भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 356

[ ५/१५५-१६० श्रीकृष्ण ही स्वयंरूप, अन्य सब अवतार उनके अंश अथवा कला :- ब्रह्मसंहिता (५/३९)- रामादिमूर्त्तिषु कलानियमेन तिष्ठन् नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु। कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान यो गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ॥ १५५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १५५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अंश-कलारूपमें रामादि मूर्तियोंमें भगवान् जगत्में नाना अवतारोंको प्रकाश करते हैं, किन्तु जो परमपुरुष स्वयं श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट होते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ १५५॥ अनुभाष्य-यः परमः पुमान् कृष्णः कलानियमेन (अंशांशभावादिना) रामादिमूर्त्तिषु तिष्ठन् (तत्तन्नैमित्तिकावतारमूर्त्तीः प्रकटयन्) नानावतारम् अकरोत्, किन्तु स्वयं समभवत्, तं गोविन्दम् आदिपुरुषम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १५५ ॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा ही नामप्रेम-प्रचाररूप श्रीगौरवाञ्छा-पूर्ण :- श्रीचैतन्य-सेइ कृष्ण, नित्यानन्द-राम। नित्यानन्द पूर्ण करे चैतन्येर काम ॥ १५६॥ नित्यानन्द-महिमा-सिन्धु अनन्त, अपार। एक कणा स्पर्शि मात्र,-से कृपा ताँहार ॥ १५७॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु ही स्वयं श्रीकृष्ण हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीबलराम हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीचैतन्य महाप्रभुकी सभी इच्छाओंको पूर्ण करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका समुद्र अनन्त और अपार है। उनकी कृपासे ही मैं उसके एक बिन्दुको स्पर्श कर सकता हूँ॥ १५६-१५७॥ अपने वृत्तान्तके द्वारा श्रीनित्यानन्द-कृपा-महात्म्य-वर्णन :- आर एक शुन ताँर कृपार महिमा। अधम जीवेर यैछे चड़ाइल ऊर्ध्वसीमा ॥ १५८॥ वेदगुह्य कथा एइ अयोग्य कहिते। तथापि कहिये ताँर कृपा प्रकाशिते ॥ १५९॥ उल्लास-उपरि लेखौं तोमार प्रसाद। नित्यानन्द प्रभु, मोर क्षम अपराध ॥ १६०॥ अनुवाद-उनकी कृपाकी एक और महिमाको सुनो। उन्होंने इस अधम जीव (ग्रन्थकार) को ऊँचाईकी सीमातक चढ़ाया है। इस बातको लोगोंके सामने प्रकाशित करना उचित नहीं है, इसे वेदोंके समान गोपनीय रखना चाहिये। परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाको सबके समक्ष प्रकाशित करनेके लिये मैं इसे कह रहा हूँ। हे श्रीनित्यानन्द प्रभु! मैं उल्लसित होकर आपकी कृपाकी कथाको लिख रहा हूँ। मेरा यह अपराध आप क्षमा करें ॥ १५८-१६०॥ ३१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत