भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 354

[ ५/१४२-१४९ हैं। परन्तु जो जीव स्वयंको भोक्ता मानते हैं, उनकी क्या गति होती है, इसे श्रीकृष्णने गीतामें सोलहवें अध्यायमें कहा है— “ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥ १४॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५॥ तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥” १९॥ “मैं ईश्वर, भोक्ता, सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ। मैं धनी और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है; मैं यज्ञ करूँगा, दान करूँगा और आनन्द प्राप्त करूँगा—वे अज्ञान द्वारा विमोहित होकर इस प्रकार कहते हैं। मैं साधुओंसे द्वेष करनेवाले, क्रूर और अशुभ कर्म करनेवाले तथा नराधम उन सबको संसारमें आसुरी योनियोंमें बार-बार निक्षेप करता हूँ (फेंकता हूँ)॥”१४२॥ श्रीगौरके दो अङ्ग—श्रीनिताइ और श्रीअद्वैत :— अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, —दुइ अङ्ग। दुइजन लञा प्रभुर यत किछु रङ्ग॥ १४६ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दोनों महाप्रभुके दो अङ्ग हैं, इन दोनोंको लेकर महाप्रभु अनेक प्रकारसे लीला करते हैं॥ १४६॥ अनुभाष्य—आदिलीला ३/७१ द्रष्टव्य है॥ १४६॥ महाविष्णुके अवतार होनेपर भी श्रीअद्वैतप्रभुका स्वयंमें श्रीगौरदास ज्ञानः— अद्वैत-आचार्य-गोसाञि साक्षात् ईश्वर। प्रभु-गुरु करि' माने, तिँहो त' किङ्कर ॥ १४७॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य साक्षात् ईश्वर हैं और महाप्रभु उन्हें अपने गुरुतुल्य मानते थे। किन्तु श्रीअद्वैताचार्य अपनेको महाप्रभुका दास मानते थे॥ १४७॥ अनुभाष्य—महाप्रभुका श्रीअद्वैताचार्यको गुरुवर्गोंमेंसे अन्यतम मानकर सम्मान करनेपर भी श्रीअद्वैतप्रभु अपनेको महाप्रभुका दास मानते थे। वे महाप्रभुके पिताजीके समवयस्क और बन्धु थे। वे और श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य थे। महाप्रभुने श्रीईश्वरपुरीजीसे दीक्षा ग्रहण की, इसलिये श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके गुरुके सतीर्थ (गुरुभाई) और गौरवके पात्र थे॥१४७॥ आचार्य-गोसाञिर तत्त्व ना याय कथन। कृष्ण अवतारिया यँहो तारिल भुवन ॥ १४८॥ अनुवाद—मैं श्रीअद्वैताचार्यके तत्त्वका वर्णन क्या करूँ, श्रीकृष्णको अवतीर्ण करवाकर उन्होंने जगत्का उद्धार किया है॥ १४८॥ कनिष्ठ लक्ष्मणारूपमें ज्येष्ठ श्रीरामचन्द्रकी सेवा फलसे श्रीकृष्णावतारमें श्रीबलराम ज्येष्ठ और श्रीकृष्ण कनिष्ठ भ्राता :— नित्यानन्द-स्वरूप पूर्वे हइया लक्ष्मण। लघुभ्राता हैया करे रामेर सेवन ॥ १४९॥ ३१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत