भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 346

[ ५/११७-१२० उनका 'शेष'-नामक महासर्परूप :- सेइ विष्णु 'शेष'-रूपे धरेन धरणी। काँहा आछे मही, शिरे, हेन नाहि जानि॥११७॥ सहस्र विस्तीर्ण याँर फणार मण्डल। सूर्य जिनि' मणिगण करे झलमल॥११८॥ पञ्चाशत कोटि-योजन पृथिवी-विस्तार। याँर एकफणे रहे सर्षप-आकार॥११९॥ श्रीकृष्णभक्त शेषरूपी विष्णु :- सेइ त' 'अनन्त' 'शेष'-भक्त-अवतार। ईश्वरेर सेवा बिना नाहि जाने आर॥१२०॥ अनुवाद-वही विष्णु 'शेष' रूपमें पृथिवीको अपने मस्तकपर धारण करते हैं। उनके मस्तकपर पृथ्वी कहाँपर है, यह भी उन्हें पता नहीं चलता। उनके फैले हुए हजारों फणोंपर सूर्यसे अधिक झलमल करते हुए मणियाँ रहती हैं। पचास करोड़ योजनके विस्तारकी यह पृथ्वी है, जो उनके एक फणपर सरसोंके दानेकी भाँति रहती है। वे 'अनन्त'-शेष भक्त-अवतार हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं जानते हैं॥११७-१२०॥ अनुभाष्य-भाः ५/१७/२१ और भाः ५/२५/२ श्लोक द्रष्टव्य हैं। श्रीजीव गोस्वामीकृत श्रीकृष्णसन्दर्भ संख्या ८६में- “वासुदेवकलानन्तः सहस्रवदनः स्वराट्। अग्रतो भविता देवो हरेः प्रियचिकीर्षया॥ श्रीवसुदेवनन्दनस्य वासुदेवस्य कला प्रथमोऽंशः श्रीसङ्कर्षणः। स्वराट् स्वेनैव राजते इति। अतएव अनन्तः कालदेशपरिच्छेदरहितः; य एव शेषाख्यः सहस्रवदनोऽपि भवति। एकांशेन शेषाख्येन। स्कान्दे अयोध्या-माहात्म्ये-'ततः शेषात्मतां यातं लक्ष्मणं सत्यसङ्गरम्। उवाच मधुरं शक्रः सर्वस्य च स पश्यतः॥ वैष्णवं परमं स्थानं प्राप्नुहि स्वं सनातनम्। भवन्मूर्तिः समायाता शेषोऽपि विलसत्फणं॥' 'इत्युक्त्वा सुरराजेन्द्रो लक्ष्मणं सुरसङ्गतः। शेषं प्रस्थाप्य पाताले भूभारधारणक्षमम्॥' अतः (भाः १०/२/८) 'शेषाख्यं धाम मामकम्' इत्यत्रापि (भाः १०/२/२५) 'शिष्यते शेषसंज्ञः' इतिवत् अव्यभिचार्यश एवोच्यते। शेषस्याख्या ख्यातिर्यस्मादिति वा।” भगवान्की कला (अंशके अंश) श्रीअनन्तदेव सहस्र मुखवाले और स्वतन्त्र हैं। वे श्रीहरिके प्रियकार्य करनेके लिये सदा प्रस्तुत रहते हैं। वसुदेवनन्दन वासुदेवके प्रथम अंश सङ्कर्षण हैं। वे स्वप्रकाशित होनेके कारण स्वतन्त्र हैं, इसलिये वे अनन्त अर्थात् काल-देशकी सीमाओंसे परे हैं। वे सहस्रमुख 'शेष'रूपमें भी वर्तमान हैं। एकांश अर्थात् शेष-नामक अवताररूपमें। स्कन्दपुराणमें अयोध्या-माहात्म्यमें, सबके समक्ष भी देवराज इन्द्रने शेषरूपधारी सत्यप्रतिज्ञ लक्ष्मणसे कहा,-'आप अपने सनातन विष्णुधाममें गमन करें, जहाँ फणोंसे शोभित आपकी शेषमूर्ति भी विराजमान है।' यह कहकर देवराज इन्द्र भूभार धारण करनेमें समर्थ 'शेष'रूपी लक्ष्मणमूर्तिको पातालकी ओर भेजकर स्वयं अपने देवलोक चले गये। (अर्थात् सङ्कर्षणव्यूह लक्ष्मण श्रीरामके साथ अवतीर्ण हुए और पातालमें स्थित भूधारी 'शेष' उनके साथ आकर मिल गये। बादमें अप्रकटकाल आनेपर 'शेष' लक्ष्मणसे पृथक् होकर अपने धाम पातालमें और लक्ष्मण विष्णुधाम वैकुण्ठमें चले गये।) इस कारण 'शेष-नामक मेरा धाम' इस वाक्यमें ३०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत