भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/१०४-१०९ ] और सबके साक्षी हैं, उनका भजन करनेसे निर्गुणता प्राप्त होती है।” इसलिये यही भागवत-पद्योंमें कहा है कि 'इन सत्त्वतनुसे सभी प्रकारका श्रेयः सम्पन्न होता है'॥१०४॥ रुद्ररूप धरि' करे जगत् संहार। सृष्टि-स्थिति-प्रलय-इच्छाय याँहार ॥१०५॥ अनुवाद—रुद्ररूप धारण करके वे गर्भोदशायी पुरुष जगत्का संहार करते हैं। उनकी इच्छासे जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होती है॥१०५॥ हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी, जगत्-कारण। याँर अंश करि' करे विराट-कल्पन॥१०६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गर्भोदशायी विष्णु ही हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी और जगत्के कारण हैं। उनके अंशकी ही 'विराट्रूपमें' कल्पना की गयी है॥१०६॥ हेन नारायण,—याँर अंशेर अंश। सेइ प्रभु नित्यानन्द—सर्व-अवतंस ॥१०७॥ अनुवाद—गर्भोदशायी नारायण जिनके अंशके अंश हैं, वे प्रभु श्रीनित्यानन्द सबसे श्रेष्ठ हैं॥१०७॥ दशम श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। एकादश श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥१०८॥ अनुवाद—यहाँ तक दसवें श्लोकके अर्थका वर्णन किया। अब ध्यानपूर्वक ग्यारहवें श्लोकका अर्थ श्रवण करो॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दशम श्लोकेर अर्थ'—दसवें श्लोक और उसके नीचे लिखे गये पद्यसमूहमें गर्भोदशायी विष्णुका विवरण है॥१०८॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें ग्यारहवें श्लोककी व्याख्या :— श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे— यस्यांशांशांशः परमात्माखिलानां पोष्टा विष्णुर्भाति दुग्धाब्धिशायी। क्षौणीभर्त्ता यत्कला सोऽप्यनन्त- स्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥१०९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके अंशांशके अंश सब जीवोंके परमात्मा और पालनकर्त्ता क्षीरोदशायी विष्णु हैं तथा जिनकी कला पृथ्वीधारी 'अनन्त' हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१०९॥ अनुभाष्य—अखिलानां (जीवानां) परात्मा (परमात्मा), पोष्टा (पोषणकर्त्ता), दुग्धाब्धिशायी (तृतीय-पुरुषावतारः क्षीरोदशायी) विष्णुः भाति, सोऽपि यस्यांशांशांशः (यस्य नित्यानन्दरामस्य अंशस्य अंशः कला तदंशः विकला); पाँचवाँ अध्याय | ३०१