भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 335

गन्धर्व-विद्याधर-चारणेशा ये यक्षरक्षोरग-नागनाथाः। ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः। अन्ये च ये प्रेतपिशाचभूत-कुष्माण्ड-यादो-मृगपक्ष्यधीशाः॥ यत् किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्वलवत् क्षमावत्। श्रीह्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्त्वं परं रूपवदस्वरूपम्॥” (भाः २/६/४३-४५) अर्थात् “मैं (ब्रह्मा), श्रीरुद्र, श्रीविष्णु, दक्षादि प्रजापति, तुम (नारद) और तुम्हारे जैसे सनकादि, स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्रादि, पक्षियोंके राजा गरुड़ादि, मनुष्यलोकके समस्त राजा, पातालादि नीचेके लोकोंके राजा, गन्धर्व, विद्याधर, चारणोंके अधिनायक, यक्ष, राक्षस, सर्प, नागोंके स्वामी, ऋषिगण, पितरोंमें श्रेष्ठगण, दैत्येन्द्र, सिद्धेश्वर और समस्त दानवराज, अन्यान्य समस्त प्रेत-पिशाच, भूत, कुष्माण्ड, जल-जन्तु, मृग, पक्षियोंके अधिपति तथा लोकमें जो कुछ भी ऐश्वर्ययुक्त, तेजयुक्त, इन्द्रियशक्तियुक्त, मनःशक्तियुक्त, बलवान, शोभासम्पन्न, लज्जायुक्त, विभूतिसम्पन्न, बुद्धियुक्त, आश्चर्यवर्ण (अर्थात् अद्भुत वर्णोंसे युक्त), रूपवान (हमारे समान साकार) अथवा अरूप (निराकार) है, वे सभी कुछ परमपुरुषकी विभूतियाँ हैं, किन्तु उनका स्वरूप नहीं॥”८३॥ अनुभाष्य—ब्रह्माजी नारदको भगवान् कारणार्णवशायीकी विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं— परस्य भूम्नः (भगवतः) पुरुषः (कारणार्णवशायी) आद्यः अवतारः। कालः (गुण-क्षोभकः), स्वभावः (तत्संस्कारः), सदसत् (कार्यकारणात्मिका प्रकृतिः) मनः (महत्तत्त्वं), द्रव्यं (भूतसूक्ष्माणि पञ्चमहाभूतानि), विकारः (अहङ्कारः), गुणः (सत्त्वादिः), इन्द्रियाणि (एकादश), विराट् (समष्टिशरीरं), स्वराट् (वैराजं), स्थास्नु (स्थावरं), चरिष्णु (जङ्गमं व्यष्टिशरीरं) च [सर्वं तद्विभूतिरूपम्]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ महत्सृष्टा आदिपुरुषावतार :— श्रीमद्भागवत (१/३/१)— जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः। सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया॥८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्ने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्वादिके साथ और सोलह कलायुक्त ‘पुरुष’ कहलानेवाले रूपको धारण किया॥८४॥ अनुभाष्य—शौनकादि ऋषियोंके पाँचवें प्रश्नके उत्तरमें सूत गोस्वामी भगवान्की अवतार-कथा वर्णन कर रहे हैं,— आदौ (सर्गारम्भे) भगवान् (महासङ्कर्षणः) लोकसिसृक्षया (लोकानां भुवनानां स्रष्टुमिच्छया) महदादिभिः (महदहङ्कारपञ्चमहाभूतैकादशेन्द्रियपञ्चतन्मात्रैः) सम्भूतं (मिलितं) षोडशकलं (तत्स्सृष्ट्युपयोगिपूर्णशक्तिमत्) पौरुषं रूपं जगृहे (प्रकटयामास)। श्लोक-भावानुवाद—“सृष्टिके आरम्भमें भगवान् महासङ्कर्षणने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्त्व, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत, ग्यारह इन्द्रियों और पञ्चतन्मात्राओंके साथ सोलह कलायुक्त (सृष्टिके उपयोगी पूर्ण शक्तिमान्) ‘पुरुष’ कहलानेवाले रूपको प्रकट किया।”