भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 352

[ ५/१४२-१४५ स्वयंरूप श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर :- एकला ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य। यारे यैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य॥ १४२॥ श्रीगौरसुन्दर ही परमेश्वर, उनके सम्बन्धी-सब उनके दास :- एइ मत चैतन्यगोसाञि एकला ईश्वर। आर सब परिषद, केह वा किङ्कर॥ १४३॥ गुरुवर्ग, - नित्यानन्द, अद्वैत आचार्य। श्रीवासादि, आर यत- लघु, सम, आर्य॥ १४४॥ सबे परिषद, सबे लीलार सहाय। सबा लञा निज-कार्य साधे गौर-राय॥ १४५॥ अनुवाद-एक मात्र श्रीकृष्ण ही ईश्वर हैं और सब उनके दास हैं। वे जिसको जिस प्रकार नचाते हैं, वह उसी प्रकार नृत्य करता है। इसी प्रकार चैतन्य महाप्रभु भी एकमात्र ईश्वर हैं और सब उनके पार्षद या दास हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य और श्रीवासादि गुरुवर्ग तथा अन्य भक्तोंमें कोई उनके समान, उनसे छोटे या बड़े हैं, वे सभी गौराङ्ग महाप्रभुके परिकर हैं और उनकी लीलामें सहायक हैं। इन सबको लेकर गौराङ्ग महाप्रभु अपनी लीला सम्पन्न करते हैं॥ १४२-१४५॥ अमृतानुकणिका-शुद्ध वैष्णव धर्म ही एकमात्र एक-परमेश्वर अङ्गीकारी है। अन्य वैष्णवधर्मकी विकृति और छाया-प्रतिबिम्ब-स्वरूप जितने भी तथाकथित धर्मके लोग मुखसे अपनेको एक-ईश्वरवादी कहनेपर भी कार्यतः बहु-ईश्वरवादी, निरीश्वरवादी, कल्पित ईश्वरवादी, मायावादी, भगवत्-वस्तुमें जड़ारोपवादी, मनुष्यमें देवारोप-कल्पनावादी आदि प्रच्छन्न नास्तिक और नास्तिक-सम्प्रदाय हैं। पञ्चोपासक सम्प्रदायवाले मुखसे अपनेको एकेश्वरवादी कहते हैं, परन्तु वे कल्पित पाँच देवताओंकी पूजा करते हैं। वे कल्पित विष्णु, शिव, शक्ति (दुर्गा), गणेश और सूर्य-इन पाँच देवताओंमेंसे अपनी रुचिके अनुसार किसी एक देवताको इष्टरूपमें वरण करके स्वयंको साधक कहकर उसकी पूजा करते हैं। उनका विचार है कि ये पाँच देवता अथवा बहु-देवता एक ईश्वरके ही प्रतीक हैं। किन्तु पञ्चदेवता, बहुदेवता अथवा कल्पित एक देवताको वे अन्तमें खण्डित करके किसी निर्विशेष भाव-विशेषमें परिणत करेंगे। हाँ यदि, कल्पित देवताविशेषको या निर्विशेषभाव-विशेषको एकेश्वर कहा जाय, तब पञ्चोपासकगणोंको 'एकेश्वरवादी' कह सकते हैं। किन्तु कल्पित ईश्वरकी या निर्विशेषभावकी ईशिताका परिचय कहाँ है? जो देवता ईशित्वयकी (पूजककी) इन्द्रिय-रुचि या कल्पनाके द्वारा नियमित होकर कल्पित रूप, स्वरूपादिको प्राप्त हुए हैं, जिस ईश्वरकी सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रता नहीं है, जो ईश्वर नित्यकाल अपने ऐश्वर्यका परिचय नहीं दे सकते अर्थात् नित्य सविशेषत्वका संरक्षण करनेमें असमर्थ हैं (निर्विशेष-सागरमें विसर्जनके बाद स्वभावतः ही उनका पूर्व कल्पित ऐश्वर्य लुप्त हो जाता है), उनका तब ईश्वरत्व कहाँ है? ईश्वर, ईशित्व और ऐश्वर्य-ये तीन वस्तुएँ जहाँ युगपत् नित्य अवस्थित होती हैं, वहीं ईश्वर कहनेकी सार्थकता है। पञ्चोपासक सम्प्रदाय ३१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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