भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/१४२-१४५ ] ईश्वर-धारणाकी इन तीन वस्तुओंके नित्य अस्तित्वका संरक्षण नहीं कर सकते। और यदि ऐसा संरक्षण कर सकें, तो 'ब्रह्मणोरूपकल्पना' या 'पञ्चोपासना' की बात ही चूर्ण-विचूर्ण हो जायेगी। इसलिये पारमार्थिकगणोंने सुयुक्तिके द्वारा विचारपूर्वक इन पञ्चोपासक मायावादी लोगोंमें आस्तिकताके अभावको लक्ष्य करके इन्हें 'प्रच्छन्न नास्तिक' या 'बहु-ईश्वरवादी' या 'निरीश्वरवादी' आदि रूपोंमें संज्ञा प्रदान की है। एकमात्र शुद्धवैष्णव-धर्ममें ही एक परमेश्वर स्वीकृत हैं। वैष्णवधर्ममें नित्य परमेश्वर, नित्य परमेशित्व और नित्य परमैश्वर्य स्वीकृत है। वैष्णव लोग किसी कल्पित ईश्वर, मानव-रुचिसे सृष्ट ईश्वर या पुतलीको स्वीकार नहीं करते। क्योंकि परमेश्वर-स्वराट्, निरङ्कुश स्वेच्छामय, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र, अद्वितीय लीलापुरुषोत्तम, स्वयं-रूप हैं। जैसे गीतामें श्रीकृष्णने कहा है- “मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥”(७/७) “हे धनञ्जय ! अन्य कुछ भी मुझसे श्रेष्ठ नहीं है, धागेमें मणियोंके सदृश ही यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें पिरोया हुआ है।” “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥” (१०/८) “मैं सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ, मुझसे ही सभी कार्यमें प्रवृत्त होते हैं-इस प्रकार समझकर पण्डितगण भावयुक्त होकर मुझे भजते हैं।” भागवत (१/३/२८)- “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥” “पहले कहे गये समस्त अवतारोंमेंसे कोई-कोई पुरुषके अंशावतार, कोई कलावतार और कोई शक्त्यावेश अवतार हैं। प्रत्येक युगमें जब भी जगत् असुरोंसे पीड़ित होता है, तब असुरोंके उपद्रवसे जगत्की रक्षा करनेके लिए ये अवतार हुआ करते हैं। किन्तु, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण तो साक्षात् स्वयं-भगवान् (अवतारी) हैं।” भागवत (१०/१४/३२)- “अहो भाग्यमहो भाग्यम् नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्मसनातनम्॥” “परमानन्दस्वरूप, पूर्णब्रह्म, सनातन आप जिनके सुहृद और सगे-सम्बन्धी हैं, उन नन्द-गोपादि प्रमुख व्रजवासियोंका कैसा महाभाग्य है! कैसा धन्य भाग्य है?” ब्रह्मसंहिता (५/१)- “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥” “सच्चिदानन्दविग्रह श्रीगोविन्द कृष्ण ही परमेश्वर हैं। वे अनादि, सबके आदि और समस्त कारणोंके कारण हैं।” इन सभी प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं और अन्य सभी उनके दास पाँचवाँ अध्याय | ३११

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