श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/७६-७९ स्वीकार करते हैं अर्थात् प्रकृति और महत्तत्त्वादि प्राकृत तत्त्वोंके ईक्षणकर्त्ता हैं, जो तत्त्वतः एक स्वरूपका त्याग ना करके अनेक स्वांश विभाग करके सभी प्राणियोंके विस्तारकर्त्ता हैं और जो शुद्ध अर्थात् मायासङ्ग-रहित होकर भी अवतीर्ण होकर अशुद्धकी अर्थात् मायासङ्गीकी भाँति प्रकाशित होते हैं तथा जो नित्य चिन्मय हैं, उन्हीं अव्यय पुरुषके प्रति (मैं) सदा प्रणत होता हूँ।” इस श्लोककी श्रीरूप गोस्वामीकृत कारिका— “परमेशांशरूपो यः प्रधानगुणभागिव। तदीक्षादिकृतिर्नानावतारः पुरुषः स्मृतः ॥ ” अर्थात् “परमेश्वरके जो अंश प्रधानके गुणोंसे संलग्न व्यक्तिकी भाँति प्रकृति और महत्तत्त्व आदिके ईक्षणकर्त्ता हैं, जो नाना प्रकारके अवतारोंके प्रकटकर्त्ता हैं, शास्त्रोंमें उनको ही 'पुरुष' नामसे कहा गया है॥”७६॥ लघुभागवतामृतमें पूर्वखण्डमें (३३) सात्वततन्त्र-वचन :— विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदुः। एकन्तु महतः स्रष्टृ तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्येत ॥ ७७ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नित्यधाममें विष्णुके तीन रूप हैं। प्रथम—महत्तत्त्वके स्रष्टा कारणाब्धिशायी महाविष्णु; द्वितीय—गर्भोदशायी और समष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष; तृतीय—क्षीरोदशायी व्यष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष, वे प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी ईश्वर और परमात्मा हैं। इन तीनोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव जड़बुद्धिसे मुक्त हो जाता है॥ ७७॥ अनुभाष्य—विष्णोस्तु पुरुषाख्याणि त्रीणि रूपाणि विदुः। अथ तेषु एकम् (आद्यं) तु महतः (महत्तत्त्वस्य) स्रष्टृ रूपाणि ज्ञात्वा विमुच्यते (मायाबन्धनात् विज्ञो मुक्तो भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ मत्स्यादि समस्त अवतारोंके अंशी कारणोदशायी :— यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर 'कला' करि। मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर तिँहो अवतारी ॥ ७८ ॥ अनुवाद—यद्यपि कारणोदशायी विष्णुको श्रीकृष्णकी 'कला' कहा जाता है, तो भी मत्स्य-कूर्मादि अवतारोंके ये अवतारी हैं॥७८॥ श्रीमद्भागवत (१/३/२८)— एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥ ७९ ॥ अनुवाद—राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं॥७९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिलीला २/६७ द्रष्टव्य है॥७९॥ २९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत