श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ५/८१-८३ करना, दुष्टोंके दमनके द्वारा देवताओंके सुखका वर्धन करना, समुत्कण्ठित साधकोंको अपना दर्शन देकर प्रेमानन्द वितरण करना और विशुद्धभक्तिका प्रचार करना।” देश-काल-पात्र भेदसे खण्डित मायाराज्यमें खण्डक्रियाके निमित्त या उपादानांशमें भगवत्स्वरूपकी जो क्रिया दिखायी देती है, उस कार्यकी कारणस्वरूपा महाविष्णुरूप भगवत्ता ही श्रीकृष्णका अंश है। इस अंशको ही ‘अवतार’ कहा जाता है। साधारणतः स्थूलदृष्टिसे ‘पङ्गु-अन्ध’ न्यायके द्वारा जड़ा-प्रकृतिको ‘उपादान’ और भोक्ता तथा त्रिगुणमय पुरुष जीवको ‘निमित्त’ कहा जाता है। किन्तु प्रकृति जगत्का ‘उपादान’ या ‘निमित्त’ नहीं है,—सूक्ष्म रूपसे देखनेपर भागवत-लोगोंने यह उपलब्धि की है। जिनकी ईक्षणशक्तिके प्रभावसे प्रकृति जगत्का ‘उपादान’ और माया जगत्की ‘निमित्त-कर्त्ती’ नामसे प्रसिद्ध हैं, ये दोनों शक्तियाँ ही उन्हीं भगवान्के द्वारा प्रदान की गयी हैं। भगवान्के जो प्रकाशस्वरूप मायामें विश्वसृष्टिके उद्देश्यसे या विश्वके हितके लिये मायाको शक्तिप्रदान-लीलाका प्रदर्शन करते हैं, उन सब प्रकाशमूर्त्तियोंको ही ‘अंश’ या ‘अवतार’ कहा जाता है। (ब्रह्मसंहितामें-एक दीपसे अन्य दीपोंको प्रज्ज्वलित करनेपर सभी दीप एक समान होते हैं)—इस उदाहरणसे वस्तुतत्त्वसे दीपकके उपमेय सभी अवतार विष्णु होनेपर भी उनका मायाके ऊपर कर्तृत्व रहनेके कारण उनको मायिक भाषामें ‘अंश’ या ‘अवतार’ कहा मात्र जाता है। मध्यलीला २०/२६३-२६४ द्रष्टव्य है॥८१॥ आद्यावतार, महापुरुष, भगवान्। सर्व-अवतार-बीज, सर्वाश्रय-धाम॥८२॥ अनुवाद—कारणोदशायी विष्णु भगवान् श्रीकृष्णके प्रथम अर्थात् आदि अवतार हैं, वे सब अवतारोंके बीजरूपी गर्भोदशायी विष्णुके भी आश्रय (मूल) हैं, इसलिये वे सभी आश्रयोंके भी आश्रय हैं॥८२॥ अनुभाष्य—सर्वावतार-बीजरूपी गर्भोदशायीके प्रसङ्गके लिये भागवत ३/१/५ द्रष्टव्य है॥८२॥ कारणोदशायी महाविष्णु :- श्रीमद्भागवत (२/६/४२)— आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च। द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः॥८३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कारणाब्धिशायी पुरुष ही भगवान्के आदि अवतार हैं। काल, स्वभाव, कार्य-कारणरूप प्रकृति, मनादि महत्तत्त्व, महाभूतादि अहङ्कार, सत्त्वादि गुण, इन्द्रियस समूह, विराट्, स्वराट्, स्थावर और जङ्गम प्राणी, सभी उनके विभूतिरूप हैं। अन्य संस्करणमें ये श्लोक भी देखे जाते हैं- “अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा दक्षादयो ये भवदादयश्च। स्वर्लोकपालाः खगलोकपाला नृलोकपालास्तललोकपालाः॥ २९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत