श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/१६६-१७१ कभु कोन अङ्गे देखि पुलक-कदम्ब। एक अङ्गे जाड्य ताँर, आर अङ्गे कम्प॥१६६॥ अनुवाद—कभी-कभी उनके किसी अङ्गमें पुलकादि सात्त्विक विकार दिखलायी देते, कभी उनके एक अङ्गमें जड़ता आ जाती और दूसरे किसी अङ्गमें कम्प होने लगता॥१६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कदम्ब'—समूह। 'जाड्य'—स्तम्भित होना॥१६६॥ नित्यानन्द बलि' यबे करेन हुङ्कार। ताहा देखि' लोकेर हय महाचमत्कार॥१६७॥ अनुवाद—'श्रीनित्यानन्द' बोलकर जब वे हुङ्कार करते थे, तब उसे देखकर सभी लोग चकित हो जाते थे॥१६७॥ अश्रद्धाके कारण वैष्णवचरणोंमें प्राकृत कनिष्ठ भक्तका अपराध :- गुणार्णव मिश्र-नामे एक विप्र आर्य। श्रीमूर्ति-निकटे तँहो करे सेवाकार्य॥१६८॥ अङ्गने बसिया तँहो ना कैल सम्भाष। ताहा देखि' क्रुद्ध हञा बले रामदास॥१६९॥ 'एइ त' द्वितीय सूत रोमहर्षण। बलदेव देखि' ये ना कैल प्रत्युद्गम॥'१७०॥ अनुवाद—गुणार्णव मिश्र नामक एक सम्माननीय ब्राह्मण श्रीविग्रहकी सेवा कर रहे थे। गुणार्णव मिश्रने वहीं आङ्गनमें बैठे हुए मीनकेतन रामदासको देखकर भी उनका सम्मान नहीं किया। यह देखकर रामदास क्रोधित होकर बोले कि यह तो दूसरा रोमहर्षण सूत है, जिसने श्रीबलदेव प्रभुको देखकर भी व्यास-आसनसे उठकर अभिवादन नहीं किया था॥१६८-१७०॥ अनुभाष्य—भागवत १०/७८/२२-२८ श्लोकोंमें नैमिषारण्यमें श्रीबलदेव प्रभुके द्वारा व्यासदेवके शिष्य रोमहर्षणके वधका वृत्तान्त वर्णित हुआ है॥१७०॥ अपमानित होनेपर भी वैष्णव अदोषदर्शी :- एत बलि' नाचे गाय, करये सन्तोष। कृष्णकार्य करे विप्र—ना करिल रोष॥१७१॥ अनुवाद—ऐसा कहकर उसके अपराधको ग्रहण ना करके मीनकेतन दास मन भरकर नाचते-गाते रहे। वह ब्राह्मण श्रीकृष्णकी सेवा कर रहा था, इसलिये वह भी क्रोधित नहीं हुआ॥१७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीविग्रहके सेवक गुणार्णवमिश्रने आङ्गनमें बैठे हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके दासकी ओर मौन रहकर सम्मान नहीं दिया, इस कारण मीनकेतन रामदासने क्रोधित होकर कहा—'यह गुणार्णवमिश्र द्वितीय रोमहर्षण सूत है।' इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार नैमिषारण्य-क्षेत्रमें श्रीबलदेव प्रभुको देखकर रोमहर्षण सूतने व्यास-आसनसे उठकर उनसे वार्त्तालाप नहीं किया था, उसी प्रकार गुणार्णवमिश्रने भी अन्यायका व्यवहार किया था। गुणार्णव मिश्रके मनमें श्रीनित्यानन्दके प्रति विशेष श्रद्धा नहीं थी, यह जानकर श्रीमीनकेतनकी ३१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत