भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ५/१९३-२०० श्रीनित्यानन्दके दर्शनसे ग्रन्थकारको आनन्द :- नित्यानन्द-स्वरूपेर देखिया वैभव। किबा रूप, गुण, लीला—अलौकिक सब॥१९३॥ आनन्दे विह्वल आमि, किछु नाहि जानि। तबे हासि' प्रभु मोरे कहिलेन वाणी॥१९४॥ अनुवाद—मैंने श्रीनित्यानन्द-स्वरूपका वैभव देखा। उनका कैसा रूप, कैसे गुण, कैसी लीला थी, वे सभी अलौकिक थे। मैं आनन्दमें विह्वल होकर और कुछ जान नहीं पाया। उस समय प्रभु हँसकर मुझे कहने लगे॥१९३-१९४॥ वृन्दावन-गमनका श्रीनित्यानन्दका आदेश :- “आरे आरे कृष्णदास, ना करह भय। वृन्दावने याह,—ताँहा सर्व लभ्य हय॥”१९५॥ अनुवाद—“अरे अरे कृष्णदास! भय मत करो। तुम वृन्दावन जाओ, तुम्हें वहाँ सब कुछ प्राप्त हो जायेगा॥”१९५॥ श्रीनित्यानन्दका अन्तर्धान होना :- एइ बलि' प्रेरिला मोरे हातसान दिया। अन्तर्धान कैल प्रभु निजगण लञा॥१९६॥ मूर्च्छित हइया मुञि पड़िनु भूमिते। स्वप्नभङ्ग हैल, देखि हञाछे प्रभाते॥१९७॥ स्वप्न आदेशसे श्रील कविराजका वृन्दावन-गमन :- कि देखिनु, कि शुनिनु, करिये विचार। प्रभु-आज्ञा हैल वृन्दावन याइबार॥१९८॥ सेइ क्षणे वृन्दावने करिनु गमन। प्रभुर कृपाते सुखि आइनु वृन्दावन॥१९९॥ अनुवाद—ऐसा कहकर उन्होंने मुझे अपने हाथका स्पर्श प्रदान करते हुए वृन्दावनकी ओर प्रेरित किया। उसके बाद प्रभु अपने परिकरोंके साथ अन्तर्धान हो गये। प्रभुके अन्तर्धान होनेके बाद मैं मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा। तभी मेरा स्वप्न भङ्ग हो गया और मैंने देखा कि प्रातःकाल हो गया था। स्वप्नमें जो देखा और सुना था, मैंने उसपर विचार करके देखा कि प्रभुने मुझे वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी है। उसी क्षण मैंने वृन्दावनके लिये यात्रा प्रारम्भ कर दी और प्रभुकी कृपासे सुखसे अर्थात् बिना किसी विघ्न-बाधाके वृन्दावन आ गया॥१९६-१९९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हातसान'—हाथका स्पर्श॥१९६॥ श्रीनित्यानन्द-स्तव :- जय जय नित्यानन्द, नित्यानन्द-राम। याँहार कृपाते पाइनु वृन्दावन-धाम॥२००॥ ३२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत