भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

[ ५/२०३-२०४ अर्थात् “अज्ञानमें अन्धे होकर वैराग्ययुक्त भक्तिके रसको पान करनेकी मेरी इच्छा नहीं थी, किन्तु जिन्होंने मुझे इसका यत्नपूर्वक पान कराया, कृपाके सागर और दूसरोंके दुःखमें दुःखी उन श्रीसनातन गोस्वामीके चरणकमलोंका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ।” श्रीकविराज गोस्वामीने (अन्त्यलीला ४/२३६ संख्यामें) पहले श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामीके नामोंका उल्लेख करके लिखा है— “एइ तिनगुरु, आर रघुनाथदास। इँहा-सबार चरण वन्दों याँर मुञि दास॥” अर्थात् “इन तीन गुरुओं और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें यह दास प्रणाम कर रहा है।” श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने भी श्रीसनातन प्रभुका भक्तिसिद्धान्त-आचार्यके रूपमें परिचय दिया है। श्रीरूपगोस्वामी भक्तिरसके आचार्य हैं। (अन्त्यलीला ४/२२३-२२४ संख्यामें)— “रूप-गोसाञि कैला ‘रसामृतसिन्धु’ सार। कृष्णभक्ति-रसेर याँहा पाइये विस्तार॥ ‘उज्ज्वलनीलमणि’-नाम ग्रन्थ आर। राधाकृष्ण-लीलारस ताँहा पाइये पार॥” अर्थात् “श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धुकी रचना की जिसके द्वारा श्रीकृष्ण-भक्तिरसको जाना जा सकता है। उन्होंने एक अन्य ग्रन्थ ‘उज्ज्वलनीलमणि’ में श्रीराधाकृष्णकी मधुररसकी लीलाओंको विस्तारपूर्वक दिया है॥”२०३॥ जय जय नित्यानन्द-चरणारविन्द। याँहा हैते पाइनु श्रीराधागोविन्द॥२०४॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी जय हो, जय हो, जिनकी कृपासे मुझे श्रीराधा-गोविन्दकी प्राप्ति हुई॥२०४॥ अनुभाष्य—श्रील नरोत्तम ठाकुर स्वकृत ‘प्रार्थना’ में कह रहे हैं— “आर कबै निताइ-चाँद करुणा करिबे। संसार-वासना मोर कबै तुच्छ हबे॥ विषय छाड़िया कबै शुद्ध हबे मन। कबै हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥ रूप-रघुनाथ-पदे हइबे आकुति। कबै हाम बुझब श्रीयुगल पिरीति॥” अर्थात् “कब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे मेरे हृदयसे सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर मेरा मन कब शुद्ध होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी और रघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी प्रीतिको जान पाऊँगा।” ३२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत