भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/८०-८१ ] तीन पुरुषावतारोंके कार्य :- सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर कर्त्ता। नाना अवतार करे, जगतेर भर्त्ता॥८०॥ अनुवाद—वे पुरुष सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्त्ता हैं, वे नाना अवतार ग्रहण करते हैं और वे जगत्का पालन करनेवाले हैं॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जगत्पालकरूपमें वे पुरुषावतार क्षीरोदशायी हैं॥८०॥ अनुभाष्य—(भाः ३/१/५)— “एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्। यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देव-तिर्यङ्-नरादयः।” अर्थात् “वे कारणाब्धिशायीरूपमें सृष्टि-स्थिति-प्रलयके कारण हैं, गर्भोदशायीरूपमें विभिन्न अवतारोंका सूतिकाधाम (उद्गमस्थल) और क्षीरोदशायीरूपमें क्षौणी (जगत्) के भर्त्ता हैं॥८०॥ अवतारगण अंशमात्र :- सृष्ट्यादि-निमित্তে येइ अंशेर अवधान। सेइ त' अंशেরে कहि 'अवतार' नाम॥८१॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके जो अंश जगत्की सृष्टि-पालन-संहारके लिये प्रकट होते हैं, उनको 'अवतार' कहा जाता है॥८१॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतमें अवतार-लक्षण वर्णन प्रसङ्गमें प्रथम संख्यामें— “पूर्वोक्ता विश्वकार्यार्थमपूर्वा इव चेत् स्वयम्। द्वारान्तरेण वाविःस्युरवतारास्तदा स्मृताः॥ तच्च द्वारं तदेकात्मरूपस्तद्भक्त एव च। शेषशायादिको यद्वद् वसुदेवादिकोऽपि च॥” अर्थात् “पहले वर्णन किये गये स्वयंरूप श्रीकृष्ण विश्वकार्यके लिये स्वयं अथवा द्वारोंके द्वारा आविर्भूत होनेपर उनको 'अवतार' कहा जाता है। वे 'द्वार' दो प्रकारके हैं—तदेकात्मरूप (जैसे शेषशायी) और भक्त (जैसे वसुदेवादि)।” श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें— “स्वयम् अद्वारकत्या, द्वारान्तरेण वा जगति आविः स्युः, तदा अवताराः स्मृताः। अप्रपञ्चात् प्रपञ्चेऽवतरणं खल्ववतारः। सद्बारकस्तु—यथा शेषशायिनः कारणार्णवशयात् गर्भोदकशयः, यथा वसुदेवात् कृष्णः, दशरथात् रामः। कार्यं—प्रकृतिक्षोभ-महदाद्युत्पादनं, दुष्टविमर्द्देन देवादीनां सुखवर्धनं, समुत्कण्ठितानां साधकानां स्वसाक्षात्कारेण प्रेमानन्दवितरणं, विशुद्धभक्तिप्रचारणञ्च, तदर्थमित्यर्थः।” अर्थात् “भगवत्स्वरूप जब स्वयं अर्थात् अद्वारक-रूपमें (अर्थात् किसीका आश्रय स्वीकार ना करके स्वयं ही) अथवा किसीके द्वारा जगत्में आविर्भूत होते हैं, तब उनको अवतार कहा जाता है। वैकुण्ठधामसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण होनेवाले ही अवतार कहलाते हैं। श्रीमत्स्य, श्रीहंस आदि अद्वारक-रूपमें आविर्भूत हुए। सद्बारक-अवतार; जैसे—शेषशायी श्रीकारणोदशायीसे श्रीगर्भोदकशायी, और जैसे—श्रीवसुदेवसे श्रीकृष्णचन्द्र, श्रीदशरथसे श्रीरामचन्द्र आदि। अवतारगण विभिन्न कार्योंके उद्देश्यसे अवतीर्ण होते हैं, जैसे—प्रकृतिको क्षुभितकर महत्तत्त्वादिका उत्पादन पाँचवाँ अध्याय | २९१