श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/१७६-१८४ अर्द्धकुक्कुटी-न्यायके अनुसार एक अखण्ड-ईश्वर श्रीचैतन्य-नित्यानन्दमेंसे एकको मान रहे हो और दूसरेको नहीं मान रहे हो, यही तुम्हारी नास्तिकता और ढोंग है॥ १७६॥ भक्तके अपमानके कारण श्रीगौरनिष्ठ भ्राताका सर्वनाश और अधःपतन :- कृ तत्काले आमार भ्रातार हैल सर्वनाश॥ १७८॥ एइ त' कहिल ताँर सेवक-प्रभाव। आर एक कहि ताँर दयार स्वभाव॥ १७९॥ अनुवाद-इसके बाद भक्त श्रीरामदास क्रोधित होकर अपनी वंशी तोड़कर चले गये। उसी समय मेरे भाईका सर्वनाश अर्थात् भक्तिसे पतन हो गया। यह तो मैंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके सेवकके प्रभावका वर्णन किया, अब एक और उनकी दयाका स्वभाव कह रहा हूँ॥ १७८-१७९॥ श्रीनित्यानन्दकी दयाका परिचय :- भाइके भर्त्सिनु मुञि, लञा एइ गुण। सेइ रात्रे प्रभु मोरे दिला दरशन॥ १८०॥ स्वप्नमें श्रीनित्यानन्द-दर्शन :- नैहाटि-निकटे 'झामटपुर' नामे ग्राम। ताँहा स्वप्ने देखा दिला नित्यानन्द-राम॥ १८१॥ अनुवाद-मैंने अपने भाईकी भर्त्सना की, मेरे इसी गुणके कारण उसी रात श्रीनित्यानन्द प्रभुने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया। नैहाटीके निकट 'झामटपुर' नामक एक ग्राम है, वहींपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया॥ १८०-१८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कटोआके दो कोस उत्तरमें नैहाटी-ग्रामके निकट 'झामटपुर' ग्राममें कविराज-गोस्वामीका रहनेका स्थान था। उसी स्थानमें अभी श्रीमन्महाप्रभुका विग्रह है॥ १८१॥ श्रीनित्यानन्दके साक्षात् चरणकमलोंकी प्राप्ति :- दण्डवत् हैया आमि पड़िनु पायेते। निजपादपद्म प्रभु दिला मोर माथे॥ १८२॥ 'उठ', 'उठ' बलि' मोरे बले बार बार। उठि' ताँर रूप देखि' हैनु चमत्कार॥ १८३॥ अनुवाद-प्रभुका दर्शन पाकर जब मैं दण्डवत् होकर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़ा, तब प्रभुने अपने चरणकमलोंको मेरे सिरपर रख दिया। प्रभुने मुझे बार-बार 'उठ' 'उठ' कहकर उठनेके लिये कहा। मैं उठकर उनके रूपको देखकर चकित हो गया॥ १८२-१८३॥ श्रीनित्यानन्दके रूपका वर्णन :- श्याम-चिक्कण कान्ति, प्रकाण्ड-शरीर। साक्षात् कन्दर्प, यैछे महामल्ल-वीर॥ १८४॥ ३१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत