श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
५/८०-८१ ] तीन पुरुषावतारोंके कार्य :- सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर कर्त्ता। नाना अवतार करे, जगतेर भर्त्ता॥८०॥ अनुवाद—वे पुरुष सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्त्ता हैं, वे नाना अवतार ग्रहण करते हैं और वे जगत्का पालन करनेवाले हैं॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जगत्पालकरूपमें वे पुरुषावतार क्षीरोदशायी हैं॥८०॥ अनुभाष्य—(भाः ३/१/५)— “एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्। यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देव-तिर्यङ्-नरादयः।” अर्थात् “वे कारणाब्धिशायीरूपमें सृष्टि-स्थिति-प्रलयके कारण हैं, गर्भोदशायीरूपमें विभिन्न अवतारोंका सूतिकाधाम (उद्गमस्थल) और क्षीरोदशायीरूपमें क्षौणी (जगत्) के भर्त्ता हैं॥८०॥ अवतारगण अंशमात्र :- सृष्ट्यादि-निमित্তে येइ अंशेर अवधान। सेइ त' अंशেরে कहि 'अवतार' नाम॥८१॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके जो अंश जगत्की सृष्टि-पालन-संहारके लिये प्रकट होते हैं, उनको 'अवतार' कहा जाता है॥८१॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतमें अवतार-लक्षण वर्णन प्रसङ्गमें प्रथम संख्यामें— “पूर्वोक्ता विश्वकार्यार्थमपूर्वा इव चेत् स्वयम्। द्वारान्तरेण वाविःस्युरवतारास्तदा स्मृताः॥ तच्च द्वारं तदेकात्मरूपस्तद्भक्त एव च। शेषशायादिको यद्वद् वसुदेवादिकोऽपि च॥” अर्थात् “पहले वर्णन किये गये स्वयंरूप श्रीकृष्ण विश्वकार्यके लिये स्वयं अथवा द्वारोंके द्वारा आविर्भूत होनेपर उनको 'अवतार' कहा जाता है। वे 'द्वार' दो प्रकारके हैं—तदेकात्मरूप (जैसे शेषशायी) और भक्त (जैसे वसुदेवादि)।” श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें— “स्वयम् अद्वारकत्या, द्वारान्तरेण वा जगति आविः स्युः, तदा अवताराः स्मृताः। अप्रपञ्चात् प्रपञ्चेऽवतरणं खल्ववतारः। सद्बारकस्तु—यथा शेषशायिनः कारणार्णवशयात् गर्भोदकशयः, यथा वसुदेवात् कृष्णः, दशरथात् रामः। कार्यं—प्रकृतिक्षोभ-महदाद्युत्पादनं, दुष्टविमर्द्देन देवादीनां सुखवर्धनं, समुत्कण्ठितानां साधकानां स्वसाक्षात्कारेण प्रेमानन्दवितरणं, विशुद्धभक्तिप्रचारणञ्च, तदर्थमित्यर्थः।” अर्थात् “भगवत्स्वरूप जब स्वयं अर्थात् अद्वारक-रूपमें (अर्थात् किसीका आश्रय स्वीकार ना करके स्वयं ही) अथवा किसीके द्वारा जगत्में आविर्भूत होते हैं, तब उनको अवतार कहा जाता है। वैकुण्ठधामसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण होनेवाले ही अवतार कहलाते हैं। श्रीमत्स्य, श्रीहंस आदि अद्वारक-रूपमें आविर्भूत हुए। सद्बारक-अवतार; जैसे—शेषशायी श्रीकारणोदशायीसे श्रीगर्भोदकशायी, और जैसे—श्रीवसुदेवसे श्रीकृष्णचन्द्र, श्रीदशरथसे श्रीरामचन्द्र आदि। अवतारगण विभिन्न कार्योंके उद्देश्यसे अवतीर्ण होते हैं, जैसे—प्रकृतिको क्षुभितकर महत्तत्त्वादिका उत्पादन पाँचवाँ अध्याय | २९१
[ ५/८१-८३ करना, दुष्टोंके दमनके द्वारा देवताओंके सुखका वर्धन करना, समुत्कण्ठित साधकोंको अपना दर्शन देकर प्रेमानन्द वितरण करना और विशुद्धभक्तिका प्रचार करना।” देश-काल-पात्र भेदसे खण्डित मायाराज्यमें खण्डक्रियाके निमित्त या उपादानांशमें भगवत्स्वरूपकी जो क्रिया दिखायी देती है, उस कार्यकी कारणस्वरूपा महाविष्णुरूप भगवत्ता ही श्रीकृष्णका अंश है। इस अंशको ही ‘अवतार’ कहा जाता है। साधारणतः स्थूलदृष्टिसे ‘पङ्गु-अन्ध’ न्यायके द्वारा जड़ा-प्रकृतिको ‘उपादान’ और भोक्ता तथा त्रिगुणमय पुरुष जीवको ‘निमित्त’ कहा जाता है। किन्तु प्रकृति जगत्का ‘उपादान’ या ‘निमित्त’ नहीं है,—सूक्ष्म रूपसे देखनेपर भागवत-लोगोंने यह उपलब्धि की है। जिनकी ईक्षणशक्तिके प्रभावसे प्रकृति जगत्का ‘उपादान’ और माया जगत्की ‘निमित्त-कर्त्ती’ नामसे प्रसिद्ध हैं, ये दोनों शक्तियाँ ही उन्हीं भगवान्के द्वारा प्रदान की गयी हैं। भगवान्के जो प्रकाशस्वरूप मायामें विश्वसृष्टिके उद्देश्यसे या विश्वके हितके लिये मायाको शक्तिप्रदान-लीलाका प्रदर्शन करते हैं, उन सब प्रकाशमूर्त्तियोंको ही ‘अंश’ या ‘अवतार’ कहा जाता है। (ब्रह्मसंहितामें-एक दीपसे अन्य दीपोंको प्रज्ज्वलित करनेपर सभी दीप एक समान होते हैं)—इस उदाहरणसे वस्तुतत्त्वसे दीपकके उपमेय सभी अवतार विष्णु होनेपर भी उनका मायाके ऊपर कर्तृत्व रहनेके कारण उनको मायिक भाषामें ‘अंश’ या ‘अवतार’ कहा मात्र जाता है। मध्यलीला २०/२६३-२६४ द्रष्टव्य है॥८१॥ आद्यावतार, महापुरुष, भगवान्। सर्व-अवतार-बीज, सर्वाश्रय-धाम॥८२॥ अनुवाद—कारणोदशायी विष्णु भगवान् श्रीकृष्णके प्रथम अर्थात् आदि अवतार हैं, वे सब अवतारोंके बीजरूपी गर्भोदशायी विष्णुके भी आश्रय (मूल) हैं, इसलिये वे सभी आश्रयोंके भी आश्रय हैं॥८२॥ अनुभाष्य—सर्वावतार-बीजरूपी गर्भोदशायीके प्रसङ्गके लिये भागवत ३/१/५ द्रष्टव्य है॥८२॥ कारणोदशायी महाविष्णु :- श्रीमद्भागवत (२/६/४२)— आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च। द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः॥८३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कारणाब्धिशायी पुरुष ही भगवान्के आदि अवतार हैं। काल, स्वभाव, कार्य-कारणरूप प्रकृति, मनादि महत्तत्त्व, महाभूतादि अहङ्कार, सत्त्वादि गुण, इन्द्रियस समूह, विराट्, स्वराट्, स्थावर और जङ्गम प्राणी, सभी उनके विभूतिरूप हैं। अन्य संस्करणमें ये श्लोक भी देखे जाते हैं- “अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा दक्षादयो ये भवदादयश्च। स्वर्लोकपालाः खगलोकपाला नृलोकपालास्तललोकपालाः॥ २९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
गन्धर्व-विद्याधर-चारणेशा ये यक्षरक्षोरग-नागनाथाः। ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः। अन्ये च ये प्रेतपिशाचभूत-कुष्माण्ड-यादो-मृगपक्ष्यधीशाः॥ यत् किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्वलवत् क्षमावत्। श्रीह्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्त्वं परं रूपवदस्वरूपम्॥” (भाः २/६/४३-४५) अर्थात् “मैं (ब्रह्मा), श्रीरुद्र, श्रीविष्णु, दक्षादि प्रजापति, तुम (नारद) और तुम्हारे जैसे सनकादि, स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्रादि, पक्षियोंके राजा गरुड़ादि, मनुष्यलोकके समस्त राजा, पातालादि नीचेके लोकोंके राजा, गन्धर्व, विद्याधर, चारणोंके अधिनायक, यक्ष, राक्षस, सर्प, नागोंके स्वामी, ऋषिगण, पितरोंमें श्रेष्ठगण, दैत्येन्द्र, सिद्धेश्वर और समस्त दानवराज, अन्यान्य समस्त प्रेत-पिशाच, भूत, कुष्माण्ड, जल-जन्तु, मृग, पक्षियोंके अधिपति तथा लोकमें जो कुछ भी ऐश्वर्ययुक्त, तेजयुक्त, इन्द्रियशक्तियुक्त, मनःशक्तियुक्त, बलवान, शोभासम्पन्न, लज्जायुक्त, विभूतिसम्पन्न, बुद्धियुक्त, आश्चर्यवर्ण (अर्थात् अद्भुत वर्णोंसे युक्त), रूपवान (हमारे समान साकार) अथवा अरूप (निराकार) है, वे सभी कुछ परमपुरुषकी विभूतियाँ हैं, किन्तु उनका स्वरूप नहीं॥”८३॥ अनुभाष्य—ब्रह्माजी नारदको भगवान् कारणार्णवशायीकी विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं— परस्य भूम्नः (भगवतः) पुरुषः (कारणार्णवशायी) आद्यः अवतारः। कालः (गुण-क्षोभकः), स्वभावः (तत्संस्कारः), सदसत् (कार्यकारणात्मिका प्रकृतिः) मनः (महत्तत्त्वं), द्रव्यं (भूतसूक्ष्माणि पञ्चमहाभूतानि), विकारः (अहङ्कारः), गुणः (सत्त्वादिः), इन्द्रियाणि (एकादश), विराट् (समष्टिशरीरं), स्वराट् (वैराजं), स्थास्नु (स्थावरं), चरिष्णु (जङ्गमं व्यष्टिशरीरं) च [सर्वं तद्विभूतिरूपम्]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ महत्सृष्टा आदिपुरुषावतार :— श्रीमद्भागवत (१/३/१)— जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः। सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया॥८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्ने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्वादिके साथ और सोलह कलायुक्त ‘पुरुष’ कहलानेवाले रूपको धारण किया॥८४॥ अनुभाष्य—शौनकादि ऋषियोंके पाँचवें प्रश्नके उत्तरमें सूत गोस्वामी भगवान्की अवतार-कथा वर्णन कर रहे हैं,— आदौ (सर्गारम्भे) भगवान् (महासङ्कर्षणः) लोकसिसृक्षया (लोकानां भुवनानां स्रष्टुमिच्छया) महदादिभिः (महदहङ्कारपञ्चमहाभूतैकादशेन्द्रियपञ्चतन्मात्रैः) सम्भूतं (मिलितं) षोडशकलं (तत्स्सृष्ट्युपयोगिपूर्णशक्तिमत्) पौरुषं रूपं जगृहे (प्रकटयामास)। श्लोक-भावानुवाद—“सृष्टिके आरम्भमें भगवान् महासङ्कर्षणने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्त्व, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत, ग्यारह इन्द्रियों और पञ्चतन्मात्राओंके साथ सोलह कलायुक्त (सृष्टिके उपयोगी पूर्ण शक्तिमान्) ‘पुरुष’ कहलानेवाले रूपको प्रकट किया।”
[ ५/८४-८६ षोड़शकलं—लघुभागवतामृतमें पुरुष वर्णन प्रसङ्ग (संख्या ६८) में— “श्रीर्भूःकीर्त्तिरिला लीला कान्तिर्विद्येति सप्तकम्। विमलाद्या नवेत्येता मुख्याः षोड़श शक्तयः ॥” १) श्री, २) भू, ३) लीला, ४) कान्ति, ५) कीर्त्ति, ६) तुष्टि, ७) गीः, ८) पुष्टि, ९) सत्या, १०) ज्ञानाज्ञाना, ११) जया उत्कर्षिणी, १२) विमला, १३) योगमाया, १४) प्रह्वी, १५) ईशाना और १६) अनुग्रहा—वैकुण्ठमें ये सोलह शक्तियाँ विद्यमान हैं। इस श्लोककी श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें— “विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा तथैव च। प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहेति नव स्मृताः॥” अर्थात् “विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा—ये नौ शक्तियाँ शास्त्रोंमें स्मरण की गयी हैं।” भगवत्सन्दर्भमें (११७ संख्या)— “श्रिया पुष्ट्या गिरा कान्त्या कीर्त्त्या तुष्ट्येळयोर्जया। विद्ययाविद्यया शक्त्या मायाया च निषेवितम्॥ सन्धिनीसम्वित्ह्लादिनीभक्त्याधारशक्तिमूर्त्तिविमलाजया योगा प्रह्वीशानानुग्रहादयश्च ज्ञेयाः। ततः श्रियेत्यादौ शक्तिवृत्तिरूपया मायावृत्तिरूपया चेति सर्वत्र ज्ञेयम्। तत्र पूर्वस्याः भेदः श्रीर्भागवतीसम्पत्। उत्तरस्याः भेदः श्रीर्जागती-सम्पत्। ××तत्र इला भूस्तदुपलक्षणत्वेन लीला अपि। अत्र सन्धिन्त्येव सत्या, जयैवोत्कर्षिणी, योगैव योगमाया, सम्विदेव ज्ञानाज्ञानशक्तिः शुद्धसत्त्वञ्चेति ज्ञेयम्; प्रह्वी विचित्रानन्तसामर्थ्यहेतुः, ईशाना सर्वाधिकारिता-शक्तिहेतुरिति भेदः।” अर्थात् श्री, पुष्टि, गीः, कान्ति, कीर्त्ति, तुष्टि, इला, ऊर्जा, विद्या, अविद्या, शक्ति और मायाके द्वारा भगवान् सेवित होते हैं। (‘च’ शब्दसे) सन्धिनी, सम्वित्, ह्लादिनी, भक्त्याधारशक्ति, मूर्त्ति, विमला, जया, योगा, प्रह्वी, ईशाना, अनुग्रह आदिको समझना होगा। उक्त ‘श्री’ आदिसे (अन्तरङ्गा) शक्तिवृत्तिरूपा और (बहिरङ्गा) मायावृत्तिरूपा नामक दो प्रकारकी वृत्तियोंको सर्वत्र जानना होगा। इनमेंसे जो प्रथम अर्थात् शक्तिवृत्तिका भेद है, वह ‘श्री’—भागवती सम्पद् है। और जो दूसरी अर्थात् मायावृत्तिका भेद है, वह ‘श्री’—जागती सम्पद् है। उनमें इला भूशक्ति है और उपलक्षणमें लीलाशक्ति भी है। यहाँपर सन्धिनी ही सत्या, जया ही उत्कर्षिणी, योग ही योगमाया और सम्वित् ही ज्ञानाज्ञानशक्ति एवं शुद्धसत्त्व है। प्रह्वी विचित्र और अनन्त सामर्थ्यका कारण है। ईशाना सर्वाधिकारिता शक्तिका कारण है। श्रीमद्भागवतके गौड़ीयभाष्यके अन्तर्गत श्रीमध्वकृत भागवत तात्पर्य और तथ्य द्रष्टव्य हैं॥८४॥ सबके आश्रय और अन्तर्यामी :— यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो, ताँहाते संसार। अन्तरात्मा-रूपे तिँहो जगत्-आधार॥८५॥ ईक्षणादिके द्वारा मायासे सम्बन्ध होनेपर भी वस्तुतः विष्णु मायातीत :— प्रकृति सहिते ताँर उभय सम्बन्ध। तथापि प्रकृति-सह नाहि स्पर्शगन्ध॥८६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८५-८६॥ २९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि सबका आश्रय होनेके कारण संसार उनमें अवस्थित है, तथापि अन्त़रात्माके रूपमें वे जगत्का आधार हैं। प्रकृतिके साथ उनका यह दो प्रकारका सम्बन्ध रहनेपर भी वे प्रकृतिस्पर्श-दोष स्वीकार नहीं करते॥८६॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २०/२८२ द्रष्टव्य है। लघुभागवतामृतमें विष्णुकी निर्गुणताके प्रसङ्गमें श्रीरूप गोस्वामीकी कारिका- “योगो नियामकतया गुणैः सम्बन्ध उच्यते। अतः स तैर्न युज्यते तत्र स्वांश परस्य यः॥” अर्थात् नियमकरूपमें गुणके साथ विष्णुका जो सम्बन्ध है, उसको 'योग' कहा जाता है। इसलिये वे पुरुष गुणके द्वारा कभी भी बद्ध नहीं होते। विशेषतः परम-पुरुषसे तत्त्वतः अभिन्न स्वांश-विष्णुगण, कोई भी, कभी भी, किसी प्रकारसे भी गुणके साथ युक्त नहीं होते। श्रीबलदेव विद्याभूषणकी टीका- “ननु परस्य पुंसः कथं गुणसम्बन्धः, 'माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना' (भाः २/७/४७) इत्यादि वाक्य विरोधादिति चेत्? तत्राह-योग इति। गुणा नियमाः, त्रिधाविर्भूतः पुरुषस्तु नियामक इति सम्बन्धः, स इह योग उच्यते, न तु तैर्बन्ध इत्यर्थः। स तु विष्णुर्नैव युज्यते, द्रुमिलयोगीशवाक्ये (भाः ११/४/५) तत्र गुणसम्बन्धानुल्लेखात्।” यदि कहें कि महाविष्णुका तो गुणके साथ सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता है? क्योंकि ऐसा होनेपर 'माया लज्जित होकर भगवान्से दूसरी ओर मुख करके अवस्थान करती है' इस वाक्यके साथ विरोध होता है। इसके उत्तरमें कहते हैं, - 'गुण' का अर्थ नियम है; विष्णु, ब्रह्मा और शिव-इन तीन रूपोंमें आविर्भूत 'पुरुष' का इस प्रकृतिसे उसके नियामक रूपमें सम्बन्ध है। जगत्में उस सम्बन्धको ही 'योग' नामसे कहा जाता है और उसे कभी भी तीन गुणोंके द्वारा 'बन्धन' नहीं कहा जाता। वे विष्णु कभी भी मायाके गुणोंके साथ युक्त नहीं होते, क्योंकि नवयोगेन्द्रोंमेंसे अन्यतम द्रुमिलके वाक्यमें विष्णुके साथ तीन गुणोंके सम्बन्धका कोई उल्लेख नहीं दिखलायी देता है। जगत्की सृष्टिमें उपादान और निमित्त, इन दो प्रकारके कारणोंमें भगवान्का ईक्षण-कर्त्तृत्व सम्बन्ध रहनेपर भी वे मायाके द्वारा किसी भी प्रकारसे प्रभावित नहीं होते हैं। भगवान्की इच्छाशक्तिका परिणाम यह विकारविशिष्ट जगत् है, किन्तु उनमें किसी जड़ विकारकी सम्भावना नहीं है। आदिलीला २/५२, ५४ द्रष्टव्य हैं॥८५-८६॥ श्रीमद्भागवत (१/११/३८)- एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥८७॥ अनुवाद-प्रकृतिमें रहकर उसके गुणोंके द्वारा वशीभूत नहीं होना ही भगवान्की भगवत्ता है। मायाबद्ध जीवोंकी बुद्धि जब भगवान्का आश्रय लेती है, तब मायाके समीप रहकर भी वे मायाके गुणोंसे संयुक्त नहीं होते हैं॥८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आदिलीला २/५५ द्रष्टव्य है॥८७॥ पाँचवाँ अध्याय | २९५
[ ५/८८-९० अचिन्त्यशक्तिमान् ईश्वरके साथ जगत्का भेदाभेद-सम्बन्ध :- एइ मत गीतातेह पुनः पुनः कय। सर्व्वदा ईश्वर-तत्त्व अचिन्त्यशक्ति हय॥८८॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतामें भी बारम्बार कहा गया कि ईश्वर-तत्त्व सदा अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं॥८८॥ आमि त' जगते बसि, जगत् आमाते। ना आमि जगते बसि, ना आमा जगते॥८९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है।॥८९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीकृष्णने कहा)—मैं जगत्में अवस्थित हूँ और जगत् भी मुझमें अवस्थित है। तो भी मैं जगत्में नहीं हूँ और जगत् भी मुझमें नहीं है—इसीको ‘अचिन्त्य अर्थ (ऐश्वर्य)’ कहा जाता है॥८९॥ अनुभाष्य—भगवान्के अस्तित्वके बिना दृश्य जगत्में किसीके भी अस्तित्वकी सम्भावना नहीं है। भगवान्में जगत् अवस्थित है, यह कहकर अचित्भोगमय दर्शनकी बाह्य प्रतीतिका भगवान् नहीं मानना चाहिये, भोगमय जगत्को भगवत्ता नहीं जानना चाहिये। भगवद्विमुखतारूप भोग या माया भगवान्में अवस्थित नहीं है, भगवद्विमुखता किसी प्रकारसे भी भगवत्-वस्तुमें नहीं रह सकती। जब अधोक्षज भगवान् जगत् या प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तब भी वे जगत्के अंश या नश्वर वस्तु नहीं होते और हो भी नहीं सकते। प्रकट और अप्रकट, दोनों लीलाओंमें ही वे मायासे अतीत और मायाके अधीश हैं अर्थात् निर्गुण-वैकुण्ठता उनमें नित्य वर्तमान होती है। विभिन्न लीलाभेदसे वे जगत्में अवतीर्ण होते हैं और जगत्की सभी वस्तु-सत्ताके वे मूल अधिष्ठातृदेव हैं। जगत् भी कभी उनसे अलग अस्तित्वयुक्त होकर किसी दूसरी वस्तुके रूपमें अवस्थान नहीं कर सकता। विष्णु स्वयं कभी भी प्राकृत जगत् या मायाके साथ संस्पर्शयुक्त नहीं होते। उनका अपना स्वरूप और तद्रूपवैभव भी किसी प्रकारसे भोगमय, सीमित जगत् या उनसे विमुख प्रकृतिके अन्तर्गत नहीं है—यही स्वेच्छामय, अचिन्त्य-ऐश्वर्यमय भगवान्का स्वतःकर्त्तृत्व और भगवत्ता है। श्रीमद्भागवत चतुःश्लोकीके अन्तर्गत २/९/३४ “यथा महान्ति” श्लोककी विभिन्न टीकाओंसे समन्वित ‘गौड़ीयभाष्य’ और (भागवत ११/१५/३६) श्लोक द्रष्टव्य हैं॥८९॥ अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ जानिह आमार। एइ त' गीतार अर्थ कैल परचार॥९०॥ अनुवाद—हे अर्जुन! इसे मेरा अचिन्त्य ऐश्वर्य जानो—श्रीकृष्णने इसी अर्थका गीतामें प्रचार किया है॥९०॥ अनुभाष्य—गीता (९/४-५) में— “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्त्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ २९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥” अर्थात् “इन्द्रियातीत मेरी मूर्तिके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है और समस्त भूत मुझमें अवस्थित हैं, किन्तु मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। मेरे असाधारण योगैश्वर्यको तो देखो, भूतसमूह मुझमें अवस्थित नहीं भी हैं। यद्यपि मेरा स्वरूप भूतधारक और भूतपालकका है, तथापि मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ॥”९०॥ सेइ त' पुरुष यॉर 'अंश' धरे नाम। चैतन्येर सङ्गे सेइ नित्यानन्द-राम॥९१॥ अनुवाद—उन पुरुष अर्थात् महाविष्णुको जिनका अंश कहा गया है, वे (अंशी) श्रीबलराम ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके साथ अवतरित हुए हैं॥९१॥ एइ त' नवम श्लोकेर अर्थ-विवरण। दशम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥९२॥ अनुवाद—यह नवें श्लोकका अर्थ था। अब दसवें श्लोकका अर्थ ध्यानपूर्वक श्रवण करो॥९२॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें दसवें श्लोकका अर्थ :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे— यस्यांशांशः श्रील गर्भोदशायी यन्नाभ्यब्जं लोकसंघातनालम्। लोकस्रष्टुः सूतिकाधाम धातुस्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥९३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके नाभिकमलकी नाल लोकस्रष्टा विधाताका (ब्रह्माजीका) सूतिकागृह (जन्मस्थान) और समस्त लोकोंका विश्रामस्थल है, वे गर्भोदशायी विष्णु जिनके अंशके अंश हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥९३॥ अनुभाष्य—यन्नाभ्यब्जं (यस्य नाभिकमलं) लोकसङ्घातनालं (लोकसमूहः चतुर्दशलोकं, नालं आधारो, यस्य तत्) धातुः लोकस्रष्टुः (ब्रह्मणः) सूतिकाधाम (जन्मगृहस्वरूपं) श्रील-गर्भोदशायी (द्वितीयपुरुषावतारः) यस्य नित्यानन्दरामस्य अंशांशः (कला), तं (श्रीनित्यानन्दरामम्) [अहं] प्रपद्ये। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९३॥ गर्भोदशायीका वर्णन :- सेइ त' पुरुष अनन्तब्रह्माण्ड सृजिया। सब अण्डे प्रवेजिला बहु-मूर्ति हञा॥९४॥ भितरे प्रवेशि' देखे सब अन्धकार। रहिते नाहिक स्थान करिल विचार॥९५॥ अनुवाद—प्रथम पुरुष अर्थात् कारणाब्धिशायी विष्णुने अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की और वे सभी ब्रह्माण्डोंमें एक-एक गर्भोदशायी विष्णु रूप धारणकर प्रवेश कर गये। गर्भोदशायी
पाँचवाँ अध्याय | २९७
[ ५/९४-१०१ विष्णुने ब्रह्माण्डके भीतर प्रवेश करके देखा कि सब कुछ अन्धकारमय है और रहनेके लिये कोई स्थान नहीं है। तब वे विचार करने लगे॥ ९४-९५ ॥ अनुभाष्य-ब्रह्मसंहिता (५/१४)- “प्रत्येकमेवमेकांशाद् विशति स्वयं।” “ऐसे महाविष्णुने एक-एक अंशके द्वारा एक-एक ब्रह्माण्डमें प्रवेश किया।” मध्यलीला २०/२८३-२९३ द्रष्टव्य है ॥ ९४-९५ ॥ निजाङ्ग-स्वेदजल करिल सृजन। सेइ जले कैल अर्द्ध-ब्रह्माण्ड भरण ॥ ९६ ॥ अनुवाद-तब उन द्वितीय पुरुषने अपने अङ्गोंसे स्वेदजल (पसीने) की सृष्टि की और उस जलसे आधे ब्रह्माण्डको भर दिया ॥ ९६ ॥ अनुभाष्य-भागवत २/१०/१० श्लोक द्रष्टव्य है ॥ ९६ ॥ ब्रह्माण्ड-प्रमाण पश्चात्कोटि-योजन। आयाम, विस्तार, दुइ हय एक सम ॥ ९७ ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डकी लम्बाई और चौड़ाई, दोनों समान हैं तथा उनका परिमाण पचास करोड़ योजन है ॥ ९७ ॥ चौदह भुवनोंकी उत्पत्ति :- जले भरि' अर्द्ध ताहा कैल निज-वास। आर अर्धे कैल चौद्दभुवन-प्रकाश ॥ ९८ ॥ गर्भसागरमें निज वैकुण्ठधामका प्रकाश :- ताँहाइ प्रकट कैल वैकुण्ठ निज-धाम। शेष-शयन-जले करिल विश्राम ॥ ९९ ॥ ऋक्सूक्तमें स्तवनीय वस्तु :- अनन्तशय्याते ताँहा करिल शयन। सहस्र मस्तक ताँर सहस्र वदन ॥ १०० ॥ सहस्र-चरण-हस्त, सहस्र-नयन। सर्व अवतार-बीज, जगत्-कारण ॥ १०१ ॥ अनुवाद-जलसे ब्रह्माण्डको आधा भरकर गर्भोदशायी विष्णुने उसे अपना वासस्थान बना लिया। दूसरे आधे भागमें उन्होंने चौदह भुवनोंको प्रकट किया। उन्होंने उस वास स्थानमें वैकुण्ठ धामको प्रकट किया और शय्यारूप जलके ऊपर अनन्तशेष विश्राम करने लगे। अनन्तशेषको शय्या बनाकर गर्भोदशायी वहाँ शयन करने लगे। उनके हजारों सिर, हजारों मुख, हजारों चरण और हाथ एवं हजारों नेत्र हैं। वे सभी अवतारोंके बीज और जगत्के कारणस्वरूप हैं ॥ ९८-१०१ ॥ अनुभाष्य-'चौद्दभुवन' - भू, भुवः, स्वः, महः, जन, तपः और सत्य-ये सात ऊपरके भुवन (लोक) हैं एवं तल, अतल, वितल, नितल, तलातल, महातल तथा सुतल-ये सात पाताल २९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/९८-१०३ ] (नीचेके लोक) हैं। इस प्रकार ये चौदह भुवन हैं। भागवतके २/५/३८-४२, ११/४/३ और १/३/२, ४-५ श्लोक द्रष्टव्य हैं। (भागवत १/३/४)- “पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा सहस्रपादोरुभुजाननाद्भुतम्। सहस्रमूर्ध-श्रवणाक्षि-नासिकं-सहस्र-मौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत्॥” अर्थात् “योगीलोग भगवान्के जिस रूपका ध्यानमें दर्शन करते हैं, वह रूप हजारों पाँवों, जाँघों, भुजाओं, और मुखोंके कारण अत्यन्त अद्भुत है। उसके हजारों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं। हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डलादि आभूषणोंसे वह रूप सदा उल्लसित रहता है।” (ऋक् सं ८/४/१७, साम ६/४/४३, शुक्ल यजुः ३१/१, अथर्व १९/६/१)- “सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥” अर्थात् “जिनके सहस्र (अनन्त) शीर्ष (मस्तक) हैं, अनन्त नेत्र हैं, अनन्त चरण हैं, उन्होंने पृथ्वीको सम्पूर्णतः व्याप्त करके दस अङ्गुल अधिक बड़े होकर स्वयंको अभिव्यक्त किया है।” भागवत (११/४/४-५) और ब्रह्मसंहिता (५/१०-११) श्लोक द्रष्टव्य हैं॥९८-१०१॥ उनसे विष्णु, ब्रह्मा और रुद्रका उद्भव :- ताँर नाभिपद्म हैते उठिल एक पद्म। सेइ पद्मे हैल ब्रह्मार जन्म-सद्म ॥१०२॥ सेइ पद्मनाले हैल चौद्दभुवन। तेंहो ब्रह्मा हञा सृष्टि करिल सृजन ॥१०३॥ अनुवाद-गर्भोदशायी विष्णुके नाभिकमलसे एक कमल निकला और वह कमल ब्रह्माजीका जन्मस्थान हुआ। उस कमलनालमें चौदह भुवनोंकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार गर्भोदकशायी विष्णुने ब्रह्माके रूपमें सृष्टिकी रचना की॥१०२-१०३॥ अनुभाष्य-महाभारतमें मोक्षधर्ममें नारायणोपाख्यान (शान्तिपर्व ३३९/७०-७२ और ३४०/२७-२८ श्लोकों) में वर्णित है—'जो प्रद्युम्न हैं, वे ही अनिरुद्ध हैं और वे ही ब्रह्माके जनक हैं।' यहाँपर यही समझना होगा कि जो गर्भोदशायी हैं, वे ही क्षीरोदशायी हैं। दोनों ही अभिन्न होनेके कारण वस्तुतः प्रद्युम्न ही हिरण्यगर्भ ब्रह्माके नियामक हैं अर्थात् उनके अन्तर्यामी और जनक हैं। (भागवत ३/१/२) श्लोक द्रष्टव्य है॥१०२-१०३॥ अमृतानुकणिका-ब्रह्मा दो प्रकारके होते हैं-जीवकोटि और ईश्वरकोटि। भागवत (४/२४/२९) में कहा गया है- “स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम्। अर्थात् “जो जीव सौ जन्मों तक स्वधर्ममें निष्ठावान होते हैं, वे ब्रह्मत्व लाभ करते हैं।” जिस कल्पमें इस प्रकार योग्य जीव मिलता है, उस कल्पमें वही गर्भोदशायीकी नाभिकमलसे ब्रह्मारूपमें जन्म ग्रहण करता है और गर्भोदशायी उसमें शक्ति सञ्चार करके उसके द्वारा पाँचवाँ अध्याय | २९९
[ ५/१०३-१०४ जगत्की सृष्टि कराते हैं। इस प्रकारके ब्रह्माको 'जीवकोटि'का कहते हैं। और जिस कल्पमें इस प्रकार योग्य जीव नहीं होता है, उस कल्पमें गर्भोदशायी पुरुष ही अपने एक अंशसे ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टि करते हैं। इन ब्रह्माको 'ईश्वरकोटि' ब्रह्मा कहते हैं॥१०३॥ विष्णुरूप हञा करे जगत् पालने। गुणातीत विष्णु—स्पर्श नाहि माया-गुणे॥१०४॥ अनुवाद—वे द्वितीय पुरुष विष्णुरूप धारण करके जगत्का पालन करते हैं। वे गुणातीत हैं, मायाके गुण उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकते॥१०४॥ अनुभाष्य—भागवत १/२/२३ श्लोकके पुरुष ही ये गर्भोदशायी हैं। भागवत ३/८/१६ श्लोक द्रष्टव्य है। लघुभागवतामृतमें तीन पुरुषोंके प्रसङ्ग (७० संख्या)में— “सोऽस्य गर्भोदशयस्य विलासो यश्चतुर्भुजः। शेते प्रविश्य लोकाब्जं विष्णु-आख्यः क्षीरवारिधौ॥ अयञ्च स्थावरान्तानां सुरादीनां शरीरिणाम्। हृद्यन्तर्यामितां प्राप्तो नानारूप इव स्थितः। 'तृतीयं सर्वभूतस्थम्' इति विष्णोर्यदुच्यते। रूपं सात्वततन्त्रे तद्विलासोऽस्यैव सम्मतः॥” गर्भोदशायीके विलास जो चतुर्भुज मूर्ति हैं, लोकपद्ममें प्रवेश करके क्षीरसमुद्रमें शयन कर रहे हैं, वे 'विष्णु' नामसे जाने जाते हैं। वे विष्णु ही देवादिसे लेकर स्थावरतक सभी प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामी होकर उन नाना रूपोंकी भाँति अवस्थित हैं। सात्वत-तन्त्रमें 'तृतीय-पुरुष सर्वभूतस्थ' कहकर विष्णुके जिस रूपका उल्लेख है, वे इन गर्भोदशायी विष्णुकी विलासमूर्ति हैं। लघुभागवतामृतमें पुरुष-वर्णन प्रसङ्ग (संख्या २२)में श्रीबलदेव विद्याभूषणकी टीका— “विष्णुस्तु सत्त्वेनापि न युक्तः, किन्तु सङ्कल्पेनैव तन्नियमनमात्रकृत्, अतः 'श्रेयांसि तस्मात्' इत्युक्तम्।” अतएव वामनपुराणे— “ब्रह्मविष्णुवीश्वरूपाणि त्रीणि विष्णोर्महात्मनः। ब्रह्माणि ब्रह्मरूपः स शिवरूपः शिवे स्थितः। पृथगेव स्थितो देवो विष्णुरूपी जनार्द्दनः॥” अर्थात् “विष्णु सत्त्वगुणके अधिष्ठातृदेव होनेपर भी कभी भी सत्त्वगुणसे युक्त नहीं होते, किन्तु सङ्कल्पमात्रसे ही वे सत्त्वगुणके नियामक मात्र हैं। इसलिये यह कहा गया है कि 'उनसे ही जीवका मङ्गल साधित होता है'। इसलिये वामन पुराणमें कहा गया है—“एक विष्णु ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें हैं। ब्रह्मामें उनका ब्रह्मरूप है, शिवमें उनका शिवरूप है और विष्णुरूपी जनार्द्दन इन दोनोंसे पृथक् रूपमें अवस्थान करते हैं।” विष्णुवर्णनमें भी (२९-३० संख्यामें)— “विष्णुं सत्त्वं तनोतीति शास्त्रे सत्त्वतनुः स्मृतः। अवतारगणश्चास्य भवेत् सत्त्वतनुस्तथा। बहिरङ्गमधिष्ठानमिति वा तस्य तत्तनुः॥ अतो निर्गुणता सम्यक् सर्वशास्त्रे प्रसिद्धयति। तथाहि—(भाः १०/८८/५)— 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः।” सत्त्वगुणको विस्तार करनेके कारण शास्त्रोंमें विष्णुका नाम 'सत्त्वतनु' हुआ है। इसी प्रकार क्षीरोब्धिशायी विष्णुके अवतारोंको भी 'सत्त्वतनु' कहा गया है। अथवा वह सत्त्वरूप तनु (शरीर) उनका बहिरङ्ग अधिष्ठान होनेके कारण उनको 'सत्त्वतनु' कहा गया है। इन सब कारणोंसे सभी शास्त्रोंमें ही विष्णुको निर्गुण कहा गया है। दशम स्कन्धमें भी कहा गया है— “हरि निर्गुण, साक्षात् परमेश्वर, प्रकृतिसे अतीत, ब्रह्मादि देवताओंको ज्ञान प्रदान करनेवाले ३०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१०४-१०९ ] और सबके साक्षी हैं, उनका भजन करनेसे निर्गुणता प्राप्त होती है।” इसलिये यही भागवत-पद्योंमें कहा है कि 'इन सत्त्वतनुसे सभी प्रकारका श्रेयः सम्पन्न होता है'॥१०४॥ रुद्ररूप धरि' करे जगत् संहार। सृष्टि-स्थिति-प्रलय-इच्छाय याँहार ॥१०५॥ अनुवाद—रुद्ररूप धारण करके वे गर्भोदशायी पुरुष जगत्का संहार करते हैं। उनकी इच्छासे जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होती है॥१०५॥ हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी, जगत्-कारण। याँर अंश करि' करे विराट-कल्पन॥१०६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गर्भोदशायी विष्णु ही हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी और जगत्के कारण हैं। उनके अंशकी ही 'विराट्रूपमें' कल्पना की गयी है॥१०६॥ हेन नारायण,—याँर अंशेर अंश। सेइ प्रभु नित्यानन्द—सर्व-अवतंस ॥१०७॥ अनुवाद—गर्भोदशायी नारायण जिनके अंशके अंश हैं, वे प्रभु श्रीनित्यानन्द सबसे श्रेष्ठ हैं॥१०७॥ दशम श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। एकादश श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥१०८॥ अनुवाद—यहाँ तक दसवें श्लोकके अर्थका वर्णन किया। अब ध्यानपूर्वक ग्यारहवें श्लोकका अर्थ श्रवण करो॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दशम श्लोकेर अर्थ'—दसवें श्लोक और उसके नीचे लिखे गये पद्यसमूहमें गर्भोदशायी विष्णुका विवरण है॥१०८॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें ग्यारहवें श्लोककी व्याख्या :— श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे— यस्यांशांशांशः परमात्माखिलानां पोष्टा विष्णुर्भाति दुग्धाब्धिशायी। क्षौणीभर्त्ता यत्कला सोऽप्यनन्त- स्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥१०९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके अंशांशके अंश सब जीवोंके परमात्मा और पालनकर्त्ता क्षीरोदशायी विष्णु हैं तथा जिनकी कला पृथ्वीधारी 'अनन्त' हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१०९॥ अनुभाष्य—अखिलानां (जीवानां) परात्मा (परमात्मा), पोष्टा (पोषणकर्त्ता), दुग्धाब्धिशायी (तृतीय-पुरुषावतारः क्षीरोदशायी) विष्णुः भाति, सोऽपि यस्यांशांशांशः (यस्य नित्यानन्दरामस्य अंशस्य अंशः कला तदंशः विकला); पाँचवाँ अध्याय | ३०१
[ ५/१०९-११२ यत् (यस्य क्षीरोदशायिनः) कला (अंशस्य अंशः), क्षोणीभर्त्ता (जगत्पालक वाः) सः अपि अनन्तः; तं श्रीनित्यानन्दरामम् [अहं] प्रपद्ये। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०९॥ क्षीरोदशायी विष्णुके धामका वर्णन :- नारायणेर नाभिनाल-मध्येते धरणी। धरणीर मध्ये सप्त समुद्र ये गणि॥११०॥ श्वेतद्वीप :- ताँहा क्षीरोदधि-मध्ये 'श्वेतद्वीप' नाम। पालयिता विष्णु, -ताँर सेइ निज धाम॥१११॥ व्यष्टिजीवके अन्तर्यामी :- सकल जीवेर तिँहो हुये अन्तर्यामी। जगत्-पालक तिँहो जगतेर स्वामी॥११२॥ अनुवाद-नारायण अर्थात् गर्भोदशायीके नाभिकमलसे निकली नालके भीतर चौदह लोक हैं और पृथ्वी उन लोकोंके मध्यमें है। पृथ्वीके मध्यमें सात समुद्र हैं। वहाँ क्षीरसमुद्रके बीचमें 'श्वेतद्वीप' नामक एक स्थान है, वह 'श्वेतद्वीप' जगत्का पालन करनेवाले विष्णुका निजधाम है। वे क्षीरदोशायी विष्णु ही सभी जीवोंके अन्तर्यामी हैं। वे जगत्का पालन करनेवाले और जगत्के स्वामी हैं॥११०-११२॥ अनुभाष्य-सिद्धान्तशिरोमणिमें वर्णन है- “भूमेरुधं क्षारसिन्धोरदक्स्थं जम्बुद्वीपं प्राहुरार्याार्यावर्याः। अर्धेऽन्यस्मिन्द्वीपषट्कस्य याम्ये क्षारक्षीराद्यम्बुधीनां निवेशः॥ लवणजलधिरादौ दुग्धसिन्धुश्च तस्मादमृतममृतरश्मि श्रीश्च यस्माद्बभूव। महितचरणपद्मः पद्मजन्मादिदेवैर्वसति सकलवासो वासुदेवश्च यत्र॥ दध्नो घृतस्येक्षुरसस्य तस्मान्मद्यस्य च स्वादुजलस्य चान्त्यः। स्वादुदकान्तर्बड़वानलोऽसौ पाताललोकाः पृथ्वीपुटानि॥” अर्थात् ये सात समुद्र इस प्रकार हैं-१) लवण-समुद्र, २) क्षीरसमुद्र, ३) दधिसमुद्र, ४) घृतसमुद्र, ५) गन्नेके रसका समुद्र, ६) मद्यसमुद्र और ७) स्वादिष्ट जलसमुद्र। लवणसमुद्रके दक्षिणमें क्षीरसमुद्र है, उसमें सबके आश्रय वासुदेव वास करते हैं और वहाँ ब्रह्मादि देवता उनके चरणोंकी आराधना करते रहते हैं। लघुभागवतामृतमें श्रीविष्णुवर्णन प्रसङ्ग (पूर्वखण्ड २/३५-३८) श्लोकोंका मर्मानुवाद- “विष्णुधर्मोत्तरादिमें विष्णुप्रकाशके ब्रह्माण्डोंमें जिन सब पुरियोंका उल्लेख है, मैं संक्षेपमें उन सब पुरियोंका निर्देश करूँगा। जैसे-रुद्रलोकके ऊपरी भागमें पचास हजार योजन परिधिका 'विष्णुलोक' है, जहाँ कोई मायाबद्ध जीव नहीं जा सकता। उसके ऊपरी भागमें सुमेरुके पूर्वदिशामें लवण-समुद्रके मध्यभागमें जलमें अवस्थित बृहद् आकारका स्वर्णमय द्वीप 'महाविष्णुलोक' है, जहाँ ब्रह्मा कभी-कभी भगवान् विष्णुके दर्शनोंके लिये जाते हैं। इस लोकमें जनार्दन विष्णु लक्ष्मीके साथ वर्षाके चार मास 'शेष' शय्यापर शयन करते हैं। मेरुके पूर्वदिशामें क्षीरसमुद्रके मध्य क्षीराम्बुके बीचमें 'शुभ्रवर्णा' अन्य एक पुरी है, जिसमें भगवान् विष्णु ३०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/११०-११६ ] लक्ष्मीजीके साथ शेष-आसनपर बैठते हैं। वहाँपर भी भगवान् विष्णु वर्षके चार मास निद्रासुख अनुभव करते हैं। उसके ही दक्षिण दिशामें क्षीर-समुद्रके बीचमें ही पच्चीस-सहस्र योजन परिधिका 'श्वेतद्वीप' नामसे विख्यात परम सुन्दर एक द्वीप है।” ब्रह्माण्ड-पुराणमें भी कहा गया है-“क्षीरसमुद्रके द्वारा परिवेष्टित लाख योजन विस्तारका अत्यन्त विशाल अति सुन्दर स्वर्णमय द्वीपका नाम 'श्वेतद्वीप' है।” और भी विष्णुपुराणादिमें तथा महाभारतमें मोक्षधर्ममें भी कहा गया है कि क्षीरसमुद्रके उत्तरतटमें श्वेतद्वीप है। पद्मपुराणमें कहा गया है कि जलसमुद्रके उत्तरतटमें श्वेतद्वीप शोभित है। भागवत ११/१५/१८ श्लोकमें श्वेतद्वीप प्रसङ्ग द्रष्टव्य है। श्रीलघुभागवतामृत अन्तर्गत पुरुष-वर्णन प्रसङ्गमें १५ संख्यामें- “अथ यत्तु तृतीयं स्याद्रूपं तच्चाप्युदृश्यते। (भाः २/२/८) 'केचित्स्वदेहान्तः' इति द्वितीयस्कन्ध-पद्यतः ॥” श्रीबलदेव विद्याभूषण-टीका-“तथा च क्षीराब्धिपतिरनिरुद्धस्तृतीयः पुरुषः प्रादेशमात्रातद्गृविग्रहत्या सर्वजीवहृद्गतो ध्येयः इति।” अर्थात् “क्षीरोदशायी तृतीय पुरुष प्रादेशमात्र (प्रत्येक जीवके हृदयके अनुरूप आकारवाले) विग्रहयुक्त होकर सभी जीवोंके अन्तर्यामी रूपमें ध्येय हैं।” विष्णुवर्णनमें (३४ संख्या)में- “यो विष्णु पठ्यते सोऽसौ क्षीराम्बुधिशयो मतः। गर्भोदशायिनस्तस्य विलासत्वान्मुनीश्वरैः। नारायणो विराडन्तर्यामी चायं निगद्यते ॥” अर्थात् “जिनको विष्णु कहा जाता है, वे क्षीरोदशायी हैं; गर्भोदशायीका विलास होनेके कारण मुनिगण विष्णुको 'नारायण' और विराट्के अन्तर्यामी भी कहते हैं।”११०-११२॥ क्षीरोदशायीके ही युग-मन्वन्तरावतार :- युग-मन्वन्तरे धरि' नाना अवतार। धर्म स्थापन करे, अधर्म संहार ॥११३॥ देवगणे ना पाय याँहार दरशन। क्षीरोदकतीरे याइ' करेन स्तवन ॥११४॥ क्षीरोदशायी विष्णु ही जगत्पालक :- तबे अवतरि' करे जगत् पालन। अनन्त वैभव ताँर नाहिक गणन ॥११५॥ सेइ विष्णु हय याँर अंशांशेर अंश। सेइ-प्रभु नित्यानन्द-सर्व-अवतंस ॥११६॥ अनुवाद-प्रत्येक युग या मन्वन्तरमें ये क्षीरोदशायी ही विभिन्न अवतार धारणकर अधर्मका नाश करके धर्मकी स्थापना करते हैं। देवता लोग भी उनके दर्शन नहीं कर पाते हैं, वे केवल क्षीरसमुद्रके तटपर जाकर उनकी स्तुति करते हैं। तब वे अवतार ग्रहणकर जगत्का पालन करते हैं। उनके अनन्त वैभव हैं, जिसकी कोई गिनती नहीं है। ये विष्णु जिनके अंशके अंशके अंश हैं, वे श्रीनित्यानन्द प्रभु सर्वश्रेष्ठ हैं॥११३-११६॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०३
[ ५/११७-१२० उनका 'शेष'-नामक महासर्परूप :- सेइ विष्णु 'शेष'-रूपे धरेन धरणी। काँहा आछे मही, शिरे, हेन नाहि जानि॥११७॥ सहस्र विस्तीर्ण याँर फणार मण्डल। सूर्य जिनि' मणिगण करे झलमल॥११८॥ पञ्चाशत कोटि-योजन पृथिवी-विस्तार। याँर एकफणे रहे सर्षप-आकार॥११९॥ श्रीकृष्णभक्त शेषरूपी विष्णु :- सेइ त' 'अनन्त' 'शेष'-भक्त-अवतार। ईश्वरेर सेवा बिना नाहि जाने आर॥१२०॥ अनुवाद-वही विष्णु 'शेष' रूपमें पृथिवीको अपने मस्तकपर धारण करते हैं। उनके मस्तकपर पृथ्वी कहाँपर है, यह भी उन्हें पता नहीं चलता। उनके फैले हुए हजारों फणोंपर सूर्यसे अधिक झलमल करते हुए मणियाँ रहती हैं। पचास करोड़ योजनके विस्तारकी यह पृथ्वी है, जो उनके एक फणपर सरसोंके दानेकी भाँति रहती है। वे 'अनन्त'-शेष भक्त-अवतार हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं जानते हैं॥११७-१२०॥ अनुभाष्य-भाः ५/१७/२१ और भाः ५/२५/२ श्लोक द्रष्टव्य हैं। श्रीजीव गोस्वामीकृत श्रीकृष्णसन्दर्भ संख्या ८६में- “वासुदेवकलानन्तः सहस्रवदनः स्वराट्। अग्रतो भविता देवो हरेः प्रियचिकीर्षया॥ श्रीवसुदेवनन्दनस्य वासुदेवस्य कला प्रथमोऽंशः श्रीसङ्कर्षणः। स्वराट् स्वेनैव राजते इति। अतएव अनन्तः कालदेशपरिच्छेदरहितः; य एव शेषाख्यः सहस्रवदनोऽपि भवति। एकांशेन शेषाख्येन। स्कान्दे अयोध्या-माहात्म्ये-'ततः शेषात्मतां यातं लक्ष्मणं सत्यसङ्गरम्। उवाच मधुरं शक्रः सर्वस्य च स पश्यतः॥ वैष्णवं परमं स्थानं प्राप्नुहि स्वं सनातनम्। भवन्मूर्तिः समायाता शेषोऽपि विलसत्फणं॥' 'इत्युक्त्वा सुरराजेन्द्रो लक्ष्मणं सुरसङ्गतः। शेषं प्रस्थाप्य पाताले भूभारधारणक्षमम्॥' अतः (भाः १०/२/८) 'शेषाख्यं धाम मामकम्' इत्यत्रापि (भाः १०/२/२५) 'शिष्यते शेषसंज्ञः' इतिवत् अव्यभिचार्यश एवोच्यते। शेषस्याख्या ख्यातिर्यस्मादिति वा।” भगवान्की कला (अंशके अंश) श्रीअनन्तदेव सहस्र मुखवाले और स्वतन्त्र हैं। वे श्रीहरिके प्रियकार्य करनेके लिये सदा प्रस्तुत रहते हैं। वसुदेवनन्दन वासुदेवके प्रथम अंश सङ्कर्षण हैं। वे स्वप्रकाशित होनेके कारण स्वतन्त्र हैं, इसलिये वे अनन्त अर्थात् काल-देशकी सीमाओंसे परे हैं। वे सहस्रमुख 'शेष'रूपमें भी वर्तमान हैं। एकांश अर्थात् शेष-नामक अवताररूपमें। स्कन्दपुराणमें अयोध्या-माहात्म्यमें, सबके समक्ष भी देवराज इन्द्रने शेषरूपधारी सत्यप्रतिज्ञ लक्ष्मणसे कहा,-'आप अपने सनातन विष्णुधाममें गमन करें, जहाँ फणोंसे शोभित आपकी शेषमूर्ति भी विराजमान है।' यह कहकर देवराज इन्द्र भूभार धारण करनेमें समर्थ 'शेष'रूपी लक्ष्मणमूर्तिको पातालकी ओर भेजकर स्वयं अपने देवलोक चले गये। (अर्थात् सङ्कर्षणव्यूह लक्ष्मण श्रीरामके साथ अवतीर्ण हुए और पातालमें स्थित भूधारी 'शेष' उनके साथ आकर मिल गये। बादमें अप्रकटकाल आनेपर 'शेष' लक्ष्मणसे पृथक् होकर अपने धाम पातालमें और लक्ष्मण विष्णुधाम वैकुण्ठमें चले गये।) इस कारण 'शेष-नामक मेरा धाम' इस वाक्यमें ३०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१२०-१२५ ] भी—जिसके द्वारा अन्तिम सीमा प्राप्त होती है अर्थात् जो सबके बाद अवशिष्ट रूपमें रहते हैं, उन्हें 'शेष' कहा जाता है। जैसे मूल वस्तुसे उसका अवशिष्ट अभिन्न है, वैसे ही वासुदेवसे शेषका अभेदांशत्व कहा गया है अथवा जिनसे उनकी शेष नामक ख्याति है, वे 'शेष' हैं। लघुभागवतामृत (संख्या १९)में रुद्रतत्त्वके प्रसङ्गमें श्रीबलदेवभूषणकी टीका— “शेषवदिति—शार्ङ्गिणः शय्यारूपस्तदाधार-शक्तिः शेष ईश्वरकोटिः, भूधारी तु तदाविष्टौ जीवः।” अर्थात् “शार्ङ्ग-धनुषधारी विष्णुके शय्यारूप आधार-शक्ति 'शेष' ईश्वरकोटि हैं और भूधारी 'शेष' शक्त्याविष्ट जीवकोटिके अन्तर्गत आते हैं।” पुनः श्रीरामतत्त्वके प्रसङ्ग (संख्या २८)में— “सङ्कर्षणो द्वितीयो यो व्यूहो राम स एव हि। पृथ्वीधरेण शेषेण संभूय व्यक्तिमीयिवान्॥ शेषो द्विविधा—महीधारी शय्यारूपश्च शार्ङ्गिणः। तत्र सङ्कर्षणावेशाद् भूभृत् सङ्कर्षणो मतः। शय्यारूपस्तथा तस्य सख्यदास्याभिमानवान्॥” अर्थात् “जो चतुर्व्यूहके द्वितीय-सङ्कर्षण हैं, वे भूधारी शेषके साथ मिलकर श्रीबलराम रूपमें अवतीर्ण हुए। भूधारी और भगवान्की शय्यारूप भेदसे 'शेष' दो रूपोंमें हैं। भूधारी 'शेष' सङ्कर्षणके आवेशावतार हैं, इसलिये उन्हें भी 'सङ्कर्षण' कहते हैं। जो शय्यारूप हैं, वे अपनेको भगवान्के दास और सखा रूपमें मानते हैं॥”१२०॥ वे सर्वक्षण श्रीकृष्णकीर्तनमें रत और चतुःसनके उपदेष्टा :— सहस्र-वदने करे कृष्णगुण गान। निरवधि गुण गान, अन्त नाहि पान॥१२१॥ सनकादि भागवत सुने याँर मुखे। भगवानेर गुण कहे, भासे प्रेमसुखे॥१२२॥ दस देहसे श्रीकृष्णसेवा :— छत्र, पादुका, शय्या, उपाधान, वसन। आराम, आवास, यज्ञसूत्र, सिंहासन॥१२३॥ शेष-नामका कारण :— एत मूर्त्तिभेद करि' कृष्णसेवा करे। कृष्णेर शेषता पाञा 'शेष' नाम धरे॥१२४॥ सेइ त' अनन्त, याँर कहि एक कला। हेन प्रभु नित्यानन्द, के जाने ताँर खेला॥१२५॥ अनुवाद—वे अपने हजारों मुखोंसे निरन्तर श्रीकृष्णके गुणोंको कीर्तन करते हैं, परन्तु वे उसका अन्त नहीं पाते हैं। सनकादि ब्रह्माके मानस पुत्र चतुःसन उनसे भागवत श्रवण करते हैं और वे भी श्रीकृष्णके प्रेमसुखमें डूबकर उनके गुणोंको दोहराते रहते हैं। अनन्त-शेष छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, विश्रामपीठ, आवास, यज्ञसूत्र और सिंहासन रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। इतने रूप धारणकर वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवाकी अन्तिम सीमातक पहुँचनेके कारण उनका नाम 'शेष' हुआ है। उन 'अनन्त'को जिनकी पाँचवाँ अध्याय | ३०५
[ ५/१२१-१३२ एक कलाके रूपमें कहा है, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुकी लीलाओंको कौन जान सकता है ? ॥ १२१-१२५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'शेषता' अर्थात् चरम दास्य ॥ १२४ ॥ अनुभाष्य- (भाः १०/३/२५) - “भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ।” अर्थात् “प्रलयके बाद आप ही रहते हैं, इसलिये आप 'शेष' कहलाते हैं।” १२४॥ श्रीनित्यानन्दको 'अनन्त' अथवा श्रीकृष्णको 'विष्णु' कहना दोषपूर्ण नहीं :- एसब प्रमाणे जानि नित्यानन्द-तत्त्व-सीमा। ताँहाके 'अनन्त' कहि, कि ताँर महिमा ॥ १२६ ॥ अथवा भक्तेर वाक्य मानि सत्य करि'। सकल सम्भवे ताँते, याते अवतारी ॥ १२७ ॥ अवतार-अवतारी-अभेद, ये जाने। पूर्वे यैछे कृष्णके केहो काहो करि' माने ॥ १२८ ॥ अनुवाद-इस सब प्रमाणोंसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके तत्त्वकी सीमाको जाना जाता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुको 'अनन्त' कहनेसे क्या उनकी महिमा कही जाती है? अर्थात् उनको 'अनन्त' कहना भी उनकी महिमाको पूर्ण व्यक्त नहीं करना है। तो भी भक्तोंके इन वाक्योंको मैं सत्य मानता हूँ। वे अवतारी हैं, इसलिये उनमें सभी कुछ सम्भव है। भक्तलोग अवतारी और अवतारको अभेद जानते हैं। जैसे पूर्वकालमें अलग-अलग भक्तोंने श्रीकृष्णको अलग-अलग तत्त्वके रूपमें माना है॥ १२५-१२८ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो अवतार और अवतारीका भेद नहीं जानते हैं, वे जैसे पहले श्रीकृष्णको 'वामन' आदिके समान मानते हैं, उसी प्रकार अभेदकारी व्यक्ति श्रीनित्यानन्दको भी 'अनन्त' आदि कहते हैं। वास्तवमें भक्तलोग जब इस प्रकारसे कहते हैं, तो वह मिथ्या नहीं है, क्योंकि सर्वोच्च तत्त्वमें सभी कुछ ही सम्भव है ॥ १२८ ॥ विभिन्न अवतार रूपोंमें अवतारीकी ही संज्ञा :- केहो बले, कृष्ण साक्षात् नरनारायण। केहो कहे, कृष्ण हय साक्षात् वामन ॥ १२९ ॥ केहो कहे, कृष्ण क्षीरोदशायी-अवतार। असम्भव नहे, सत्य वचन सबार ॥ १३० ॥ कृष्ण यबे अवतरे सर्वांश-आश्रय। सर्वांश आसि' तबे कृष्णेते मिलय ॥ १३१ ॥ येइ येइ रूपे जाने, सेइ ताहा कहे। सकल सम्भवे कृष्णे, किछु मिथ्या नहे ॥ १३२ ॥ अनुवाद-कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण साक्षात् नर-नारायण हैं, कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण साक्षात् वामन हैं, कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण क्षीरोदशायीके अवतार हैं- यह सब असम्भव ३०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१२६-१३४ ] नहीं है; सबके वचन सत्य हैं। श्रीकृष्ण सभी अंशोंके आश्रय हैं, इसलिये जब वे अवतीर्ण होते हैं, तब सभी अंश आकर उनमें मिल जाते हैं। जो श्रीकृष्णके जिस-जिस रूपको जानता है, वह वैसा ही कहता है। इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है, श्रीकृष्णमें सब कुछ सम्भव है॥ १२९-१३२॥ अनुभाष्य - 'श्रीकृष्ण क्षीरोदशायीके अवतार हैं', 'श्रीकृष्ण परव्योमपति नारायणके प्रथमव्यूह वासुदेवके अवतार हैं', 'श्रीकृष्ण नारायणके विलास हैं' आदि पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये लघुभागवतामृतमें (३६४ संख्यामें) श्रीरूप गोस्वामी श्रीमद्भागवतके ३/२/१५ श्लोकको उद्धृत करके कह रहे हैं- "अपने शान्तरूप अर्थात् वसुदेवादि भक्तोंको घोररूप कंसादि दैत्योंके द्वारा पीड़ित होते देखकर चित्-अचित्के ईश्वर परम-दयालु श्रीकृष्ण अजन्मा होकर भी वैकुण्ठनाथादि विलासके साथ युक्त होकर कृष्णलोकसे प्रपञ्चमें काष्ठमेंसे अग्निके समान प्रकट हुए।" श्रीकृष्णके व्यूह अपने विलास-परव्योमनाथके व्यूहके साथ एक होकर प्रपञ्चमें प्रादुर्भूत हुए। श्रीकृष्ण अपने प्रसिद्ध अवतार 'पुरुषादि', श्रीराम, नृसिंह, वराह, वामन, नर-नारायण, हयग्रीव और अजित आदिके साथ सदा मिलित होकर अवस्थान करते हैं। श्रीवृन्दावनमें भी श्रीकृष्णमें उन-उन अवतारादिकी लीलाएँ दिखलायी देती हैं। इसलिये ब्रह्माण्डपुराणमें कहा गया है— "जो वैकुण्ठमें चतुर्भुज हैं, जो श्वेतद्वीपके स्वामी हैं, जो नरके सखा नारायण हैं, वे ही पुरुषोत्तम नन्दनन्दन हैं। जैसे महाग्निसे लाखों चिङ्गारियाँ निकलकर पुनः उसीमें ही विलीन हो जाती हैं, वैसे ही श्रीकृष्णके अन्य-अन्य असंख्य मनोहर अवतार पुनः उन्हींमें मिलकर एक जाते हैं।" इसलिये पुराणादिमें श्रीकृष्णको कोई नरसखा नारायण, कोई उपेन्द्र अर्थात् वामन, कोई-कोई क्षीरोदशायी, कोई सहस्रशीर्षा गर्भोदशायी, कोई वैकुण्ठनाथके रूपमें कहते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण-स्वरूपमें अवस्थित मूलसङ्कर्षणसे इच्छामात्रसे प्रकटित बद्रीनाथादिरूप उन-उन लीलाओंका दर्शन करके उन-उन मुनियोंने उन-उन लीलाभेदयुक्त विष्णुचरितोंके अनुगामी होकर उन-उन विष्णुरूपोंमें श्रीकृष्णको ही अभिहित किया है। इसलिये मूल अवतारीको 'अवतार' कहनेपर भी तत्त्वतः कोई दोष नहीं होता। आदिलीला २/११०-११५ द्रष्टव्य है ॥ १२६-१३२॥ अतएव श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि। सर्व अवतार-लीला करि' सबारे देखाइ ॥ १३३॥ अनुवाद - इसलिये श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने सभी अवतारोंकी लीलाओंको करके सबको दिखलाया है॥ १३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इसलिये सर्वोच्च तत्त्व श्रीकृष्णचैतन्यने वराह-नृसिंहादि अवतार-लीला करके दिखलायी है॥१३३॥ एइरूपे नित्यानन्द अनन्त-प्रकाश । सेइभावे कहे- 'मुञि चैतन्येर दास' ॥ १३४॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०७
[ ५/१३४-१३९ विभिन्नरूपोंसे, विभिन्न-भावोंसे, श्रीनित्यानन्दरामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :- कभु गुरु, कभु सखा, कभु भृत्य-लीला। पूर्वे येन तिनभावे व्रजे कैल खेला ॥ १३५ ॥ वृष हञा कृष्णसने माखामाखि रण। कभु कृष्ण करे ताँर पाद-सम्वाहन ॥ १३६ ॥ आपनाके भृत्य करि' कृष्णे प्रभु जाने। कृष्णेर कलार कला आपनाके माने ॥ १३७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुके भी अनन्त प्रकाश हैं। वे महाप्रभुके प्रेममें विभोर होकर स्वयंको उनका दास कहते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके कभी गुरुके रूपमें, कभी सखाके रूपमें, तो कभी दासके रूपमें लीला करते हैं; जैसे पहले श्रीबलरामने श्रीकृष्णके साथ इन तीन भावोंसे व्रजमें लीला की थी। खेलते हुए साँड़के समान श्रीबलराम श्रीकृष्णके साथ सिरसे सिरको लगाकर लड़ाई करते हैं, तो कभी स्वयं श्रीकृष्ण श्रीबलरामके चरणोंकी सेवा करते हैं। तो भी श्रीबलराम स्वयंको दास मानकर श्रीकृष्णको अपना प्रभु मानते हैं। वे स्वयंको श्रीकृष्णकी कलाकी कलाके रूपमें मानते हैं ॥ १३४-१३७ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/११/४०)- वृषायमाणौ नर्दन्तौ युयुधाते परस्परम्। अनुकृत्य रुतैर्जन्तूंश्चेरतुः प्राकृतौ यथा ॥ १३८ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १३८ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कभी तो साधारण बालकोंकी भाँति साँड़ बनकर हँकड़ते हुए दोनों भाई युद्ध करते हैं, तो कभी हंस-मयूर आदिका अनुकरण करते हुए उनकी ध्वनि करते हैं ॥ १३८ ॥ अनुभाष्य-इन दो श्लोकोंमें श्रीकृष्ण-बलरामकी बाल्यक्रीड़ाका वर्णन है- वृषायमाणौ (वृषवदाचरन्तौ) नर्दन्तौ (तद्वच्छब्दायमानौ) [कृष्ण-बलदेवौ] परस्परं युयुधाते। रुतैः (आनुकरणिकशब्दैः) जन्तून् अनुकृत्य प्राकृतौ बालकौ यथा तथा चेरतुः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १३८ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/१५/१४)- क्वचित् क्रीड़ा-परिश्रान्तं गोपोत्सङ्गोपबर्हणम्। स्वयं विश्रामयत्यार्यं पादसम्वाहनादिभिः ॥ १३९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १३९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कभी-कभी खेलते-खेलते थक जानेपर श्रीकृष्ण किसी सखाकी गोदमें सिर रखकर स्वयं शयन करते हैं और कभी श्रीबलदेवजीको सखाकी गोदमें शयन करवाकर उनके चरणोंकी सेवा करते हैं ॥ १३९॥ अनुभाष्य-क्वचित् क्रीड़ापरिश्रान्तं (क्रीड़या परिश्रान्तं) गोपोत्सङ्गोपबर्हणं (गोपोत्सङ्गः उपबर्हणम् उपादानं यस्य तम्) आर्यम् (अग्रजं बलदेवं) पादसम्वाहनादिभिः (पादसेवनादिभिः) स्वयं (कृष्णः) विश्रामयति (विगतश्रमं करोति)। ३०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१३९-१४१ ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१३९॥ श्रीकृष्णकी योगमायाके दर्शनसे श्रीबलदेवका विस्मय :- श्रीमद्भागवत (१०/१३/३७)— केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी। प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी ॥१४०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह माया कौनसी है? दैवी, मानुषी या आसुरी? मेरे प्रभु कृष्णकी मायाके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी माया मुझे विमोहित करनेमें समर्थ नहीं है॥१४०॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने गोवत्सोंका हरण किया, तो श्रीकृष्ण पुनः गोवत्सादिको सृष्टिकर पहलेकी भाँति लीला करते रहे। श्रीबलदेव एक दिन गौओंकी विचित्र क्रियाको समझकर विस्मित हुए थे- इयं (माया) का? कुतः वा आयाता ? किं दैवी (देवसम्बन्धिनी), नारी (नरसम्बन्धिनी)? वा (उत) आसुरी (असुरसम्बन्धिनी)? प्रायः माया मे (मम) भर्तुः (स्वामिनः भगवतः एव) अस्तु, अन्या (माया) न, (यतः) इयं मे (मम) अपि विमोहिनी। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४०॥ श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें षडैश्वर्य नित्य विद्यमान :- श्रीमद्भागवत (१०/६८/३७)— यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिललोकपालै- र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासित-तीर्थतीर्थम्। ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः श्रीश्चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व ? ॥१४१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-(श्रीबलदेव प्रभुने कहा) - सभी लोकपाल समस्त तीर्थोंकी तीर्थस्वरूप जिन कृष्णकी चरणधूलिको अपने मस्तकपर धारण करते हैं और ब्रह्मा, शिव, मैं बलदेव एवं लक्ष्मी-हम कोई उनके अंश अथवा अंशके अंशरूपमें जिनकी चरणधूलिको चिरकालसे धारण कर रहे हैं, उनके लिये साधारण राजसिंहासनका क्या महत्व है ? ॥१४१॥ अनुभाष्य-कौरवोंके द्वारा श्रीकृष्णकी निन्दाकर श्रीबलदेव प्रभुको अपने पक्षमें करनेके प्रयास करनेपर, श्रीबलदेव प्रभु रुष्ट होकर कौरवोंसे बोले- यस्य (कृष्णस्य) अंघ्रिपङ्कजरजः (पादपद्मरजः) अखिललोकपालैः (निखिलाधीश्वरैः) मौल्युत्तमैः (शिरोभूषणयुक्तैः उत्तमाङ्गैः) धृतं (धारण्या मनसि कृतम्), उपासिततीर्थतीर्थं (उपासितानि तीर्थानि यैः योगिभिः तेषाम् अपि तीर्थं) यस्य कलायाः कलाः (विकलाः) ब्रह्मा, भवः (शिवः) अहं (बलदेवः), श्री (लक्ष्मी च) अपि चिरं (चिरकालं) व्याप्य उद्वहेम (शिरसि उद्बोढुं प्रार्थयाम) अस्य (भगवतः कृष्णस्य) नृपासनं क्व (कुत्र)? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १४१ ॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०९
[ ५/१४२-१४५ स्वयंरूप श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर :- एकला ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य। यारे यैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य॥ १४२॥ श्रीगौरसुन्दर ही परमेश्वर, उनके सम्बन्धी-सब उनके दास :- एइ मत चैतन्यगोसाञि एकला ईश्वर। आर सब परिषद, केह वा किङ्कर॥ १४३॥ गुरुवर्ग, - नित्यानन्द, अद्वैत आचार्य। श्रीवासादि, आर यत- लघु, सम, आर्य॥ १४४॥ सबे परिषद, सबे लीलार सहाय। सबा लञा निज-कार्य साधे गौर-राय॥ १४५॥ अनुवाद-एक मात्र श्रीकृष्ण ही ईश्वर हैं और सब उनके दास हैं। वे जिसको जिस प्रकार नचाते हैं, वह उसी प्रकार नृत्य करता है। इसी प्रकार चैतन्य महाप्रभु भी एकमात्र ईश्वर हैं और सब उनके पार्षद या दास हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य और श्रीवासादि गुरुवर्ग तथा अन्य भक्तोंमें कोई उनके समान, उनसे छोटे या बड़े हैं, वे सभी गौराङ्ग महाप्रभुके परिकर हैं और उनकी लीलामें सहायक हैं। इन सबको लेकर गौराङ्ग महाप्रभु अपनी लीला सम्पन्न करते हैं॥ १४२-१४५॥ अमृतानुकणिका-शुद्ध वैष्णव धर्म ही एकमात्र एक-परमेश्वर अङ्गीकारी है। अन्य वैष्णवधर्मकी विकृति और छाया-प्रतिबिम्ब-स्वरूप जितने भी तथाकथित धर्मके लोग मुखसे अपनेको एक-ईश्वरवादी कहनेपर भी कार्यतः बहु-ईश्वरवादी, निरीश्वरवादी, कल्पित ईश्वरवादी, मायावादी, भगवत्-वस्तुमें जड़ारोपवादी, मनुष्यमें देवारोप-कल्पनावादी आदि प्रच्छन्न नास्तिक और नास्तिक-सम्प्रदाय हैं। पञ्चोपासक सम्प्रदायवाले मुखसे अपनेको एकेश्वरवादी कहते हैं, परन्तु वे कल्पित पाँच देवताओंकी पूजा करते हैं। वे कल्पित विष्णु, शिव, शक्ति (दुर्गा), गणेश और सूर्य-इन पाँच देवताओंमेंसे अपनी रुचिके अनुसार किसी एक देवताको इष्टरूपमें वरण करके स्वयंको साधक कहकर उसकी पूजा करते हैं। उनका विचार है कि ये पाँच देवता अथवा बहु-देवता एक ईश्वरके ही प्रतीक हैं। किन्तु पञ्चदेवता, बहुदेवता अथवा कल्पित एक देवताको वे अन्तमें खण्डित करके किसी निर्विशेष भाव-विशेषमें परिणत करेंगे। हाँ यदि, कल्पित देवताविशेषको या निर्विशेषभाव-विशेषको एकेश्वर कहा जाय, तब पञ्चोपासकगणोंको 'एकेश्वरवादी' कह सकते हैं। किन्तु कल्पित ईश्वरकी या निर्विशेषभावकी ईशिताका परिचय कहाँ है? जो देवता ईशित्वयकी (पूजककी) इन्द्रिय-रुचि या कल्पनाके द्वारा नियमित होकर कल्पित रूप, स्वरूपादिको प्राप्त हुए हैं, जिस ईश्वरकी सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रता नहीं है, जो ईश्वर नित्यकाल अपने ऐश्वर्यका परिचय नहीं दे सकते अर्थात् नित्य सविशेषत्वका संरक्षण करनेमें असमर्थ हैं (निर्विशेष-सागरमें विसर्जनके बाद स्वभावतः ही उनका पूर्व कल्पित ऐश्वर्य लुप्त हो जाता है), उनका तब ईश्वरत्व कहाँ है? ईश्वर, ईशित्व और ऐश्वर्य-ये तीन वस्तुएँ जहाँ युगपत् नित्य अवस्थित होती हैं, वहीं ईश्वर कहनेकी सार्थकता है। पञ्चोपासक सम्प्रदाय ३१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत