श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि सबका आश्रय होनेके कारण संसार उनमें अवस्थित है, तथापि अन्त़रात्माके रूपमें वे जगत्का आधार हैं। प्रकृतिके साथ उनका यह दो प्रकारका सम्बन्ध रहनेपर भी वे प्रकृतिस्पर्श-दोष स्वीकार नहीं करते॥८६॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २०/२८२ द्रष्टव्य है। लघुभागवतामृतमें विष्णुकी निर्गुणताके प्रसङ्गमें श्रीरूप गोस्वामीकी कारिका- “योगो नियामकतया गुणैः सम्बन्ध उच्यते। अतः स तैर्न युज्यते तत्र स्वांश परस्य यः॥” अर्थात् नियमकरूपमें गुणके साथ विष्णुका जो सम्बन्ध है, उसको 'योग' कहा जाता है। इसलिये वे पुरुष गुणके द्वारा कभी भी बद्ध नहीं होते। विशेषतः परम-पुरुषसे तत्त्वतः अभिन्न स्वांश-विष्णुगण, कोई भी, कभी भी, किसी प्रकारसे भी गुणके साथ युक्त नहीं होते। श्रीबलदेव विद्याभूषणकी टीका- “ननु परस्य पुंसः कथं गुणसम्बन्धः, 'माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना' (भाः २/७/४७) इत्यादि वाक्य विरोधादिति चेत्? तत्राह-योग इति। गुणा नियमाः, त्रिधाविर्भूतः पुरुषस्तु नियामक इति सम्बन्धः, स इह योग उच्यते, न तु तैर्बन्ध इत्यर्थः। स तु विष्णुर्नैव युज्यते, द्रुमिलयोगीशवाक्ये (भाः ११/४/५) तत्र गुणसम्बन्धानुल्लेखात्।” यदि कहें कि महाविष्णुका तो गुणके साथ सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता है? क्योंकि ऐसा होनेपर 'माया लज्जित होकर भगवान्से दूसरी ओर मुख करके अवस्थान करती है' इस वाक्यके साथ विरोध होता है। इसके उत्तरमें कहते हैं, - 'गुण' का अर्थ नियम है; विष्णु, ब्रह्मा और शिव-इन तीन रूपोंमें आविर्भूत 'पुरुष' का इस प्रकृतिसे उसके नियामक रूपमें सम्बन्ध है। जगत्में उस सम्बन्धको ही 'योग' नामसे कहा जाता है और उसे कभी भी तीन गुणोंके द्वारा 'बन्धन' नहीं कहा जाता। वे विष्णु कभी भी मायाके गुणोंके साथ युक्त नहीं होते, क्योंकि नवयोगेन्द्रोंमेंसे अन्यतम द्रुमिलके वाक्यमें विष्णुके साथ तीन गुणोंके सम्बन्धका कोई उल्लेख नहीं दिखलायी देता है। जगत्की सृष्टिमें उपादान और निमित्त, इन दो प्रकारके कारणोंमें भगवान्का ईक्षण-कर्त्तृत्व सम्बन्ध रहनेपर भी वे मायाके द्वारा किसी भी प्रकारसे प्रभावित नहीं होते हैं। भगवान्की इच्छाशक्तिका परिणाम यह विकारविशिष्ट जगत् है, किन्तु उनमें किसी जड़ विकारकी सम्भावना नहीं है। आदिलीला २/५२, ५४ द्रष्टव्य हैं॥८५-८६॥ श्रीमद्भागवत (१/११/३८)- एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥८७॥ अनुवाद-प्रकृतिमें रहकर उसके गुणोंके द्वारा वशीभूत नहीं होना ही भगवान्की भगवत्ता है। मायाबद्ध जीवोंकी बुद्धि जब भगवान्का आश्रय लेती है, तब मायाके समीप रहकर भी वे मायाके गुणोंसे संयुक्त नहीं होते हैं॥८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आदिलीला २/५५ द्रष्टव्य है॥८७॥ पाँचवाँ अध्याय | २९५