संवेष्टितः यः अण्डघटः ब्रह्माण्डरूपः घटः देहः स एव तस्मिन् निजमानेन सप्तवितस्तिकायः यस्य सः) अहं क्व, ईदृग् विधाविगणिताण्डपराणुचर्यावाताधवरोमविवरस्य (ईदृग्विधानि यानि अगणितानि अण्डानि तानि एव परमाणवः तेषां चर्या परिभ्रमणं तदर्थं वाताधवनः गवाक्षाः इव रोमविवराणि यस्य तस्य) ते (तव) महित्वं च क्व ? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७२ ॥ मूलसङ्कर्षण, महासङ्कर्षण और तीन पुरुषावतारोंका सम्बन्ध :- अंशेर अंश येइ, 'कला' तार नाम। गोविन्देर प्रतिमूर्त्ति श्रीबलराम ॥ ७३ ॥ ताँर एक स्वरूप-श्रीमहासङ्कर्षण। ताँर अंश 'पुरुष' हय कलाते गणन ॥ ७४ ॥ याँहाके त' कला कहि, तिँहो महाविष्णु। महापुरुषावतारी तेँहो सर्वजिष्णु ॥ ७५ ॥ अनुवाद-अंशके अंशको कला कहते हैं। श्रीबलराम श्रीकृष्णकी प्रतिमूर्ति अर्थात् उनसे अभिन्न हैं। उनका एक स्वरूप महासङ्कर्षण है। महासङ्कर्षणके अंश 'पुरुष' की गणना कलामें होती है। जिनको वह कला कहा है, वे कारणाब्धिशायी महाविष्णु हैं और वे अन्य पुरुषावतारोंके अवतारी हैं तथा सर्वव्यापी हैं ॥ ७३-७५ ॥ अनुभाष्य-'प्रतिमूर्त्ति'-द्वितीय देह (आदिलीला ५/४-५; मध्यलीला २०/१७४ द्रष्टव्य है)। 'महाविष्णु', 'महापुरुषावतारी' शब्दसे कारणाब्धिशायीको समझना चाहिये ॥ ७३-७५ ॥ गर्भोद-क्षीरोद-शायी दोँ हे 'पुरुष' नाम। सेइ दुइ, याँर अंश, - विष्णु, विश्वधाम ॥ ७६ ॥ अनुवाद-महाविष्णु समस्त ब्रह्माण्डोंके आश्रय हैं, दो पुरुषावतार गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी उनके अंश हैं ॥ ७६ ॥ अमृतप्रवाहभाष्य-श्रीकृष्णकी विलासमूर्त्ति श्रीबलराम ही मूलसङ्कर्षण हैं। उनके स्वरूपांश परव्योममें सङ्कर्षण हैं। उनके अंश कारणाब्धिशायी महाविष्णु हैं, वे श्रीबलरामके अंशके अंश हैं, इसलिये उन्हें कला कहा जाता है। गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी, ये दोनों पुरुष महाविष्णुके अंश हैं॥ ७३-७६ ॥ अनुभाष्य-लघुभागवतामृतमें अवतार वर्णन प्रसङ्ग (संख्या ४) में उद्धृत विष्णुपुराणके (६/८/५९) श्लोकका अनुवाद- "षड्विकारहीन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके जो अंश गुणोंके संसर्गको पाँचवाँ अध्याय | २८९