भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/२००-२०३ ]

जय जय नित्यानन्द, जय कृपामय। याँहा हैते पाइनु रूप-सनातनआश्रय ॥ २०१॥ याँहा हैते पाइनु रघुनाथ-महाशय। याँहा हैते पाइनु श्रीस्वरूप-आश्रय ॥ २०२॥ अनुवाद-जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द-रामकी जय हो, जिनकी कृपासे मुझे वृन्दावन- धामकी प्राप्ति हुई। जय हो, जय हो, कृपामय श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जिनकी कृपासे ही मुझे श्रीरूप-सनातन गोस्वामीका आश्रय मिला। और उनकी कृपासे ही मुझे रघुनाथ महाशय और (उनके माध्यमसे) श्रीस्वरूप दामोदरका आश्रय मिला॥२००-२०२॥ अनुभाष्य-इन दो पयारोंमें श्रीकविराज गोस्वामी दिखला रहे हैं कि श्रीराधागोविन्दकी सेवा-अभिलाषियोंके लिये श्रीस्वरूप-रूप-सनातन-रघुनाथ गोस्वामियोंका आश्रय और कृपाकी प्राप्ति ही जीवनकी एकमात्र कामना और इच्छा होनी चाहिये तथा केवल श्रीनित्यानन्दप्रभुकी कृपासे ही इसकी प्राप्ति होती है। श्रीदामोदरस्वरूप गोस्वामी प्रभुके सम्बन्धमें आदिलीला ४/१६०-१६१ द्रष्टव्य है॥२०१-२०२॥ सनातन-कृपाय पाइनु भक्तिर सिद्धान्त। श्रीरूप-कृपाय पाइनु भक्तिरसप्रान्त ॥ २०३ ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीकी कृपासे मैं भक्तिके सिद्धान्तोंको जान पाया और श्रीरूप गोस्वामी प्रभुकी कृपासे मैंने भक्तिरससिन्धुकी निकटता प्राप्त की॥२०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भक्तिरसप्रान्त' - भक्तिरसकी निकटता मात्र ॥ २०३ ॥ अनुभाष्य-श्रीसनातन गोस्वामी भक्तिसिद्धान्तके आचार्य हैं। इस ग्रन्थमें अन्त्यलीलाके चौथे अध्यायके अन्तमें श्रीकविराज गोस्वामीने लिखा है- “सनातन ग्रन्थ कैल भागवतामृते। भक्त-भक्ति-कृष्ण-तत्त्व जानि याहा हैते ॥ सिद्धान्त-सार ग्रन्थ कैल दशम-टिप्पणी। कृष्णलीला, रसप्रेम, याहा हैते जानि ॥ हरिभक्तिविलास ग्रन्थ कैल वैष्णव आचार। वैष्णवेर कर्त्तव्य याँहा पाइये पार ॥” अर्थात् “श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृत ग्रन्थकी रचना की, जिससे भक्त, भक्ति और श्रीकृष्णके तत्त्वको जान सकते हैं। उन्होंने भागवतके दशम स्कन्धकी टीका लिखी है, जिससे श्रीकृष्णलीला और उनके प्रेमरसको समझा जा सकता है। उन्होंने वैष्णव-आचार और वैष्णवोंके कर्त्तव्योंको समझानेके लिये हरिभक्तिविलासकी रचना की है।" श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने “विलासकुसुमाञ्जलि" स्तवमें श्रीसनातन गोस्वामीके सम्बन्धमें लिखा है- “वैराग्ययुग्भक्तिरसं प्रयत्नैरपाययन्माममभीप्सुमन्धम्। कृपाम्बुधिर्यः परदुःखदुःखी सनातनस्तं प्रभुमाश्रयामि ॥”

पाँचवाँ अध्याय | ३२१