श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/११०-११६ ] लक्ष्मीजीके साथ शेष-आसनपर बैठते हैं। वहाँपर भी भगवान् विष्णु वर्षके चार मास निद्रासुख अनुभव करते हैं। उसके ही दक्षिण दिशामें क्षीर-समुद्रके बीचमें ही पच्चीस-सहस्र योजन परिधिका 'श्वेतद्वीप' नामसे विख्यात परम सुन्दर एक द्वीप है।” ब्रह्माण्ड-पुराणमें भी कहा गया है-“क्षीरसमुद्रके द्वारा परिवेष्टित लाख योजन विस्तारका अत्यन्त विशाल अति सुन्दर स्वर्णमय द्वीपका नाम 'श्वेतद्वीप' है।” और भी विष्णुपुराणादिमें तथा महाभारतमें मोक्षधर्ममें भी कहा गया है कि क्षीरसमुद्रके उत्तरतटमें श्वेतद्वीप है। पद्मपुराणमें कहा गया है कि जलसमुद्रके उत्तरतटमें श्वेतद्वीप शोभित है। भागवत ११/१५/१८ श्लोकमें श्वेतद्वीप प्रसङ्ग द्रष्टव्य है। श्रीलघुभागवतामृत अन्तर्गत पुरुष-वर्णन प्रसङ्गमें १५ संख्यामें- “अथ यत्तु तृतीयं स्याद्रूपं तच्चाप्युदृश्यते। (भाः २/२/८) 'केचित्स्वदेहान्तः' इति द्वितीयस्कन्ध-पद्यतः ॥” श्रीबलदेव विद्याभूषण-टीका-“तथा च क्षीराब्धिपतिरनिरुद्धस्तृतीयः पुरुषः प्रादेशमात्रातद्गृविग्रहत्या सर्वजीवहृद्गतो ध्येयः इति।” अर्थात् “क्षीरोदशायी तृतीय पुरुष प्रादेशमात्र (प्रत्येक जीवके हृदयके अनुरूप आकारवाले) विग्रहयुक्त होकर सभी जीवोंके अन्तर्यामी रूपमें ध्येय हैं।” विष्णुवर्णनमें (३४ संख्या)में- “यो विष्णु पठ्यते सोऽसौ क्षीराम्बुधिशयो मतः। गर्भोदशायिनस्तस्य विलासत्वान्मुनीश्वरैः। नारायणो विराडन्तर्यामी चायं निगद्यते ॥” अर्थात् “जिनको विष्णु कहा जाता है, वे क्षीरोदशायी हैं; गर्भोदशायीका विलास होनेके कारण मुनिगण विष्णुको 'नारायण' और विराट्के अन्तर्यामी भी कहते हैं।”११०-११२॥ क्षीरोदशायीके ही युग-मन्वन्तरावतार :- युग-मन्वन्तरे धरि' नाना अवतार। धर्म स्थापन करे, अधर्म संहार ॥११३॥ देवगणे ना पाय याँहार दरशन। क्षीरोदकतीरे याइ' करेन स्तवन ॥११४॥ क्षीरोदशायी विष्णु ही जगत्पालक :- तबे अवतरि' करे जगत् पालन। अनन्त वैभव ताँर नाहिक गणन ॥११५॥ सेइ विष्णु हय याँर अंशांशेर अंश। सेइ-प्रभु नित्यानन्द-सर्व-अवतंस ॥११६॥ अनुवाद-प्रत्येक युग या मन्वन्तरमें ये क्षीरोदशायी ही विभिन्न अवतार धारणकर अधर्मका नाश करके धर्मकी स्थापना करते हैं। देवता लोग भी उनके दर्शन नहीं कर पाते हैं, वे केवल क्षीरसमुद्रके तटपर जाकर उनकी स्तुति करते हैं। तब वे अवतार ग्रहणकर जगत्का पालन करते हैं। उनके अनन्त वैभव हैं, जिसकी कोई गिनती नहीं है। ये विष्णु जिनके अंशके अंशके अंश हैं, वे श्रीनित्यानन्द प्रभु सर्वश्रेष्ठ हैं॥११३-११६॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०३