भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/९८-१०३ ] (नीचेके लोक) हैं। इस प्रकार ये चौदह भुवन हैं। भागवतके २/५/३८-४२, ११/४/३ और १/३/२, ४-५ श्लोक द्रष्टव्य हैं। (भागवत १/३/४)- “पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा सहस्रपादोरुभुजाननाद्भुतम्। सहस्रमूर्ध-श्रवणाक्षि-नासिकं-सहस्र-मौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत्॥” अर्थात् “योगीलोग भगवान्‌के जिस रूपका ध्यानमें दर्शन करते हैं, वह रूप हजारों पाँवों, जाँघों, भुजाओं, और मुखोंके कारण अत्यन्त अद्भुत है। उसके हजारों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं। हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डलादि आभूषणोंसे वह रूप सदा उल्लसित रहता है।” (ऋक् सं ८/४/१७, साम ६/४/४३, शुक्ल यजुः ३१/१, अथर्व १९/६/१)- “सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥” अर्थात् “जिनके सहस्र (अनन्त) शीर्ष (मस्तक) हैं, अनन्त नेत्र हैं, अनन्त चरण हैं, उन्होंने पृथ्वीको सम्पूर्णतः व्याप्त करके दस अङ्गुल अधिक बड़े होकर स्वयंको अभिव्यक्त किया है।” भागवत (११/४/४-५) और ब्रह्मसंहिता (५/१०-११) श्लोक द्रष्टव्य हैं॥९८-१०१॥ उनसे विष्णु, ब्रह्मा और रुद्रका उद्भव :- ताँर नाभिपद्म हैते उठिल एक पद्म। सेइ पद्मे हैल ब्रह्मार जन्म-सद्म ॥१०२॥ सेइ पद्मनाले हैल चौद्दभुवन। तेंहो ब्रह्मा हञा सृष्टि करिल सृजन ॥१०३॥ अनुवाद-गर्भोदशायी विष्णुके नाभिकमलसे एक कमल निकला और वह कमल ब्रह्माजीका जन्मस्थान हुआ। उस कमलनालमें चौदह भुवनोंकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार गर्भोदकशायी विष्णुने ब्रह्माके रूपमें सृष्टिकी रचना की॥१०२-१०३॥ अनुभाष्य-महाभारतमें मोक्षधर्ममें नारायणोपाख्यान (शान्तिपर्व ३३९/७०-७२ और ३४०/२७-२८ श्लोकों) में वर्णित है—'जो प्रद्युम्न हैं, वे ही अनिरुद्ध हैं और वे ही ब्रह्माके जनक हैं।' यहाँपर यही समझना होगा कि जो गर्भोदशायी हैं, वे ही क्षीरोदशायी हैं। दोनों ही अभिन्न होनेके कारण वस्तुतः प्रद्युम्न ही हिरण्यगर्भ ब्रह्माके नियामक हैं अर्थात् उनके अन्तर्यामी और जनक हैं। (भागवत ३/१/२) श्लोक द्रष्टव्य है॥१०२-१०३॥ अमृतानुकणिका-ब्रह्मा दो प्रकारके होते हैं-जीवकोटि और ईश्वरकोटि। भागवत (४/२४/२९) में कहा गया है- “स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम्। अर्थात् “जो जीव सौ जन्मों तक स्वधर्ममें निष्ठावान होते हैं, वे ब्रह्मत्व लाभ करते हैं।” जिस कल्पमें इस प्रकार योग्य जीव मिलता है, उस कल्पमें वही गर्भोदशायीकी नाभिकमलसे ब्रह्मारूपमें जन्म ग्रहण करता है और गर्भोदशायी उसमें शक्ति सञ्चार करके उसके द्वारा पाँचवाँ अध्याय | २९९