श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/१०९-११२ यत् (यस्य क्षीरोदशायिनः) कला (अंशस्य अंशः), क्षोणीभर्त्ता (जगत्पालक वाः) सः अपि अनन्तः; तं श्रीनित्यानन्दरामम् [अहं] प्रपद्ये। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०९॥ क्षीरोदशायी विष्णुके धामका वर्णन :- नारायणेर नाभिनाल-मध्येते धरणी। धरणीर मध्ये सप्त समुद्र ये गणि॥११०॥ श्वेतद्वीप :- ताँहा क्षीरोदधि-मध्ये 'श्वेतद्वीप' नाम। पालयिता विष्णु, -ताँर सेइ निज धाम॥१११॥ व्यष्टिजीवके अन्तर्यामी :- सकल जीवेर तिँहो हुये अन्तर्यामी। जगत्-पालक तिँहो जगतेर स्वामी॥११२॥ अनुवाद-नारायण अर्थात् गर्भोदशायीके नाभिकमलसे निकली नालके भीतर चौदह लोक हैं और पृथ्वी उन लोकोंके मध्यमें है। पृथ्वीके मध्यमें सात समुद्र हैं। वहाँ क्षीरसमुद्रके बीचमें 'श्वेतद्वीप' नामक एक स्थान है, वह 'श्वेतद्वीप' जगत्का पालन करनेवाले विष्णुका निजधाम है। वे क्षीरदोशायी विष्णु ही सभी जीवोंके अन्तर्यामी हैं। वे जगत्का पालन करनेवाले और जगत्के स्वामी हैं॥११०-११२॥ अनुभाष्य-सिद्धान्तशिरोमणिमें वर्णन है- “भूमेरुधं क्षारसिन्धोरदक्स्थं जम्बुद्वीपं प्राहुरार्याार्यावर्याः। अर्धेऽन्यस्मिन्द्वीपषट्कस्य याम्ये क्षारक्षीराद्यम्बुधीनां निवेशः॥ लवणजलधिरादौ दुग्धसिन्धुश्च तस्मादमृतममृतरश्मि श्रीश्च यस्माद्बभूव। महितचरणपद्मः पद्मजन्मादिदेवैर्वसति सकलवासो वासुदेवश्च यत्र॥ दध्नो घृतस्येक्षुरसस्य तस्मान्मद्यस्य च स्वादुजलस्य चान्त्यः। स्वादुदकान्तर्बड़वानलोऽसौ पाताललोकाः पृथ्वीपुटानि॥” अर्थात् ये सात समुद्र इस प्रकार हैं-१) लवण-समुद्र, २) क्षीरसमुद्र, ३) दधिसमुद्र, ४) घृतसमुद्र, ५) गन्नेके रसका समुद्र, ६) मद्यसमुद्र और ७) स्वादिष्ट जलसमुद्र। लवणसमुद्रके दक्षिणमें क्षीरसमुद्र है, उसमें सबके आश्रय वासुदेव वास करते हैं और वहाँ ब्रह्मादि देवता उनके चरणोंकी आराधना करते रहते हैं। लघुभागवतामृतमें श्रीविष्णुवर्णन प्रसङ्ग (पूर्वखण्ड २/३५-३८) श्लोकोंका मर्मानुवाद- “विष्णुधर्मोत्तरादिमें विष्णुप्रकाशके ब्रह्माण्डोंमें जिन सब पुरियोंका उल्लेख है, मैं संक्षेपमें उन सब पुरियोंका निर्देश करूँगा। जैसे-रुद्रलोकके ऊपरी भागमें पचास हजार योजन परिधिका 'विष्णुलोक' है, जहाँ कोई मायाबद्ध जीव नहीं जा सकता। उसके ऊपरी भागमें सुमेरुके पूर्वदिशामें लवण-समुद्रके मध्यभागमें जलमें अवस्थित बृहद् आकारका स्वर्णमय द्वीप 'महाविष्णुलोक' है, जहाँ ब्रह्मा कभी-कभी भगवान् विष्णुके दर्शनोंके लिये जाते हैं। इस लोकमें जनार्दन विष्णु लक्ष्मीके साथ वर्षाके चार मास 'शेष' शय्यापर शयन करते हैं। मेरुके पूर्वदिशामें क्षीरसमुद्रके मध्य क्षीराम्बुके बीचमें 'शुभ्रवर्णा' अन्य एक पुरी है, जिसमें भगवान् विष्णु ३०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत