श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥” अर्थात् “इन्द्रियातीत मेरी मूर्तिके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है और समस्त भूत मुझमें अवस्थित हैं, किन्तु मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। मेरे असाधारण योगैश्वर्यको तो देखो, भूतसमूह मुझमें अवस्थित नहीं भी हैं। यद्यपि मेरा स्वरूप भूतधारक और भूतपालकका है, तथापि मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ॥”९०॥ सेइ त' पुरुष यॉर 'अंश' धरे नाम। चैतन्येर सङ्गे सेइ नित्यानन्द-राम॥९१॥ अनुवाद—उन पुरुष अर्थात् महाविष्णुको जिनका अंश कहा गया है, वे (अंशी) श्रीबलराम ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके साथ अवतरित हुए हैं॥९१॥ एइ त' नवम श्लोकेर अर्थ-विवरण। दशम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥९२॥ अनुवाद—यह नवें श्लोकका अर्थ था। अब दसवें श्लोकका अर्थ ध्यानपूर्वक श्रवण करो॥९२॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें दसवें श्लोकका अर्थ :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे— यस्यांशांशः श्रील गर्भोदशायी यन्नाभ्यब्जं लोकसंघातनालम्। लोकस्रष्टुः सूतिकाधाम धातुस्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥९३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके नाभिकमलकी नाल लोकस्रष्टा विधाताका (ब्रह्माजीका) सूतिकागृह (जन्मस्थान) और समस्त लोकोंका विश्रामस्थल है, वे गर्भोदशायी विष्णु जिनके अंशके अंश हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥९३॥ अनुभाष्य—यन्नाभ्यब्जं (यस्य नाभिकमलं) लोकसङ्घातनालं (लोकसमूहः चतुर्दशलोकं, नालं आधारो, यस्य तत्) धातुः लोकस्रष्टुः (ब्रह्मणः) सूतिकाधाम (जन्मगृहस्वरूपं) श्रील-गर्भोदशायी (द्वितीयपुरुषावतारः) यस्य नित्यानन्दरामस्य अंशांशः (कला), तं (श्रीनित्यानन्दरामम्) [अहं] प्रपद्ये। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९३॥ गर्भोदशायीका वर्णन :- सेइ त' पुरुष अनन्तब्रह्माण्ड सृजिया। सब अण्डे प्रवेजिला बहु-मूर्ति हञा॥९४॥ भितरे प्रवेशि' देखे सब अन्धकार। रहिते नाहिक स्थान करिल विचार॥९५॥ अनुवाद—प्रथम पुरुष अर्थात् कारणाब्धिशायी विष्णुने अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की और वे सभी ब्रह्माण्डोंमें एक-एक गर्भोदशायी विष्णु रूप धारणकर प्रवेश कर गये। गर्भोदशायी
पाँचवाँ अध्याय | २९७