भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ५/१०३-१०४ जगत्की सृष्टि कराते हैं। इस प्रकारके ब्रह्माको 'जीवकोटि'का कहते हैं। और जिस कल्पमें इस प्रकार योग्य जीव नहीं होता है, उस कल्पमें गर्भोदशायी पुरुष ही अपने एक अंशसे ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टि करते हैं। इन ब्रह्माको 'ईश्वरकोटि' ब्रह्मा कहते हैं॥१०३॥ विष्णुरूप हञा करे जगत् पालने। गुणातीत विष्णु—स्पर्श नाहि माया-गुणे॥१०४॥ अनुवाद—वे द्वितीय पुरुष विष्णुरूप धारण करके जगत्का पालन करते हैं। वे गुणातीत हैं, मायाके गुण उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकते॥१०४॥ अनुभाष्य—भागवत १/२/२३ श्लोकके पुरुष ही ये गर्भोदशायी हैं। भागवत ३/८/१६ श्लोक द्रष्टव्य है। लघुभागवतामृतमें तीन पुरुषोंके प्रसङ्ग (७० संख्या)में— “सोऽस्य गर्भोदशयस्य विलासो यश्चतुर्भुजः। शेते प्रविश्य लोकाब्जं विष्णु-आख्यः क्षीरवारिधौ॥ अयञ्च स्थावरान्तानां सुरादीनां शरीरिणाम्। हृद्यन्तर्यामितां प्राप्तो नानारूप इव स्थितः। 'तृतीयं सर्वभूतस्थम्' इति विष्णोर्यदुच्यते। रूपं सात्वततन्त्रे तद्विलासोऽस्यैव सम्मतः॥” गर्भोदशायीके विलास जो चतुर्भुज मूर्ति हैं, लोकपद्ममें प्रवेश करके क्षीरसमुद्रमें शयन कर रहे हैं, वे 'विष्णु' नामसे जाने जाते हैं। वे विष्णु ही देवादिसे लेकर स्थावरतक सभी प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामी होकर उन नाना रूपोंकी भाँति अवस्थित हैं। सात्वत-तन्त्रमें 'तृतीय-पुरुष सर्वभूतस्थ' कहकर विष्णुके जिस रूपका उल्लेख है, वे इन गर्भोदशायी विष्णुकी विलासमूर्ति हैं। लघुभागवतामृतमें पुरुष-वर्णन प्रसङ्ग (संख्या २२)में श्रीबलदेव विद्याभूषणकी टीका— “विष्णुस्तु सत्त्वेनापि न युक्तः, किन्तु सङ्कल्पेनैव तन्नियमनमात्रकृत्, अतः 'श्रेयांसि तस्मात्' इत्युक्तम्।” अतएव वामनपुराणे— “ब्रह्मविष्णुवीश्वरूपाणि त्रीणि विष्णोर्महात्मनः। ब्रह्माणि ब्रह्मरूपः स शिवरूपः शिवे स्थितः। पृथगेव स्थितो देवो विष्णुरूपी जनार्द्दनः॥” अर्थात् “विष्णु सत्त्वगुणके अधिष्ठातृदेव होनेपर भी कभी भी सत्त्वगुणसे युक्त नहीं होते, किन्तु सङ्कल्पमात्रसे ही वे सत्त्वगुणके नियामक मात्र हैं। इसलिये यह कहा गया है कि 'उनसे ही जीवका मङ्गल साधित होता है'। इसलिये वामन पुराणमें कहा गया है—“एक विष्णु ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें हैं। ब्रह्मामें उनका ब्रह्मरूप है, शिवमें उनका शिवरूप है और विष्णुरूपी जनार्द्दन इन दोनोंसे पृथक् रूपमें अवस्थान करते हैं।” विष्णुवर्णनमें भी (२९-३० संख्यामें)— “विष्णुं सत्त्वं तनोतीति शास्त्रे सत्त्वतनुः स्मृतः। अवतारगणश्चास्य भवेत् सत्त्वतनुस्तथा। बहिरङ्गमधिष्ठानमिति वा तस्य तत्तनुः॥ अतो निर्गुणता सम्यक् सर्वशास्त्रे प्रसिद्धयति। तथाहि—(भाः १०/८८/५)— 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः।” सत्त्वगुणको विस्तार करनेके कारण शास्त्रोंमें विष्णुका नाम 'सत्त्वतनु' हुआ है। इसी प्रकार क्षीरोब्धिशायी विष्णुके अवतारोंको भी 'सत्त्वतनु' कहा गया है। अथवा वह सत्त्वरूप तनु (शरीर) उनका बहिरङ्ग अधिष्ठान होनेके कारण उनको 'सत्त्वतनु' कहा गया है। इन सब कारणोंसे सभी शास्त्रोंमें ही विष्णुको निर्गुण कहा गया है। दशम स्कन्धमें भी कहा गया है— “हरि निर्गुण, साक्षात् परमेश्वर, प्रकृतिसे अतीत, ब्रह्मादि देवताओंको ज्ञान प्रदान करनेवाले ३०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत