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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ ५/११७-१२० उनका 'शेष'-नामक महासर्परूप :- सेइ विष्णु 'शेष'-रूपे धरेन धरणी। काँहा आछे मही, शिरे, हेन नाहि जानि॥११७॥ सहस्र विस्तीर्ण याँर फणार मण्डल। सूर्य जिनि' मणिगण करे झलमल॥११८॥ पञ्चाशत कोटि-योजन पृथिवी-विस्तार। याँर एकफणे रहे सर्षप-आकार॥११९॥ श्रीकृष्णभक्त शेषरूपी विष्णु :- सेइ त' 'अनन्त' 'शेष'-भक्त-अवतार। ईश्वरेर सेवा बिना नाहि जाने आर॥१२०॥ अनुवाद-वही विष्णु 'शेष' रूपमें पृथिवीको अपने मस्तकपर धारण करते हैं। उनके मस्तकपर पृथ्वी कहाँपर है, यह भी उन्हें पता नहीं चलता। उनके फैले हुए हजारों फणोंपर सूर्यसे अधिक झलमल करते हुए मणियाँ रहती हैं। पचास करोड़ योजनके विस्तारकी यह पृथ्वी है, जो उनके एक फणपर सरसोंके दानेकी भाँति रहती है। वे 'अनन्त'-शेष भक्त-अवतार हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं जानते हैं॥११७-१२०॥ अनुभाष्य-भाः ५/१७/२१ और भाः ५/२५/२ श्लोक द्रष्टव्य हैं। श्रीजीव गोस्वामीकृत श्रीकृष्णसन्दर्भ संख्या ८६में- “वासुदेवकलानन्तः सहस्रवदनः स्वराट्। अग्रतो भविता देवो हरेः प्रियचिकीर्षया॥ श्रीवसुदेवनन्दनस्य वासुदेवस्य कला प्रथमोऽंशः श्रीसङ्कर्षणः। स्वराट् स्वेनैव राजते इति। अतएव अनन्तः कालदेशपरिच्छेदरहितः; य एव शेषाख्यः सहस्रवदनोऽपि भवति। एकांशेन शेषाख्येन। स्कान्दे अयोध्या-माहात्म्ये-'ततः शेषात्मतां यातं लक्ष्मणं सत्यसङ्गरम्। उवाच मधुरं शक्रः सर्वस्य च स पश्यतः॥ वैष्णवं परमं स्थानं प्राप्नुहि स्वं सनातनम्। भवन्मूर्तिः समायाता शेषोऽपि विलसत्फणं॥' 'इत्युक्त्वा सुरराजेन्द्रो लक्ष्मणं सुरसङ्गतः। शेषं प्रस्थाप्य पाताले भूभारधारणक्षमम्॥' अतः (भाः १०/२/८) 'शेषाख्यं धाम मामकम्' इत्यत्रापि (भाः १०/२/२५) 'शिष्यते शेषसंज्ञः' इतिवत् अव्यभिचार्यश एवोच्यते। शेषस्याख्या ख्यातिर्यस्मादिति वा।” भगवान्की कला (अंशके अंश) श्रीअनन्तदेव सहस्र मुखवाले और स्वतन्त्र हैं। वे श्रीहरिके प्रियकार्य करनेके लिये सदा प्रस्तुत रहते हैं। वसुदेवनन्दन वासुदेवके प्रथम अंश सङ्कर्षण हैं। वे स्वप्रकाशित होनेके कारण स्वतन्त्र हैं, इसलिये वे अनन्त अर्थात् काल-देशकी सीमाओंसे परे हैं। वे सहस्रमुख 'शेष'रूपमें भी वर्तमान हैं। एकांश अर्थात् शेष-नामक अवताररूपमें। स्कन्दपुराणमें अयोध्या-माहात्म्यमें, सबके समक्ष भी देवराज इन्द्रने शेषरूपधारी सत्यप्रतिज्ञ लक्ष्मणसे कहा,-'आप अपने सनातन विष्णुधाममें गमन करें, जहाँ फणोंसे शोभित आपकी शेषमूर्ति भी विराजमान है।' यह कहकर देवराज इन्द्र भूभार धारण करनेमें समर्थ 'शेष'रूपी लक्ष्मणमूर्तिको पातालकी ओर भेजकर स्वयं अपने देवलोक चले गये। (अर्थात् सङ्कर्षणव्यूह लक्ष्मण श्रीरामके साथ अवतीर्ण हुए और पातालमें स्थित भूधारी 'शेष' उनके साथ आकर मिल गये। बादमें अप्रकटकाल आनेपर 'शेष' लक्ष्मणसे पृथक् होकर अपने धाम पातालमें और लक्ष्मण विष्णुधाम वैकुण्ठमें चले गये।) इस कारण 'शेष-नामक मेरा धाम' इस वाक्यमें ३०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१२०-१२५ ] भी—जिसके द्वारा अन्तिम सीमा प्राप्त होती है अर्थात् जो सबके बाद अवशिष्ट रूपमें रहते हैं, उन्हें 'शेष' कहा जाता है। जैसे मूल वस्तुसे उसका अवशिष्ट अभिन्न है, वैसे ही वासुदेवसे शेषका अभेदांशत्व कहा गया है अथवा जिनसे उनकी शेष नामक ख्याति है, वे 'शेष' हैं। लघुभागवतामृत (संख्या १९)में रुद्रतत्त्वके प्रसङ्गमें श्रीबलदेवभूषणकी टीका— “शेषवदिति—शार्ङ्गिणः शय्यारूपस्तदाधार-शक्तिः शेष ईश्वरकोटिः, भूधारी तु तदाविष्टौ जीवः।” अर्थात् “शार्ङ्ग-धनुषधारी विष्णुके शय्यारूप आधार-शक्ति 'शेष' ईश्वरकोटि हैं और भूधारी 'शेष' शक्त्याविष्ट जीवकोटिके अन्तर्गत आते हैं।” पुनः श्रीरामतत्त्वके प्रसङ्ग (संख्या २८)में— “सङ्कर्षणो द्वितीयो यो व्यूहो राम स एव हि। पृथ्वीधरेण शेषेण संभूय व्यक्तिमीयिवान्॥ शेषो द्विविधा—महीधारी शय्यारूपश्च शार्ङ्गिणः। तत्र सङ्कर्षणावेशाद् भूभृत् सङ्कर्षणो मतः। शय्यारूपस्तथा तस्य सख्यदास्याभिमानवान्॥” अर्थात् “जो चतुर्व्यूहके द्वितीय-सङ्कर्षण हैं, वे भूधारी शेषके साथ मिलकर श्रीबलराम रूपमें अवतीर्ण हुए। भूधारी और भगवान्‌की शय्यारूप भेदसे 'शेष' दो रूपोंमें हैं। भूधारी 'शेष' सङ्कर्षणके आवेशावतार हैं, इसलिये उन्हें भी 'सङ्कर्षण' कहते हैं। जो शय्यारूप हैं, वे अपनेको भगवान्‌के दास और सखा रूपमें मानते हैं॥”१२०॥ वे सर्वक्षण श्रीकृष्णकीर्तनमें रत और चतुःसनके उपदेष्टा :— सहस्र-वदने करे कृष्णगुण गान। निरवधि गुण गान, अन्त नाहि पान॥१२१॥ सनकादि भागवत सुने याँर मुखे। भगवानेर गुण कहे, भासे प्रेमसुखे॥१२२॥ दस देहसे श्रीकृष्णसेवा :— छत्र, पादुका, शय्या, उपाधान, वसन। आराम, आवास, यज्ञसूत्र, सिंहासन॥१२३॥ शेष-नामका कारण :— एत मूर्त्तिभेद करि' कृष्णसेवा करे। कृष्णेर शेषता पाञा 'शेष' नाम धरे॥१२४॥ सेइ त' अनन्त, याँर कहि एक कला। हेन प्रभु नित्यानन्द, के जाने ताँर खेला॥१२५॥ अनुवाद—वे अपने हजारों मुखोंसे निरन्तर श्रीकृष्णके गुणोंको कीर्तन करते हैं, परन्तु वे उसका अन्त नहीं पाते हैं। सनकादि ब्रह्माके मानस पुत्र चतुःसन उनसे भागवत श्रवण करते हैं और वे भी श्रीकृष्णके प्रेमसुखमें डूबकर उनके गुणोंको दोहराते रहते हैं। अनन्त-शेष छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, विश्रामपीठ, आवास, यज्ञसूत्र और सिंहासन रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। इतने रूप धारणकर वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवाकी अन्तिम सीमातक पहुँचनेके कारण उनका नाम 'शेष' हुआ है। उन 'अनन्त'को जिनकी पाँचवाँ अध्याय | ३०५

[ ५/१२१-१३२ एक कलाके रूपमें कहा है, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुकी लीलाओंको कौन जान सकता है ? ॥ १२१-१२५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'शेषता' अर्थात् चरम दास्य ॥ १२४ ॥ अनुभाष्य- (भाः १०/३/२५) - “भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ।” अर्थात् “प्रलयके बाद आप ही रहते हैं, इसलिये आप 'शेष' कहलाते हैं।” १२४॥ श्रीनित्यानन्दको 'अनन्त' अथवा श्रीकृष्णको 'विष्णु' कहना दोषपूर्ण नहीं :- एसब प्रमाणे जानि नित्यानन्द-तत्त्व-सीमा। ताँहाके 'अनन्त' कहि, कि ताँर महिमा ॥ १२६ ॥ अथवा भक्तेर वाक्य मानि सत्य करि'। सकल सम्भवे ताँते, याते अवतारी ॥ १२७ ॥ अवतार-अवतारी-अभेद, ये जाने। पूर्वे यैछे कृष्णके केहो काहो करि' माने ॥ १२८ ॥ अनुवाद-इस सब प्रमाणोंसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके तत्त्वकी सीमाको जाना जाता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुको 'अनन्त' कहनेसे क्या उनकी महिमा कही जाती है? अर्थात् उनको 'अनन्त' कहना भी उनकी महिमाको पूर्ण व्यक्त नहीं करना है। तो भी भक्तोंके इन वाक्योंको मैं सत्य मानता हूँ। वे अवतारी हैं, इसलिये उनमें सभी कुछ सम्भव है। भक्तलोग अवतारी और अवतारको अभेद जानते हैं। जैसे पूर्वकालमें अलग-अलग भक्तोंने श्रीकृष्णको अलग-अलग तत्त्वके रूपमें माना है॥ १२५-१२८ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो अवतार और अवतारीका भेद नहीं जानते हैं, वे जैसे पहले श्रीकृष्णको 'वामन' आदिके समान मानते हैं, उसी प्रकार अभेदकारी व्यक्ति श्रीनित्यानन्दको भी 'अनन्त' आदि कहते हैं। वास्तवमें भक्तलोग जब इस प्रकारसे कहते हैं, तो वह मिथ्या नहीं है, क्योंकि सर्वोच्च तत्त्वमें सभी कुछ ही सम्भव है ॥ १२८ ॥ विभिन्न अवतार रूपोंमें अवतारीकी ही संज्ञा :- केहो बले, कृष्ण साक्षात् नरनारायण। केहो कहे, कृष्ण हय साक्षात् वामन ॥ १२९ ॥ केहो कहे, कृष्ण क्षीरोदशायी-अवतार। असम्भव नहे, सत्य वचन सबार ॥ १३० ॥ कृष्ण यबे अवतरे सर्वांश-आश्रय। सर्वांश आसि' तबे कृष्णेते मिलय ॥ १३१ ॥ येइ येइ रूपे जाने, सेइ ताहा कहे। सकल सम्भवे कृष्णे, किछु मिथ्या नहे ॥ १३२ ॥ अनुवाद-कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण साक्षात् नर-नारायण हैं, कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण साक्षात् वामन हैं, कोई कहते हैं कि श्रीकृष्ण क्षीरोदशायीके अवतार हैं- यह सब असम्भव ३०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१२६-१३४ ] नहीं है; सबके वचन सत्य हैं। श्रीकृष्ण सभी अंशोंके आश्रय हैं, इसलिये जब वे अवतीर्ण होते हैं, तब सभी अंश आकर उनमें मिल जाते हैं। जो श्रीकृष्णके जिस-जिस रूपको जानता है, वह वैसा ही कहता है। इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है, श्रीकृष्णमें सब कुछ सम्भव है॥ १२९-१३२॥ अनुभाष्य - 'श्रीकृष्ण क्षीरोदशायीके अवतार हैं', 'श्रीकृष्ण परव्योमपति नारायणके प्रथमव्यूह वासुदेवके अवतार हैं', 'श्रीकृष्ण नारायणके विलास हैं' आदि पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये लघुभागवतामृतमें (३६४ संख्यामें) श्रीरूप गोस्वामी श्रीमद्भागवतके ३/२/१५ श्लोकको उद्धृत करके कह रहे हैं- "अपने शान्तरूप अर्थात् वसुदेवादि भक्तोंको घोररूप कंसादि दैत्योंके द्वारा पीड़ित होते देखकर चित्-अचित्के ईश्वर परम-दयालु श्रीकृष्ण अजन्मा होकर भी वैकुण्ठनाथादि विलासके साथ युक्त होकर कृष्णलोकसे प्रपञ्चमें काष्ठमेंसे अग्निके समान प्रकट हुए।" श्रीकृष्णके व्यूह अपने विलास-परव्योमनाथके व्यूहके साथ एक होकर प्रपञ्चमें प्रादुर्भूत हुए। श्रीकृष्ण अपने प्रसिद्ध अवतार 'पुरुषादि', श्रीराम, नृसिंह, वराह, वामन, नर-नारायण, हयग्रीव और अजित आदिके साथ सदा मिलित होकर अवस्थान करते हैं। श्रीवृन्दावनमें भी श्रीकृष्णमें उन-उन अवतारादिकी लीलाएँ दिखलायी देती हैं। इसलिये ब्रह्माण्डपुराणमें कहा गया है— "जो वैकुण्ठमें चतुर्भुज हैं, जो श्वेतद्वीपके स्वामी हैं, जो नरके सखा नारायण हैं, वे ही पुरुषोत्तम नन्दनन्दन हैं। जैसे महाग्निसे लाखों चिङ्गारियाँ निकलकर पुनः उसीमें ही विलीन हो जाती हैं, वैसे ही श्रीकृष्णके अन्य-अन्य असंख्य मनोहर अवतार पुनः उन्हींमें मिलकर एक जाते हैं।" इसलिये पुराणादिमें श्रीकृष्णको कोई नरसखा नारायण, कोई उपेन्द्र अर्थात् वामन, कोई-कोई क्षीरोदशायी, कोई सहस्रशीर्षा गर्भोदशायी, कोई वैकुण्ठनाथके रूपमें कहते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण-स्वरूपमें अवस्थित मूलसङ्कर्षणसे इच्छामात्रसे प्रकटित बद्रीनाथादिरूप उन-उन लीलाओंका दर्शन करके उन-उन मुनियोंने उन-उन लीलाभेदयुक्त विष्णुचरितोंके अनुगामी होकर उन-उन विष्णुरूपोंमें श्रीकृष्णको ही अभिहित किया है। इसलिये मूल अवतारीको 'अवतार' कहनेपर भी तत्त्वतः कोई दोष नहीं होता। आदिलीला २/११०-११५ द्रष्टव्य है ॥ १२६-१३२॥ अतएव श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि। सर्व अवतार-लीला करि' सबारे देखाइ ॥ १३३॥ अनुवाद - इसलिये श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने सभी अवतारोंकी लीलाओंको करके सबको दिखलाया है॥ १३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इसलिये सर्वोच्च तत्त्व श्रीकृष्णचैतन्यने वराह-नृसिंहादि अवतार-लीला करके दिखलायी है॥१३३॥ एइरूपे नित्यानन्द अनन्त-प्रकाश । सेइभावे कहे- 'मुञि चैतन्येर दास' ॥ १३४॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०७

[ ५/१३४-१३९ विभिन्नरूपोंसे, विभिन्न-भावोंसे, श्रीनित्यानन्दरामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :- कभु गुरु, कभु सखा, कभु भृत्य-लीला। पूर्वे येन तिनभावे व्रजे कैल खेला ॥ १३५ ॥ वृष हञा कृष्णसने माखामाखि रण। कभु कृष्ण करे ताँर पाद-सम्वाहन ॥ १३६ ॥ आपनाके भृत्य करि' कृष्णे प्रभु जाने। कृष्णेर कलार कला आपनाके माने ॥ १३७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुके भी अनन्त प्रकाश हैं। वे महाप्रभुके प्रेममें विभोर होकर स्वयंको उनका दास कहते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके कभी गुरुके रूपमें, कभी सखाके रूपमें, तो कभी दासके रूपमें लीला करते हैं; जैसे पहले श्रीबलरामने श्रीकृष्णके साथ इन तीन भावोंसे व्रजमें लीला की थी। खेलते हुए साँड़के समान श्रीबलराम श्रीकृष्णके साथ सिरसे सिरको लगाकर लड़ाई करते हैं, तो कभी स्वयं श्रीकृष्ण श्रीबलरामके चरणोंकी सेवा करते हैं। तो भी श्रीबलराम स्वयंको दास मानकर श्रीकृष्णको अपना प्रभु मानते हैं। वे स्वयंको श्रीकृष्णकी कलाकी कलाके रूपमें मानते हैं ॥ १३४-१३७ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/११/४०)- वृषायमाणौ नर्दन्तौ युयुधाते परस्परम्। अनुकृत्य रुतैर्जन्तूंश्चेरतुः प्राकृतौ यथा ॥ १३८ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १३८ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कभी तो साधारण बालकोंकी भाँति साँड़ बनकर हँकड़ते हुए दोनों भाई युद्ध करते हैं, तो कभी हंस-मयूर आदिका अनुकरण करते हुए उनकी ध्वनि करते हैं ॥ १३८ ॥ अनुभाष्य-इन दो श्लोकोंमें श्रीकृष्ण-बलरामकी बाल्यक्रीड़ाका वर्णन है- वृषायमाणौ (वृषवदाचरन्तौ) नर्दन्तौ (तद्वच्छब्दायमानौ) [कृष्ण-बलदेवौ] परस्परं युयुधाते। रुतैः (आनुकरणिकशब्दैः) जन्तून् अनुकृत्य प्राकृतौ बालकौ यथा तथा चेरतुः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १३८ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/१५/१४)- क्वचित् क्रीड़ा-परिश्रान्तं गोपोत्सङ्गोपबर्हणम्। स्वयं विश्रामयत्यार्यं पादसम्वाहनादिभिः ॥ १३९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १३९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कभी-कभी खेलते-खेलते थक जानेपर श्रीकृष्ण किसी सखाकी गोदमें सिर रखकर स्वयं शयन करते हैं और कभी श्रीबलदेवजीको सखाकी गोदमें शयन करवाकर उनके चरणोंकी सेवा करते हैं ॥ १३९॥ अनुभाष्य-क्वचित् क्रीड़ापरिश्रान्तं (क्रीड़या परिश्रान्तं) गोपोत्सङ्गोपबर्हणं (गोपोत्सङ्गः उपबर्हणम् उपादानं यस्य तम्) आर्यम् (अग्रजं बलदेवं) पादसम्वाहनादिभिः (पादसेवनादिभिः) स्वयं (कृष्णः) विश्रामयति (विगतश्रमं करोति)। ३०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१३९-१४१ ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१३९॥ श्रीकृष्णकी योगमायाके दर्शनसे श्रीबलदेवका विस्मय :- श्रीमद्भागवत (१०/१३/३७)— केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी। प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी ॥१४०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह माया कौनसी है? दैवी, मानुषी या आसुरी? मेरे प्रभु कृष्णकी मायाके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी माया मुझे विमोहित करनेमें समर्थ नहीं है॥१४०॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने गोवत्सोंका हरण किया, तो श्रीकृष्ण पुनः गोवत्सादिको सृष्टिकर पहलेकी भाँति लीला करते रहे। श्रीबलदेव एक दिन गौओंकी विचित्र क्रियाको समझकर विस्मित हुए थे- इयं (माया) का? कुतः वा आयाता ? किं दैवी (देवसम्बन्धिनी), नारी (नरसम्बन्धिनी)? वा (उत) आसुरी (असुरसम्बन्धिनी)? प्रायः माया मे (मम) भर्तुः (स्वामिनः भगवतः एव) अस्तु, अन्या (माया) न, (यतः) इयं मे (मम) अपि विमोहिनी। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४०॥ श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें षडैश्वर्य नित्य विद्यमान :- श्रीमद्भागवत (१०/६८/३७)— यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिललोकपालै- र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासित-तीर्थतीर्थम्। ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः श्रीश्चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व ? ॥१४१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-(श्रीबलदेव प्रभुने कहा) - सभी लोकपाल समस्त तीर्थोंकी तीर्थस्वरूप जिन कृष्णकी चरणधूलिको अपने मस्तकपर धारण करते हैं और ब्रह्मा, शिव, मैं बलदेव एवं लक्ष्मी-हम कोई उनके अंश अथवा अंशके अंशरूपमें जिनकी चरणधूलिको चिरकालसे धारण कर रहे हैं, उनके लिये साधारण राजसिंहासनका क्या महत्व है ? ॥१४१॥ अनुभाष्य-कौरवोंके द्वारा श्रीकृष्णकी निन्दाकर श्रीबलदेव प्रभुको अपने पक्षमें करनेके प्रयास करनेपर, श्रीबलदेव प्रभु रुष्ट होकर कौरवोंसे बोले- यस्य (कृष्णस्य) अंघ्रिपङ्कजरजः (पादपद्मरजः) अखिललोकपालैः (निखिलाधीश्वरैः) मौल्युत्तमैः (शिरोभूषणयुक्तैः उत्तमाङ्गैः) धृतं (धारण्या मनसि कृतम्), उपासिततीर्थतीर्थं (उपासितानि तीर्थानि यैः योगिभिः तेषाम् अपि तीर्थं) यस्य कलायाः कलाः (विकलाः) ब्रह्मा, भवः (शिवः) अहं (बलदेवः), श्री (लक्ष्मी च) अपि चिरं (चिरकालं) व्याप्य उद्वहेम (शिरसि उद्बोढुं प्रार्थयाम) अस्य (भगवतः कृष्णस्य) नृपासनं क्व (कुत्र)? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १४१ ॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०९

[ ५/१४२-१४५ स्वयंरूप श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर :- एकला ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य। यारे यैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य॥ १४२॥ श्रीगौरसुन्दर ही परमेश्वर, उनके सम्बन्धी-सब उनके दास :- एइ मत चैतन्यगोसाञि एकला ईश्वर। आर सब परिषद, केह वा किङ्कर॥ १४३॥ गुरुवर्ग, - नित्यानन्द, अद्वैत आचार्य। श्रीवासादि, आर यत- लघु, सम, आर्य॥ १४४॥ सबे परिषद, सबे लीलार सहाय। सबा लञा निज-कार्य साधे गौर-राय॥ १४५॥ अनुवाद-एक मात्र श्रीकृष्ण ही ईश्वर हैं और सब उनके दास हैं। वे जिसको जिस प्रकार नचाते हैं, वह उसी प्रकार नृत्य करता है। इसी प्रकार चैतन्य महाप्रभु भी एकमात्र ईश्वर हैं और सब उनके पार्षद या दास हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य और श्रीवासादि गुरुवर्ग तथा अन्य भक्तोंमें कोई उनके समान, उनसे छोटे या बड़े हैं, वे सभी गौराङ्ग महाप्रभुके परिकर हैं और उनकी लीलामें सहायक हैं। इन सबको लेकर गौराङ्ग महाप्रभु अपनी लीला सम्पन्न करते हैं॥ १४२-१४५॥ अमृतानुकणिका-शुद्ध वैष्णव धर्म ही एकमात्र एक-परमेश्वर अङ्गीकारी है। अन्य वैष्णवधर्मकी विकृति और छाया-प्रतिबिम्ब-स्वरूप जितने भी तथाकथित धर्मके लोग मुखसे अपनेको एक-ईश्वरवादी कहनेपर भी कार्यतः बहु-ईश्वरवादी, निरीश्वरवादी, कल्पित ईश्वरवादी, मायावादी, भगवत्-वस्तुमें जड़ारोपवादी, मनुष्यमें देवारोप-कल्पनावादी आदि प्रच्छन्न नास्तिक और नास्तिक-सम्प्रदाय हैं। पञ्चोपासक सम्प्रदायवाले मुखसे अपनेको एकेश्वरवादी कहते हैं, परन्तु वे कल्पित पाँच देवताओंकी पूजा करते हैं। वे कल्पित विष्णु, शिव, शक्ति (दुर्गा), गणेश और सूर्य-इन पाँच देवताओंमेंसे अपनी रुचिके अनुसार किसी एक देवताको इष्टरूपमें वरण करके स्वयंको साधक कहकर उसकी पूजा करते हैं। उनका विचार है कि ये पाँच देवता अथवा बहु-देवता एक ईश्वरके ही प्रतीक हैं। किन्तु पञ्चदेवता, बहुदेवता अथवा कल्पित एक देवताको वे अन्तमें खण्डित करके किसी निर्विशेष भाव-विशेषमें परिणत करेंगे। हाँ यदि, कल्पित देवताविशेषको या निर्विशेषभाव-विशेषको एकेश्वर कहा जाय, तब पञ्चोपासकगणोंको 'एकेश्वरवादी' कह सकते हैं। किन्तु कल्पित ईश्वरकी या निर्विशेषभावकी ईशिताका परिचय कहाँ है? जो देवता ईशित्वयकी (पूजककी) इन्द्रिय-रुचि या कल्पनाके द्वारा नियमित होकर कल्पित रूप, स्वरूपादिको प्राप्त हुए हैं, जिस ईश्वरकी सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रता नहीं है, जो ईश्वर नित्यकाल अपने ऐश्वर्यका परिचय नहीं दे सकते अर्थात् नित्य सविशेषत्वका संरक्षण करनेमें असमर्थ हैं (निर्विशेष-सागरमें विसर्जनके बाद स्वभावतः ही उनका पूर्व कल्पित ऐश्वर्य लुप्त हो जाता है), उनका तब ईश्वरत्व कहाँ है? ईश्वर, ईशित्व और ऐश्वर्य-ये तीन वस्तुएँ जहाँ युगपत् नित्य अवस्थित होती हैं, वहीं ईश्वर कहनेकी सार्थकता है। पञ्चोपासक सम्प्रदाय ३१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१४२-१४५ ] ईश्वर-धारणाकी इन तीन वस्तुओंके नित्य अस्तित्वका संरक्षण नहीं कर सकते। और यदि ऐसा संरक्षण कर सकें, तो 'ब्रह्मणोरूपकल्पना' या 'पञ्चोपासना' की बात ही चूर्ण-विचूर्ण हो जायेगी। इसलिये पारमार्थिकगणोंने सुयुक्तिके द्वारा विचारपूर्वक इन पञ्चोपासक मायावादी लोगोंमें आस्तिकताके अभावको लक्ष्य करके इन्हें 'प्रच्छन्न नास्तिक' या 'बहु-ईश्वरवादी' या 'निरीश्वरवादी' आदि रूपोंमें संज्ञा प्रदान की है। एकमात्र शुद्धवैष्णव-धर्ममें ही एक परमेश्वर स्वीकृत हैं। वैष्णवधर्ममें नित्य परमेश्वर, नित्य परमेशित्व और नित्य परमैश्वर्य स्वीकृत है। वैष्णव लोग किसी कल्पित ईश्वर, मानव-रुचिसे सृष्ट ईश्वर या पुतलीको स्वीकार नहीं करते। क्योंकि परमेश्वर-स्वराट्, निरङ्कुश स्वेच्छामय, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र, अद्वितीय लीलापुरुषोत्तम, स्वयं-रूप हैं। जैसे गीतामें श्रीकृष्णने कहा है- “मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥”(७/७) “हे धनञ्जय ! अन्य कुछ भी मुझसे श्रेष्ठ नहीं है, धागेमें मणियोंके सदृश ही यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें पिरोया हुआ है।” “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥” (१०/८) “मैं सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ, मुझसे ही सभी कार्यमें प्रवृत्त होते हैं-इस प्रकार समझकर पण्डितगण भावयुक्त होकर मुझे भजते हैं।” भागवत (१/३/२८)- “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥” “पहले कहे गये समस्त अवतारोंमेंसे कोई-कोई पुरुषके अंशावतार, कोई कलावतार और कोई शक्त्यावेश अवतार हैं। प्रत्येक युगमें जब भी जगत् असुरोंसे पीड़ित होता है, तब असुरोंके उपद्रवसे जगत्की रक्षा करनेके लिए ये अवतार हुआ करते हैं। किन्तु, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण तो साक्षात् स्वयं-भगवान् (अवतारी) हैं।” भागवत (१०/१४/३२)- “अहो भाग्यमहो भाग्यम् नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्मसनातनम्॥” “परमानन्दस्वरूप, पूर्णब्रह्म, सनातन आप जिनके सुहृद और सगे-सम्बन्धी हैं, उन नन्द-गोपादि प्रमुख व्रजवासियोंका कैसा महाभाग्य है! कैसा धन्य भाग्य है?” ब्रह्मसंहिता (५/१)- “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥” “सच्चिदानन्दविग्रह श्रीगोविन्द कृष्ण ही परमेश्वर हैं। वे अनादि, सबके आदि और समस्त कारणोंके कारण हैं।” इन सभी प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं और अन्य सभी उनके दास पाँचवाँ अध्याय | ३११

[ ५/१४२-१४९ हैं। परन्तु जो जीव स्वयंको भोक्ता मानते हैं, उनकी क्या गति होती है, इसे श्रीकृष्णने गीतामें सोलहवें अध्यायमें कहा है— “ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥ १४॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५॥ तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥” १९॥ “मैं ईश्वर, भोक्ता, सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ। मैं धनी और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है; मैं यज्ञ करूँगा, दान करूँगा और आनन्द प्राप्त करूँगा—वे अज्ञान द्वारा विमोहित होकर इस प्रकार कहते हैं। मैं साधुओंसे द्वेष करनेवाले, क्रूर और अशुभ कर्म करनेवाले तथा नराधम उन सबको संसारमें आसुरी योनियोंमें बार-बार निक्षेप करता हूँ (फेंकता हूँ)॥”१४२॥ श्रीगौरके दो अङ्ग—श्रीनिताइ और श्रीअद्वैत :— अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, —दुइ अङ्ग। दुइजन लञा प्रभुर यत किछु रङ्ग॥ १४६ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दोनों महाप्रभुके दो अङ्ग हैं, इन दोनोंको लेकर महाप्रभु अनेक प्रकारसे लीला करते हैं॥ १४६॥ अनुभाष्य—आदिलीला ३/७१ द्रष्टव्य है॥ १४६॥ महाविष्णुके अवतार होनेपर भी श्रीअद्वैतप्रभुका स्वयंमें श्रीगौरदास ज्ञानः— अद्वैत-आचार्य-गोसाञि साक्षात् ईश्वर। प्रभु-गुरु करि' माने, तिँहो त' किङ्कर ॥ १४७॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य साक्षात् ईश्वर हैं और महाप्रभु उन्हें अपने गुरुतुल्य मानते थे। किन्तु श्रीअद्वैताचार्य अपनेको महाप्रभुका दास मानते थे॥ १४७॥ अनुभाष्य—महाप्रभुका श्रीअद्वैताचार्यको गुरुवर्गोंमेंसे अन्यतम मानकर सम्मान करनेपर भी श्रीअद्वैतप्रभु अपनेको महाप्रभुका दास मानते थे। वे महाप्रभुके पिताजीके समवयस्क और बन्धु थे। वे और श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य थे। महाप्रभुने श्रीईश्वरपुरीजीसे दीक्षा ग्रहण की, इसलिये श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके गुरुके सतीर्थ (गुरुभाई) और गौरवके पात्र थे॥१४७॥ आचार्य-गोसाञिर तत्त्व ना याय कथन। कृष्ण अवतारिया यँहो तारिल भुवन ॥ १४८॥ अनुवाद—मैं श्रीअद्वैताचार्यके तत्त्वका वर्णन क्या करूँ, श्रीकृष्णको अवतीर्ण करवाकर उन्होंने जगत्का उद्धार किया है॥ १४८॥ कनिष्ठ लक्ष्मणारूपमें ज्येष्ठ श्रीरामचन्द्रकी सेवा फलसे श्रीकृष्णावतारमें श्रीबलराम ज्येष्ठ और श्रीकृष्ण कनिष्ठ भ्राता :— नित्यानन्द-स्वरूप पूर्वे हइया लक्ष्मण। लघुभ्राता हैया करे रामेर सेवन ॥ १४९॥ ३१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१४९-१५४ ] अनुवाद—श्रीनित्यानन्द स्वरूप पहले रामलीलामें लक्ष्मण थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्रकी छोटे भाईके रूपमें सेवा की थी॥१४९॥ अनुभाष्य—दशनामी दण्डी दलमें ब्रह्मचारीकी उपाधियाँ चार प्रकार हैं,—'स्वरूप', 'आनन्द', 'प्रकाश' और 'चैतन्य'। श्रीनित्यानन्द प्रभु तीर्थभ्रमणके समय जिस संन्यासीके पास थे, उनकी 'तीर्थ' या 'आश्रम' उपाधि होनेके कारण उनका ब्रह्मचारी नाम 'नित्यानन्द-स्वरूप' हुआ था॥१४९॥ रामेर चरित्र सब,—दुःखेर कारण। स्वतन्त्र लीलाय दुःख सहेन लक्ष्मण॥१५०॥ निषेध करिते नारे, याते छोट भाइ। मौन धरि' रहे लक्ष्मण मने दुःख पाइ'॥१५१॥ कृष्ण अवतारे ज्येष्ठ हैला सेवार कारण। कृष्णके कराइल नाना सुख आस्वादन॥१५२॥ अनुवाद—श्रीरामचन्द्रकी लीला बहुत दुःखपूर्ण है। लक्ष्मणने अपनी इच्छासे उन दुःखोंको सहन किया। लक्ष्मण छोटे भाई होनेके कारण श्रीरामचन्द्रको किसी भी कार्यके लिये मना नहीं कर पाते थे। वे मौन रहकर मन-ही-मनमें दुःख सहन करते थे। इसलिये कृष्णावतारमें उन्होंने बड़े भाई श्रीबलरामके रूपमें श्रीकृष्णकी सब प्रकारसे सेवा की और उन्हें नाना प्रकारसे सुखका आस्वादन कराया॥१५०-१५२॥ श्रीकृष्ण-बलराम अंशी और श्रीराम-लक्ष्मण अंश; अंशीके अवतारकालमें अंशका उनमें प्रवेश :— राम-लक्ष्मण—कृष्ण-रामेर अंशविशेष। अवतारकाले दोंहे दोंहाते प्रवेश॥१५३॥ अनुवाद—श्रीराम-लक्ष्मण श्रीकृष्ण-बलरामके अंश हैं। जब श्रीकृष्ण-बलराम अवतार ग्रहण करते हैं, तब श्रीराम-लक्ष्मण दोनों उन दोनोंमें प्रवेश कर जाते हैं॥१५३॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतमें श्रीराघवेन्द्र-तत्त्व वर्णन प्रसङ्गमें संख्या २०का मर्मानुवाद— “विष्णुधर्मोत्तरमें राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको क्रमशः वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धके अवतार तथा पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्रको नारायण और लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नको क्रमशः 'शेष', 'चक्र' तथा 'शंख' कहा गया है॥”१५३॥ सेइ अंश लञा ज्येष्ठ-कनिष्ठाभिमान। अंशांशि-रूपे शास्त्रे करये व्याख्यान॥१५४॥ अनुवाद—श्रीबलराम और श्रीकृष्ण बड़े और छोटे भाईके रूपमें लीला करते हैं। परन्तु शास्त्र उनका वर्णन अंश और अंशीके रूपमें करते हैं॥१५४॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतमें लीला-अवतार निरूपण प्रसङ्गमें ७९-संख्याका अनुवाद— “स्कन्दपुराणमें रामगीतामें लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—इन तीनोंको श्रीरामका व्यूह कहा गया है॥”१५४॥ पाँचवाँ अध्याय | ३१३

[ ५/१५५-१६० श्रीकृष्ण ही स्वयंरूप, अन्य सब अवतार उनके अंश अथवा कला :- ब्रह्मसंहिता (५/३९)- रामादिमूर्त्तिषु कलानियमेन तिष्ठन् नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु। कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान यो गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ॥ १५५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १५५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अंश-कलारूपमें रामादि मूर्तियोंमें भगवान् जगत्में नाना अवतारोंको प्रकाश करते हैं, किन्तु जो परमपुरुष स्वयं श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट होते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ १५५॥ अनुभाष्य-यः परमः पुमान् कृष्णः कलानियमेन (अंशांशभावादिना) रामादिमूर्त्तिषु तिष्ठन् (तत्तन्नैमित्तिकावतारमूर्त्तीः प्रकटयन्) नानावतारम् अकरोत्, किन्तु स्वयं समभवत्, तं गोविन्दम् आदिपुरुषम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १५५ ॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा ही नामप्रेम-प्रचाररूप श्रीगौरवाञ्छा-पूर्ण :- श्रीचैतन्य-सेइ कृष्ण, नित्यानन्द-राम। नित्यानन्द पूर्ण करे चैतन्येर काम ॥ १५६॥ नित्यानन्द-महिमा-सिन्धु अनन्त, अपार। एक कणा स्पर्शि मात्र,-से कृपा ताँहार ॥ १५७॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु ही स्वयं श्रीकृष्ण हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीबलराम हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीचैतन्य महाप्रभुकी सभी इच्छाओंको पूर्ण करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका समुद्र अनन्त और अपार है। उनकी कृपासे ही मैं उसके एक बिन्दुको स्पर्श कर सकता हूँ॥ १५६-१५७॥ अपने वृत्तान्तके द्वारा श्रीनित्यानन्द-कृपा-महात्म्य-वर्णन :- आर एक शुन ताँर कृपार महिमा। अधम जीवेर यैछे चड़ाइल ऊर्ध्वसीमा ॥ १५८॥ वेदगुह्य कथा एइ अयोग्य कहिते। तथापि कहिये ताँर कृपा प्रकाशिते ॥ १५९॥ उल्लास-उपरि लेखौं तोमार प्रसाद। नित्यानन्द प्रभु, मोर क्षम अपराध ॥ १६०॥ अनुवाद-उनकी कृपाकी एक और महिमाको सुनो। उन्होंने इस अधम जीव (ग्रन्थकार) को ऊँचाईकी सीमातक चढ़ाया है। इस बातको लोगोंके सामने प्रकाशित करना उचित नहीं है, इसे वेदोंके समान गोपनीय रखना चाहिये। परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाको सबके समक्ष प्रकाशित करनेके लिये मैं इसे कह रहा हूँ। हे श्रीनित्यानन्द प्रभु! मैं उल्लसित होकर आपकी कृपाकी कथाको लिख रहा हूँ। मेरा यह अपराध आप क्षमा करें ॥ १५८-१६०॥ ३१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१६०-१६५ ] अमृतप्रवाह भाष्य—'उल्लास-उपरि' अर्थात् अत्यन्त उल्लसित होनेके कारण इसे गोपनीय रखनेमें अक्षम, मैं आपकी कृपाका वृत्तान्त लिख रहा हूँ॥१६०॥ सेवक-महात्म्य-वर्णन ; मीनकेतन रामदास :— अवधूत गोसाञिर एक भृत्य प्रेमधाम। मीनकेतन रामदास हय ताँर नाम॥१६१॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक सेवक थे, जिनका नाम मीनकेतन रामदास था। वे प्रेमके धामस्वरूप थे॥१६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अवधूत गोसाञि'—श्रीनित्यानन्द प्रभु। 'प्रेमधाम'—प्रेमके आधार॥१६१॥ अनुभाष्य—अवधूत शब्दका अर्थ भागवत ३/१/१९ श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामिपादने 'असंस्कृत-देह' लिखा है। अवधूत श्रीनित्यानन्दके शिष्य भी महाभागवत परमहंस एवं वर्णाश्रमसे अतीत नित्यसिद्ध थे। इसलिये उनके शरीरमें वर्णाश्रमके कोई चिह्न नहीं होनेके कारण वे असंस्कृत-देहसे ब्रजभावमें मत्त रहते थे। 'मीनकेतन रामदास'—आदिलीला ११/५३ पयारका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१६१॥ आमार आलये अहोरात्र-सङ्कीर्त्तन। ताहाते आइला तेंहो पाञा निमन्त्रण॥१६२॥ अनुवाद—एक बार मेरे घरमें एक दिन-रात कालका सङ्कीर्तन हो रहा था। उस सङ्कीर्तन उत्सवमें मीनकेतन रामदास निमन्त्रण पाकर आये थे॥१६२॥ अनुभाष्य—'अहोरात्र' अर्थात् आठ प्रहर। उस समय कीर्तन-उत्सवोंमें शुद्धभक्तोंकी आपसमें निमन्त्रण-पत्र देनेकी रीति थी॥१६२॥ महाप्रेममय तिँहो बसिला अङ्गने। सकल वैष्णव ताँर वन्दिला चरणे॥१६३॥ नमस्कार करिते, का'र उपरेते चड़े। प्रेमे का'रे वंशी मारे, काहाके चापड़े॥१६४॥ अनुवाद—प्रेममें डूबे हुए मीनकेतन रामदास आङ्गनमें बैठ गये। सभी वैष्णवोंने उनके चरणोंकी वन्दना की। भगवत्प्रेममें उन्मत्त होकर वे किसीको नमस्कार करते, किसीके ऊपर चढ़ जाते, किसीको प्रेमसे वंशी मारते, तो किसीको थप्पड़ मारते॥१६३-१६४॥ ये नयन देखिते अश्रु हय मने यार। सेइ नेत्रे अविच्छिन्न बहे अश्रुधार॥१६५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मीनकेतन रामदासके नेत्रोंको देखते ही देखनेवालेके नेत्रोंसे स्वतः ही अश्रु बहने लगते, क्योंकि उनके नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुकी धारा बहती रहती थी। किसी अन्य संस्करणमें—'ये नयने देखिते' है अर्थात् जिसके मनमें इन नेत्रोंमें अश्रु देखनेकी इच्छा हो, उसके नेत्र भी अश्रु वहन करें॥१६५॥ पाँचवाँ अध्याय | ३१५

[ ५/१६६-१७१ कभु कोन अङ्गे देखि पुलक-कदम्ब। एक अङ्गे जाड्य ताँर, आर अङ्गे कम्प॥१६६॥ अनुवाद—कभी-कभी उनके किसी अङ्गमें पुलकादि सात्त्विक विकार दिखलायी देते, कभी उनके एक अङ्गमें जड़ता आ जाती और दूसरे किसी अङ्गमें कम्प होने लगता॥१६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कदम्ब'—समूह। 'जाड्य'—स्तम्भित होना॥१६६॥ नित्यानन्द बलि' यबे करेन हुङ्कार। ताहा देखि' लोकेर हय महाचमत्कार॥१६७॥ अनुवाद—'श्रीनित्यानन्द' बोलकर जब वे हुङ्कार करते थे, तब उसे देखकर सभी लोग चकित हो जाते थे॥१६७॥ अश्रद्धाके कारण वैष्णवचरणोंमें प्राकृत कनिष्ठ भक्तका अपराध :- गुणार्णव मिश्र-नामे एक विप्र आर्य। श्रीमूर्ति-निकटे तँहो करे सेवाकार्य॥१६८॥ अङ्गने बसिया तँहो ना कैल सम्भाष। ताहा देखि' क्रुद्ध हञा बले रामदास॥१६९॥ 'एइ त' द्वितीय सूत रोमहर्षण। बलदेव देखि' ये ना कैल प्रत्युद्गम॥'१७०॥ अनुवाद—गुणार्णव मिश्र नामक एक सम्माननीय ब्राह्मण श्रीविग्रहकी सेवा कर रहे थे। गुणार्णव मिश्रने वहीं आङ्गनमें बैठे हुए मीनकेतन रामदासको देखकर भी उनका सम्मान नहीं किया। यह देखकर रामदास क्रोधित होकर बोले कि यह तो दूसरा रोमहर्षण सूत है, जिसने श्रीबलदेव प्रभुको देखकर भी व्यास-आसनसे उठकर अभिवादन नहीं किया था॥१६८-१७०॥ अनुभाष्य—भागवत १०/७८/२२-२८ श्लोकोंमें नैमिषारण्यमें श्रीबलदेव प्रभुके द्वारा व्यासदेवके शिष्य रोमहर्षणके वधका वृत्तान्त वर्णित हुआ है॥१७०॥ अपमानित होनेपर भी वैष्णव अदोषदर्शी :- एत बलि' नाचे गाय, करये सन्तोष। कृष्णकार्य करे विप्र—ना करिल रोष॥१७१॥ अनुवाद—ऐसा कहकर उसके अपराधको ग्रहण ना करके मीनकेतन दास मन भरकर नाचते-गाते रहे। वह ब्राह्मण श्रीकृष्णकी सेवा कर रहा था, इसलिये वह भी क्रोधित नहीं हुआ॥१७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीविग्रहके सेवक गुणार्णवमिश्रने आङ्गनमें बैठे हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके दासकी ओर मौन रहकर सम्मान नहीं दिया, इस कारण मीनकेतन रामदासने क्रोधित होकर कहा—'यह गुणार्णवमिश्र द्वितीय रोमहर्षण सूत है।' इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार नैमिषारण्य-क्षेत्रमें श्रीबलदेव प्रभुको देखकर रोमहर्षण सूतने व्यास-आसनसे उठकर उनसे वार्त्तालाप नहीं किया था, उसी प्रकार गुणार्णवमिश्रने भी अन्यायका व्यवहार किया था। गुणार्णव मिश्रके मनमें श्रीनित्यानन्दके प्रति विशेष श्रद्धा नहीं थी, यह जानकर श्रीमीनकेतनकी ३१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

गुणार्णवमिश्रके प्रति भी अश्रद्धा हुई थी। इस कार्यमें श्रीमीनकेतनको अभिमानी कहकर भक्तगण उनपर दोषारोपण नहीं करते हैं॥१७१॥ उत्सवान्ते गेला तिँहो करिया प्रसाद। मोर भ्राता-सने ताँर किछु हैल वाद॥१७२॥ भ्राताकी श्रीगौरनिष्ठा किन्तु श्रीनित्यानन्दमें अश्रद्धा-दर्शनसे श्रील कविराजकी उसके प्रति भर्त्सना :- चैतन्यप्रभुते ताँर सुदृढ़ विश्वास। नित्यानन्द-प्रति ताँर विश्वास-आभास॥१७३॥ इहा जानि' रामदासेर दुःख हइल मने। तबे त' भ्रातारे आमि करिनु भर्त्सने॥१७४॥ अनुवाद-उत्सवका समापन होनेपर श्रीमीनकेतन दासने सभीको आशीर्वाद दिया। उस समय उनका मेरे भाईके साथ कुछ वाद-विवाद हो गया। मेरे भाईका श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति सुदृढ़ विश्वास तो था, परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रति उनका विश्वासका आभासमात्र था। यह जानकर श्रीरामदासके मनमें बहुत दुःख हुआ, तब जाकर मैंने अपने भाईकी भर्त्सना की॥१७२-१७४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमीनकेतनके इस प्रकार व्यवहारको देखकर मेरे भाईने उनके साथ कुछ वाद-विवाद किया। मेरे भाईका श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति सुदृढ़ विश्वास था, परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रति उस प्रकार विश्वास नहीं था॥१७२-१७३॥ अनुभाष्य-'विश्वास-आभास'-अति सामान्य विश्वास॥१७३॥ अखण्ड वस्तुको खण्ड वस्तु माननेसे अश्रद्धा-पाषण्डता मात्र है :- “दुइ भाइ एकतनु-समान प्रकाश। नित्यानन्द ना मान, तोमार हबे सर्वनाश॥१७५॥ एकेते विश्वास, अन्ये ना कर सम्मान। “अर्द्धकुक्कुटी-न्याय" तोमार प्रमाण॥१७६॥ श्रीगौरको छोड़कर श्रीनिताइमें, श्रीनिताइको छोड़कर श्रीगौरमें विश्वास भक्तिविरोध मात्र :- किम्बा, दोंहा ना मानिञा हओ त' पाषण्ड। एके मानि' आरे ना मानि,-एड्मंत भण्ड॥” १७७॥ अनुवाद-मैंने कहा-“ये दो भाई एक शरीरके समान हैं और समान प्रकाश हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुको नहीं माननेके कारण तुम्हारा सर्वनाश होगा। एकके ऊपर विश्वास करते हो और दूसरेको सम्मान नहीं देते हो, तुम्हारा यह प्रमाण आधी मुर्गीको माननेके समान है। एकको मानकर और दूसरेको नहीं मानकर ढोंगी होनेकी अपेक्षा उन दोनोंको ना मानकर नास्तिक होना अच्छा है॥” १७४-१७७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“अर्द्धकुक्कुटी-न्याय”-“अर्द्धजरतीय न्याय” अर्थात् मुर्गीका आधा भाग युवा है और आधा भाग वृद्ध है, इस बातको प्रमाणके रूपमें कोई नहीं मानेगा। इसी प्रकार

[ ५/१७६-१८४ अर्द्धकुक्कुटी-न्यायके अनुसार एक अखण्ड-ईश्वर श्रीचैतन्य-नित्यानन्दमेंसे एकको मान रहे हो और दूसरेको नहीं मान रहे हो, यही तुम्हारी नास्तिकता और ढोंग है॥ १७६॥ भक्तके अपमानके कारण श्रीगौरनिष्ठ भ्राताका सर्वनाश और अधःपतन :- कृ तत्काले आमार भ्रातार हैल सर्वनाश॥ १७८॥ एइ त' कहिल ताँर सेवक-प्रभाव। आर एक कहि ताँर दयार स्वभाव॥ १७९॥ अनुवाद-इसके बाद भक्त श्रीरामदास क्रोधित होकर अपनी वंशी तोड़कर चले गये। उसी समय मेरे भाईका सर्वनाश अर्थात् भक्तिसे पतन हो गया। यह तो मैंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके सेवकके प्रभावका वर्णन किया, अब एक और उनकी दयाका स्वभाव कह रहा हूँ॥ १७८-१७९॥ श्रीनित्यानन्दकी दयाका परिचय :- भाइके भर्त्सिनु मुञि, लञा एइ गुण। सेइ रात्रे प्रभु मोरे दिला दरशन॥ १८०॥ स्वप्नमें श्रीनित्यानन्द-दर्शन :- नैहाटि-निकटे 'झामटपुर' नामे ग्राम। ताँहा स्वप्ने देखा दिला नित्यानन्द-राम॥ १८१॥ अनुवाद-मैंने अपने भाईकी भर्त्सना की, मेरे इसी गुणके कारण उसी रात श्रीनित्यानन्द प्रभुने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया। नैहाटीके निकट 'झामटपुर' नामक एक ग्राम है, वहींपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया॥ १८०-१८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कटोआके दो कोस उत्तरमें नैहाटी-ग्रामके निकट 'झामटपुर' ग्राममें कविराज-गोस्वामीका रहनेका स्थान था। उसी स्थानमें अभी श्रीमन्महाप्रभुका विग्रह है॥ १८१॥ श्रीनित्यानन्दके साक्षात् चरणकमलोंकी प्राप्ति :- दण्डवत् हैया आमि पड़िनु पायेते। निजपादपद्म प्रभु दिला मोर माथे॥ १८२॥ 'उठ', 'उठ' बलि' मोरे बले बार बार। उठि' ताँर रूप देखि' हैनु चमत्कार॥ १८३॥ अनुवाद-प्रभुका दर्शन पाकर जब मैं दण्डवत् होकर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़ा, तब प्रभुने अपने चरणकमलोंको मेरे सिरपर रख दिया। प्रभुने मुझे बार-बार 'उठ' 'उठ' कहकर उठनेके लिये कहा। मैं उठकर उनके रूपको देखकर चकित हो गया॥ १८२-१८३॥ श्रीनित्यानन्दके रूपका वर्णन :- श्याम-चिक्कण कान्ति, प्रकाण्ड-शरीर। साक्षात् कन्दर्प, यैछे महामल्ल-वीर॥ १८४॥ ३१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/१८४-१९२ ] सुवलित हस्त, पद, कमल-लोचन। पट्टवस्त्र शिरे, पट्टवस्त्र परिधान ॥ १८५ ॥ सुवर्ण-कुण्डल कर्णे, स्वर्णाङ्गद-बाला। पायेते नूपुर बाजे, कण्ठे पुष्पमाला ॥ १८६ ॥ चन्दनलेपित-अङ्ग, तिलक सुठाम। मत्तगज जिनि' मद-मन्थर पयान ॥ १८७ ॥ कोटिचन्द्र जिनि' मुख उज्ज्वल-वरण। दाड़िम्ब बीज-सम दन्ते ताम्बूल-चर्वण ॥ १८८ ॥ अनुवाद-साक्षात् कामदेवकी भाँति चिक्वण श्यामवर्णकी कान्तिसे युक्त उनका विशाल शरीर था, मानो वे कोई महामल्ल-वीर हों। उनके अत्यन्त सुन्दर, लम्बे हाथ और चरण थे तथा कमलके भाँति उनके नेत्र थे। उन्होंने सुन्दर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए थे और उनके सिरपर भी रेशमी पगड़ी शोभा पा रही थी। उनके कानोंमें स्वर्णके कुण्डल और हाथोंमें स्वर्णके कङ्कन शोभा पा रहे थे। उनके चरणोंमें नूपुर झङ्कार कर रहे थे और गलेमें पुष्पोंकी माला थी। उनके शरीरपर चन्दनका लेप किया हुआ था और उसपर अत्यन्त सुन्दर तिलक बने थे। मन्थर गतिसे झूमकर चलते हुए मत्तवाले हाथीके समान उनकी चाल थी। करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी उज्ज्वल उनका मुखकमल था और पान चबानेके कारण उनके दाँत अनारके बीजके समान लग रहे थे॥ १८४-१८८॥ प्रेमे मत्त अङ्ग दाहिने-बामे दोले। 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलिया गम्भीर बोल बोले ॥ १८९ ॥ राङ्गा यष्टि हस्ते दोले येन मत्त सिंह। चारिपाशे बेड़ि आछे चरणेते भृङ्ग ॥ १९० ॥ पार्षदगणे देखि' सब गोप-वेशे। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे सबे सप्रेम-आवेशे ॥ १९१ ॥ शिङ्गा वांशी बाजाय केह, केह नाचे गाय। सेवक योगाय ताम्बूल, चामर ढुलाय ॥ १९२ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण-प्रेममें मत्त उनका शरीर दाहिने-बायें डोल रहा था। वे बहुत गम्भीर स्वरसे 'कृष्ण' 'कृष्ण' कह रहे थे। उनके हाथमें लाल रंगकी छड़ी डोल रही थी और वे मत्त सिंहके समान लग रहे थे। उनके चरणकमलोंके चारों ओर भ्रमर मँडरा रहे थे। उनके भक्त सभी गोपवेशमें थे और वे लोग प्रेमके आवेशमें 'कृष्ण' 'कृष्ण' कह रहे थे। उनमेंसे कोई सींगा और कोई वंशी बजा रहा था। कोई नृत्य कर रहा था और कोई गान कर रहा था। उनका कोई सेवक उनको ताम्बूल दे रहा था और कोई सेवक उनको चामर ढुला रहा था॥ १८९-१९२॥ पाँचवाँ अध्याय | ३१९

[ ५/१९३-२०० श्रीनित्यानन्दके दर्शनसे ग्रन्थकारको आनन्द :- नित्यानन्द-स्वरूपेर देखिया वैभव। किबा रूप, गुण, लीला—अलौकिक सब॥१९३॥ आनन्दे विह्वल आमि, किछु नाहि जानि। तबे हासि' प्रभु मोरे कहिलेन वाणी॥१९४॥ अनुवाद—मैंने श्रीनित्यानन्द-स्वरूपका वैभव देखा। उनका कैसा रूप, कैसे गुण, कैसी लीला थी, वे सभी अलौकिक थे। मैं आनन्दमें विह्वल होकर और कुछ जान नहीं पाया। उस समय प्रभु हँसकर मुझे कहने लगे॥१९३-१९४॥ वृन्दावन-गमनका श्रीनित्यानन्दका आदेश :- “आरे आरे कृष्णदास, ना करह भय। वृन्दावने याह,—ताँहा सर्व लभ्य हय॥”१९५॥ अनुवाद—“अरे अरे कृष्णदास! भय मत करो। तुम वृन्दावन जाओ, तुम्हें वहाँ सब कुछ प्राप्त हो जायेगा॥”१९५॥ श्रीनित्यानन्दका अन्तर्धान होना :- एइ बलि' प्रेरिला मोरे हातसान दिया। अन्तर्धान कैल प्रभु निजगण लञा॥१९६॥ मूर्च्छित हइया मुञि पड़िनु भूमिते। स्वप्नभङ्ग हैल, देखि हञाछे प्रभाते॥१९७॥ स्वप्न आदेशसे श्रील कविराजका वृन्दावन-गमन :- कि देखिनु, कि शुनिनु, करिये विचार। प्रभु-आज्ञा हैल वृन्दावन याइबार॥१९८॥ सेइ क्षणे वृन्दावने करिनु गमन। प्रभुर कृपाते सुखि आइनु वृन्दावन॥१९९॥ अनुवाद—ऐसा कहकर उन्होंने मुझे अपने हाथका स्पर्श प्रदान करते हुए वृन्दावनकी ओर प्रेरित किया। उसके बाद प्रभु अपने परिकरोंके साथ अन्तर्धान हो गये। प्रभुके अन्तर्धान होनेके बाद मैं मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा। तभी मेरा स्वप्न भङ्ग हो गया और मैंने देखा कि प्रातःकाल हो गया था। स्वप्नमें जो देखा और सुना था, मैंने उसपर विचार करके देखा कि प्रभुने मुझे वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी है। उसी क्षण मैंने वृन्दावनके लिये यात्रा प्रारम्भ कर दी और प्रभुकी कृपासे सुखसे अर्थात् बिना किसी विघ्न-बाधाके वृन्दावन आ गया॥१९६-१९९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हातसान'—हाथका स्पर्श॥१९६॥ श्रीनित्यानन्द-स्तव :- जय जय नित्यानन्द, नित्यानन्द-राम। याँहार कृपाते पाइनु वृन्दावन-धाम॥२००॥ ३२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/२००-२०३ ]

जय जय नित्यानन्द, जय कृपामय। याँहा हैते पाइनु रूप-सनातनआश्रय ॥ २०१॥ याँहा हैते पाइनु रघुनाथ-महाशय। याँहा हैते पाइनु श्रीस्वरूप-आश्रय ॥ २०२॥ अनुवाद-जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द-रामकी जय हो, जिनकी कृपासे मुझे वृन्दावन- धामकी प्राप्ति हुई। जय हो, जय हो, कृपामय श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जिनकी कृपासे ही मुझे श्रीरूप-सनातन गोस्वामीका आश्रय मिला। और उनकी कृपासे ही मुझे रघुनाथ महाशय और (उनके माध्यमसे) श्रीस्वरूप दामोदरका आश्रय मिला॥२००-२०२॥ अनुभाष्य-इन दो पयारोंमें श्रीकविराज गोस्वामी दिखला रहे हैं कि श्रीराधागोविन्दकी सेवा-अभिलाषियोंके लिये श्रीस्वरूप-रूप-सनातन-रघुनाथ गोस्वामियोंका आश्रय और कृपाकी प्राप्ति ही जीवनकी एकमात्र कामना और इच्छा होनी चाहिये तथा केवल श्रीनित्यानन्दप्रभुकी कृपासे ही इसकी प्राप्ति होती है। श्रीदामोदरस्वरूप गोस्वामी प्रभुके सम्बन्धमें आदिलीला ४/१६०-१६१ द्रष्टव्य है॥२०१-२०२॥ सनातन-कृपाय पाइनु भक्तिर सिद्धान्त। श्रीरूप-कृपाय पाइनु भक्तिरसप्रान्त ॥ २०३ ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीकी कृपासे मैं भक्तिके सिद्धान्तोंको जान पाया और श्रीरूप गोस्वामी प्रभुकी कृपासे मैंने भक्तिरससिन्धुकी निकटता प्राप्त की॥२०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भक्तिरसप्रान्त' - भक्तिरसकी निकटता मात्र ॥ २०३ ॥ अनुभाष्य-श्रीसनातन गोस्वामी भक्तिसिद्धान्तके आचार्य हैं। इस ग्रन्थमें अन्त्यलीलाके चौथे अध्यायके अन्तमें श्रीकविराज गोस्वामीने लिखा है- “सनातन ग्रन्थ कैल भागवतामृते। भक्त-भक्ति-कृष्ण-तत्त्व जानि याहा हैते ॥ सिद्धान्त-सार ग्रन्थ कैल दशम-टिप्पणी। कृष्णलीला, रसप्रेम, याहा हैते जानि ॥ हरिभक्तिविलास ग्रन्थ कैल वैष्णव आचार। वैष्णवेर कर्त्तव्य याँहा पाइये पार ॥” अर्थात् “श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृत ग्रन्थकी रचना की, जिससे भक्त, भक्ति और श्रीकृष्णके तत्त्वको जान सकते हैं। उन्होंने भागवतके दशम स्कन्धकी टीका लिखी है, जिससे श्रीकृष्णलीला और उनके प्रेमरसको समझा जा सकता है। उन्होंने वैष्णव-आचार और वैष्णवोंके कर्त्तव्योंको समझानेके लिये हरिभक्तिविलासकी रचना की है।" श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने “विलासकुसुमाञ्जलि" स्तवमें श्रीसनातन गोस्वामीके सम्बन्धमें लिखा है- “वैराग्ययुग्भक्तिरसं प्रयत्नैरपाययन्माममभीप्सुमन्धम्। कृपाम्बुधिर्यः परदुःखदुःखी सनातनस्तं प्रभुमाश्रयामि ॥”

पाँचवाँ अध्याय | ३२१

[ ५/२०३-२०४ अर्थात् “अज्ञानमें अन्धे होकर वैराग्ययुक्त भक्तिके रसको पान करनेकी मेरी इच्छा नहीं थी, किन्तु जिन्होंने मुझे इसका यत्नपूर्वक पान कराया, कृपाके सागर और दूसरोंके दुःखमें दुःखी उन श्रीसनातन गोस्वामीके चरणकमलोंका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ।” श्रीकविराज गोस्वामीने (अन्त्यलीला ४/२३६ संख्यामें) पहले श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामीके नामोंका उल्लेख करके लिखा है— “एइ तिनगुरु, आर रघुनाथदास। इँहा-सबार चरण वन्दों याँर मुञि दास॥” अर्थात् “इन तीन गुरुओं और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें यह दास प्रणाम कर रहा है।” श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने भी श्रीसनातन प्रभुका भक्तिसिद्धान्त-आचार्यके रूपमें परिचय दिया है। श्रीरूपगोस्वामी भक्तिरसके आचार्य हैं। (अन्त्यलीला ४/२२३-२२४ संख्यामें)— “रूप-गोसाञि कैला ‘रसामृतसिन्धु’ सार। कृष्णभक्ति-रसेर याँहा पाइये विस्तार॥ ‘उज्ज्वलनीलमणि’-नाम ग्रन्थ आर। राधाकृष्ण-लीलारस ताँहा पाइये पार॥” अर्थात् “श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धुकी रचना की जिसके द्वारा श्रीकृष्ण-भक्तिरसको जाना जा सकता है। उन्होंने एक अन्य ग्रन्थ ‘उज्ज्वलनीलमणि’ में श्रीराधाकृष्णकी मधुररसकी लीलाओंको विस्तारपूर्वक दिया है॥”२०३॥ जय जय नित्यानन्द-चरणारविन्द। याँहा हैते पाइनु श्रीराधागोविन्द॥२०४॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी जय हो, जय हो, जिनकी कृपासे मुझे श्रीराधा-गोविन्दकी प्राप्ति हुई॥२०४॥ अनुभाष्य—श्रील नरोत्तम ठाकुर स्वकृत ‘प्रार्थना’ में कह रहे हैं— “आर कबै निताइ-चाँद करुणा करिबे। संसार-वासना मोर कबै तुच्छ हबे॥ विषय छाड़िया कबै शुद्ध हबे मन। कबै हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥ रूप-रघुनाथ-पदे हइबे आकुति। कबै हाम बुझब श्रीयुगल पिरीति॥” अर्थात् “कब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे मेरे हृदयसे सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर मेरा मन कब शुद्ध होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी और रघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी प्रीतिको जान पाऊँगा।” ३२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/२०४-२१३ ] “हेन निताइ बिने भाइ, राधाकृष्ण पाइते नाइ, दृढ़ करि' धर निताईर पाय।” अर्थात् “श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किये बिना श्रीराधाकृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः हे भाइयों! श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीचरणोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लो अर्थात् दृढ़ विश्वासपूर्वक उनका आश्रय ग्रहण करो॥” २०४॥ ग्रन्थकारकी दैन्योक्ति- जगाइ माधाइ हैते मुञि से पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञि से लघिष्ठ॥ २०५॥ मोर नाम सुने येइ, तार पुण्य क्षय। मोर नाम लय येइ, तार पाप हय॥ २०६॥ एमन निर्घृण-मोरे केबा कृपा करे। एक नित्यानन्द बिनु जगत् भितरे॥ २०७॥ अपने प्रति श्रीनित्यानन्दकी कृपाका वर्णन :- प्रेमे मत्त नित्यानन्द कृपा-अवतार। उत्तम, अधम, किछु ना करे विचार॥ २०८॥ ये आगे पड़ये, तारे करये निस्तार। अतएव निस्तारिला मो-हेन दुराचार॥ २०९॥ मो-पापिष्ठे आनिलैन श्रीवृन्दावन। मो-हेन अधमे दिला श्रीरूप-चरण॥ २१०॥ अनुवाद-मैं जगाइ और माधाइसे भी अधिक पापी और मलके कीड़ेसे भी तुच्छ हूँ। जो मेरा नाम सुनता है, उसके पुण्य क्षय हो जाते हैं। जो मेरा नाम लेता है, उसे पाप लगता है। ऐसे घृणित व्यक्तिपर इस जगत्में एक श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त और कौन कृपा कर सकता है? प्रेममें मत्त श्रीनित्यानन्द कृपाके अवतार हैं। वे उत्तम और अधमका कुछ भी विचार नहीं करते। जो भी उनके आगे गिर जाता है, वे उसका उद्धार करते हैं। इसलिये उन्होंने मेरे जैसे दुराचारीका भी उद्धार किया हैं। मैं पापी और पतित हूँ, तो भी उन्होंने मुझे श्रीवृन्दावनमें लाकर श्रीरूपगोस्वामीके चरणोंका आश्रय प्रदान किया॥ २०५-२१०॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे श्रीमदनमोहन-सेवाप्राप्ति :- श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्द-दरशन। कहिबार योग्य नहे एअब कथन॥ २११॥ वृन्दावन-पुरन्दर श्रीमदनगोपाल। रासविलासी साक्षात् व्रजेन्द्रकुमार॥ २१२॥ श्रीराधा-ललिता-सङ्गे रास-विलास। मन्मथ-मन्मथरूपे याँहार प्रकाश॥ २१३॥ पाँचवाँ अध्याय | ३२३