भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 338

[ ५/८८-९० अचिन्त्यशक्तिमान् ईश्वरके साथ जगत्का भेदाभेद-सम्बन्ध :- एइ मत गीतातेह पुनः पुनः कय। सर्व्वदा ईश्वर-तत्त्व अचिन्त्यशक्ति हय॥८८॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतामें भी बारम्बार कहा गया कि ईश्वर-तत्त्व सदा अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं॥८८॥ आमि त' जगते बसि, जगत् आमाते। ना आमि जगते बसि, ना आमा जगते॥८९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है।॥८९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीकृष्णने कहा)—मैं जगत्में अवस्थित हूँ और जगत् भी मुझमें अवस्थित है। तो भी मैं जगत्में नहीं हूँ और जगत् भी मुझमें नहीं है—इसीको ‘अचिन्त्य अर्थ (ऐश्वर्य)’ कहा जाता है॥८९॥ अनुभाष्य—भगवान्‌के अस्तित्वके बिना दृश्य जगत्में किसीके भी अस्तित्वकी सम्भावना नहीं है। भगवान्में जगत् अवस्थित है, यह कहकर अचित्भोगमय दर्शनकी बाह्य प्रतीतिका भगवान् नहीं मानना चाहिये, भोगमय जगत्‌को भगवत्ता नहीं जानना चाहिये। भगवद्विमुखतारूप भोग या माया भगवान्‌में अवस्थित नहीं है, भगवद्विमुखता किसी प्रकारसे भी भगवत्-वस्तुमें नहीं रह सकती। जब अधोक्षज भगवान् जगत् या प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तब भी वे जगत्‌के अंश या नश्वर वस्तु नहीं होते और हो भी नहीं सकते। प्रकट और अप्रकट, दोनों लीलाओंमें ही वे मायासे अतीत और मायाके अधीश हैं अर्थात् निर्गुण-वैकुण्ठता उनमें नित्य वर्तमान होती है। विभिन्न लीलाभेदसे वे जगत्में अवतीर्ण होते हैं और जगत्‌की सभी वस्तु-सत्ताके वे मूल अधिष्ठातृदेव हैं। जगत् भी कभी उनसे अलग अस्तित्वयुक्त होकर किसी दूसरी वस्तुके रूपमें अवस्थान नहीं कर सकता। विष्णु स्वयं कभी भी प्राकृत जगत् या मायाके साथ संस्पर्शयुक्त नहीं होते। उनका अपना स्वरूप और तद्रूपवैभव भी किसी प्रकारसे भोगमय, सीमित जगत् या उनसे विमुख प्रकृतिके अन्तर्गत नहीं है—यही स्वेच्छामय, अचिन्त्य-ऐश्वर्यमय भगवान्‌का स्वतःकर्त्तृत्व और भगवत्ता है। श्रीमद्भागवत चतुःश्लोकीके अन्तर्गत २/९/३४ “यथा महान्ति” श्लोककी विभिन्न टीकाओंसे समन्वित ‘गौड़ीयभाष्य’ और (भागवत ११/१५/३६) श्लोक द्रष्टव्य हैं॥८९॥ अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ जानिह आमार। एइ त' गीतार अर्थ कैल परचार॥९०॥ अनुवाद—हे अर्जुन! इसे मेरा अचिन्त्य ऐश्वर्य जानो—श्रीकृष्णने इसी अर्थका गीतामें प्रचार किया है॥९०॥ अनुभाष्य—गीता (९/४-५) में— “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्त्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ २९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत