भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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गुणार्णवमिश्रके प्रति भी अश्रद्धा हुई थी। इस कार्यमें श्रीमीनकेतनको अभिमानी कहकर भक्तगण उनपर दोषारोपण नहीं करते हैं॥१७१॥ उत्सवान्ते गेला तिँहो करिया प्रसाद। मोर भ्राता-सने ताँर किछु हैल वाद॥१७२॥ भ्राताकी श्रीगौरनिष्ठा किन्तु श्रीनित्यानन्दमें अश्रद्धा-दर्शनसे श्रील कविराजकी उसके प्रति भर्त्सना :- चैतन्यप्रभुते ताँर सुदृढ़ विश्वास। नित्यानन्द-प्रति ताँर विश्वास-आभास॥१७३॥ इहा जानि' रामदासेर दुःख हइल मने। तबे त' भ्रातारे आमि करिनु भर्त्सने॥१७४॥ अनुवाद-उत्सवका समापन होनेपर श्रीमीनकेतन दासने सभीको आशीर्वाद दिया। उस समय उनका मेरे भाईके साथ कुछ वाद-विवाद हो गया। मेरे भाईका श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति सुदृढ़ विश्वास तो था, परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रति उनका विश्वासका आभासमात्र था। यह जानकर श्रीरामदासके मनमें बहुत दुःख हुआ, तब जाकर मैंने अपने भाईकी भर्त्सना की॥१७२-१७४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमीनकेतनके इस प्रकार व्यवहारको देखकर मेरे भाईने उनके साथ कुछ वाद-विवाद किया। मेरे भाईका श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति सुदृढ़ विश्वास था, परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रति उस प्रकार विश्वास नहीं था॥१७२-१७३॥ अनुभाष्य-'विश्वास-आभास'-अति सामान्य विश्वास॥१७३॥ अखण्ड वस्तुको खण्ड वस्तु माननेसे अश्रद्धा-पाषण्डता मात्र है :- “दुइ भाइ एकतनु-समान प्रकाश। नित्यानन्द ना मान, तोमार हबे सर्वनाश॥१७५॥ एकेते विश्वास, अन्ये ना कर सम्मान। “अर्द्धकुक्कुटी-न्याय" तोमार प्रमाण॥१७६॥ श्रीगौरको छोड़कर श्रीनिताइमें, श्रीनिताइको छोड़कर श्रीगौरमें विश्वास भक्तिविरोध मात्र :- किम्बा, दोंहा ना मानिञा हओ त' पाषण्ड। एके मानि' आरे ना मानि,-एड्मंत भण्ड॥” १७७॥ अनुवाद-मैंने कहा-“ये दो भाई एक शरीरके समान हैं और समान प्रकाश हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुको नहीं माननेके कारण तुम्हारा सर्वनाश होगा। एकके ऊपर विश्वास करते हो और दूसरेको सम्मान नहीं देते हो, तुम्हारा यह प्रमाण आधी मुर्गीको माननेके समान है। एकको मानकर और दूसरेको नहीं मानकर ढोंगी होनेकी अपेक्षा उन दोनोंको ना मानकर नास्तिक होना अच्छा है॥” १७४-१७७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“अर्द्धकुक्कुटी-न्याय”-“अर्द्धजरतीय न्याय” अर्थात् मुर्गीका आधा भाग युवा है और आधा भाग वृद्ध है, इस बातको प्रमाणके रूपमें कोई नहीं मानेगा। इसी प्रकार