भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/१६०-१६५ ] अमृतप्रवाह भाष्य—'उल्लास-उपरि' अर्थात् अत्यन्त उल्लसित होनेके कारण इसे गोपनीय रखनेमें अक्षम, मैं आपकी कृपाका वृत्तान्त लिख रहा हूँ॥१६०॥ सेवक-महात्म्य-वर्णन ; मीनकेतन रामदास :— अवधूत गोसाञिर एक भृत्य प्रेमधाम। मीनकेतन रामदास हय ताँर नाम॥१६१॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक सेवक थे, जिनका नाम मीनकेतन रामदास था। वे प्रेमके धामस्वरूप थे॥१६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अवधूत गोसाञि'—श्रीनित्यानन्द प्रभु। 'प्रेमधाम'—प्रेमके आधार॥१६१॥ अनुभाष्य—अवधूत शब्दका अर्थ भागवत ३/१/१९ श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामिपादने 'असंस्कृत-देह' लिखा है। अवधूत श्रीनित्यानन्दके शिष्य भी महाभागवत परमहंस एवं वर्णाश्रमसे अतीत नित्यसिद्ध थे। इसलिये उनके शरीरमें वर्णाश्रमके कोई चिह्न नहीं होनेके कारण वे असंस्कृत-देहसे ब्रजभावमें मत्त रहते थे। 'मीनकेतन रामदास'—आदिलीला ११/५३ पयारका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१६१॥ आमार आलये अहोरात्र-सङ्कीर्त्तन। ताहाते आइला तेंहो पाञा निमन्त्रण॥१६२॥ अनुवाद—एक बार मेरे घरमें एक दिन-रात कालका सङ्कीर्तन हो रहा था। उस सङ्कीर्तन उत्सवमें मीनकेतन रामदास निमन्त्रण पाकर आये थे॥१६२॥ अनुभाष्य—'अहोरात्र' अर्थात् आठ प्रहर। उस समय कीर्तन-उत्सवोंमें शुद्धभक्तोंकी आपसमें निमन्त्रण-पत्र देनेकी रीति थी॥१६२॥ महाप्रेममय तिँहो बसिला अङ्गने। सकल वैष्णव ताँर वन्दिला चरणे॥१६३॥ नमस्कार करिते, का'र उपरेते चड़े। प्रेमे का'रे वंशी मारे, काहाके चापड़े॥१६४॥ अनुवाद—प्रेममें डूबे हुए मीनकेतन रामदास आङ्गनमें बैठ गये। सभी वैष्णवोंने उनके चरणोंकी वन्दना की। भगवत्प्रेममें उन्मत्त होकर वे किसीको नमस्कार करते, किसीके ऊपर चढ़ जाते, किसीको प्रेमसे वंशी मारते, तो किसीको थप्पड़ मारते॥१६३-१६४॥ ये नयन देखिते अश्रु हय मने यार। सेइ नेत्रे अविच्छिन्न बहे अश्रुधार॥१६५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मीनकेतन रामदासके नेत्रोंको देखते ही देखनेवालेके नेत्रोंसे स्वतः ही अश्रु बहने लगते, क्योंकि उनके नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुकी धारा बहती रहती थी। किसी अन्य संस्करणमें—'ये नयने देखिते' है अर्थात् जिसके मनमें इन नेत्रोंमें अश्रु देखनेकी इच्छा हो, उसके नेत्र भी अश्रु वहन करें॥१६५॥ पाँचवाँ अध्याय | ३१५