श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/९४-१०१ विष्णुने ब्रह्माण्डके भीतर प्रवेश करके देखा कि सब कुछ अन्धकारमय है और रहनेके लिये कोई स्थान नहीं है। तब वे विचार करने लगे॥ ९४-९५ ॥ अनुभाष्य-ब्रह्मसंहिता (५/१४)- “प्रत्येकमेवमेकांशाद् विशति स्वयं।” “ऐसे महाविष्णुने एक-एक अंशके द्वारा एक-एक ब्रह्माण्डमें प्रवेश किया।” मध्यलीला २०/२८३-२९३ द्रष्टव्य है ॥ ९४-९५ ॥ निजाङ्ग-स्वेदजल करिल सृजन। सेइ जले कैल अर्द्ध-ब्रह्माण्ड भरण ॥ ९६ ॥ अनुवाद-तब उन द्वितीय पुरुषने अपने अङ्गोंसे स्वेदजल (पसीने) की सृष्टि की और उस जलसे आधे ब्रह्माण्डको भर दिया ॥ ९६ ॥ अनुभाष्य-भागवत २/१०/१० श्लोक द्रष्टव्य है ॥ ९६ ॥ ब्रह्माण्ड-प्रमाण पश्चात्कोटि-योजन। आयाम, विस्तार, दुइ हय एक सम ॥ ९७ ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डकी लम्बाई और चौड़ाई, दोनों समान हैं तथा उनका परिमाण पचास करोड़ योजन है ॥ ९७ ॥ चौदह भुवनोंकी उत्पत्ति :- जले भरि' अर्द्ध ताहा कैल निज-वास। आर अर्धे कैल चौद्दभुवन-प्रकाश ॥ ९८ ॥ गर्भसागरमें निज वैकुण्ठधामका प्रकाश :- ताँहाइ प्रकट कैल वैकुण्ठ निज-धाम। शेष-शयन-जले करिल विश्राम ॥ ९९ ॥ ऋक्सूक्तमें स्तवनीय वस्तु :- अनन्तशय्याते ताँहा करिल शयन। सहस्र मस्तक ताँर सहस्र वदन ॥ १०० ॥ सहस्र-चरण-हस्त, सहस्र-नयन। सर्व अवतार-बीज, जगत्-कारण ॥ १०१ ॥ अनुवाद-जलसे ब्रह्माण्डको आधा भरकर गर्भोदशायी विष्णुने उसे अपना वासस्थान बना लिया। दूसरे आधे भागमें उन्होंने चौदह भुवनोंको प्रकट किया। उन्होंने उस वास स्थानमें वैकुण्ठ धामको प्रकट किया और शय्यारूप जलके ऊपर अनन्तशेष विश्राम करने लगे। अनन्तशेषको शय्या बनाकर गर्भोदशायी वहाँ शयन करने लगे। उनके हजारों सिर, हजारों मुख, हजारों चरण और हाथ एवं हजारों नेत्र हैं। वे सभी अवतारोंके बीज और जगत्के कारणस्वरूप हैं ॥ ९८-१०१ ॥ अनुभाष्य-'चौद्दभुवन' - भू, भुवः, स्वः, महः, जन, तपः और सत्य-ये सात ऊपरके भुवन (लोक) हैं एवं तल, अतल, वितल, नितल, तलातल, महातल तथा सुतल-ये सात पाताल २९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत