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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/१८४-१९२ ] सुवलित हस्त, पद, कमल-लोचन। पट्टवस्त्र शिरे, पट्टवस्त्र परिधान ॥ १८५ ॥ सुवर्ण-कुण्डल कर्णे, स्वर्णाङ्गद-बाला। पायेते नूपुर बाजे, कण्ठे पुष्पमाला ॥ १८६ ॥ चन्दनलेपित-अङ्ग, तिलक सुठाम। मत्तगज जिनि' मद-मन्थर पयान ॥ १८७ ॥ कोटिचन्द्र जिनि' मुख उज्ज्वल-वरण। दाड़िम्ब बीज-सम दन्ते ताम्बूल-चर्वण ॥ १८८ ॥ अनुवाद-साक्षात् कामदेवकी भाँति चिक्वण श्यामवर्णकी कान्तिसे युक्त उनका विशाल शरीर था, मानो वे कोई महामल्ल-वीर हों। उनके अत्यन्त सुन्दर, लम्बे हाथ और चरण थे तथा कमलके भाँति उनके नेत्र थे। उन्होंने सुन्दर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए थे और उनके सिरपर भी रेशमी पगड़ी शोभा पा रही थी। उनके कानोंमें स्वर्णके कुण्डल और हाथोंमें स्वर्णके कङ्कन शोभा पा रहे थे। उनके चरणोंमें नूपुर झङ्कार कर रहे थे और गलेमें पुष्पोंकी माला थी। उनके शरीरपर चन्दनका लेप किया हुआ था और उसपर अत्यन्त सुन्दर तिलक बने थे। मन्थर गतिसे झूमकर चलते हुए मत्तवाले हाथीके समान उनकी चाल थी। करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी उज्ज्वल उनका मुखकमल था और पान चबानेके कारण उनके दाँत अनारके बीजके समान लग रहे थे॥ १८४-१८८॥ प्रेमे मत्त अङ्ग दाहिने-बामे दोले। 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलिया गम्भीर बोल बोले ॥ १८९ ॥ राङ्गा यष्टि हस्ते दोले येन मत्त सिंह। चारिपाशे बेड़ि आछे चरणेते भृङ्ग ॥ १९० ॥ पार्षदगणे देखि' सब गोप-वेशे। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे सबे सप्रेम-आवेशे ॥ १९१ ॥ शिङ्गा वांशी बाजाय केह, केह नाचे गाय। सेवक योगाय ताम्बूल, चामर ढुलाय ॥ १९२ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण-प्रेममें मत्त उनका शरीर दाहिने-बायें डोल रहा था। वे बहुत गम्भीर स्वरसे 'कृष्ण' 'कृष्ण' कह रहे थे। उनके हाथमें लाल रंगकी छड़ी डोल रही थी और वे मत्त सिंहके समान लग रहे थे। उनके चरणकमलोंके चारों ओर भ्रमर मँडरा रहे थे। उनके भक्त सभी गोपवेशमें थे और वे लोग प्रेमके आवेशमें 'कृष्ण' 'कृष्ण' कह रहे थे। उनमेंसे कोई सींगा और कोई वंशी बजा रहा था। कोई नृत्य कर रहा था और कोई गान कर रहा था। उनका कोई सेवक उनको ताम्बूल दे रहा था और कोई सेवक उनको चामर ढुला रहा था॥ १८९-१९२॥ पाँचवाँ अध्याय | ३१९

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