श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/१३९-१४१ ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१३९॥ श्रीकृष्णकी योगमायाके दर्शनसे श्रीबलदेवका विस्मय :- श्रीमद्भागवत (१०/१३/३७)— केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी। प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी ॥१४०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह माया कौनसी है? दैवी, मानुषी या आसुरी? मेरे प्रभु कृष्णकी मायाके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी माया मुझे विमोहित करनेमें समर्थ नहीं है॥१४०॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने गोवत्सोंका हरण किया, तो श्रीकृष्ण पुनः गोवत्सादिको सृष्टिकर पहलेकी भाँति लीला करते रहे। श्रीबलदेव एक दिन गौओंकी विचित्र क्रियाको समझकर विस्मित हुए थे- इयं (माया) का? कुतः वा आयाता ? किं दैवी (देवसम्बन्धिनी), नारी (नरसम्बन्धिनी)? वा (उत) आसुरी (असुरसम्बन्धिनी)? प्रायः माया मे (मम) भर्तुः (स्वामिनः भगवतः एव) अस्तु, अन्या (माया) न, (यतः) इयं मे (मम) अपि विमोहिनी। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४०॥ श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें षडैश्वर्य नित्य विद्यमान :- श्रीमद्भागवत (१०/६८/३७)— यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिललोकपालै- र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासित-तीर्थतीर्थम्। ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः श्रीश्चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व ? ॥१४१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥१४१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-(श्रीबलदेव प्रभुने कहा) - सभी लोकपाल समस्त तीर्थोंकी तीर्थस्वरूप जिन कृष्णकी चरणधूलिको अपने मस्तकपर धारण करते हैं और ब्रह्मा, शिव, मैं बलदेव एवं लक्ष्मी-हम कोई उनके अंश अथवा अंशके अंशरूपमें जिनकी चरणधूलिको चिरकालसे धारण कर रहे हैं, उनके लिये साधारण राजसिंहासनका क्या महत्व है ? ॥१४१॥ अनुभाष्य-कौरवोंके द्वारा श्रीकृष्णकी निन्दाकर श्रीबलदेव प्रभुको अपने पक्षमें करनेके प्रयास करनेपर, श्रीबलदेव प्रभु रुष्ट होकर कौरवोंसे बोले- यस्य (कृष्णस्य) अंघ्रिपङ्कजरजः (पादपद्मरजः) अखिललोकपालैः (निखिलाधीश्वरैः) मौल्युत्तमैः (शिरोभूषणयुक्तैः उत्तमाङ्गैः) धृतं (धारण्या मनसि कृतम्), उपासिततीर्थतीर्थं (उपासितानि तीर्थानि यैः योगिभिः तेषाम् अपि तीर्थं) यस्य कलायाः कलाः (विकलाः) ब्रह्मा, भवः (शिवः) अहं (बलदेवः), श्री (लक्ष्मी च) अपि चिरं (चिरकालं) व्याप्य उद्वहेम (शिरसि उद्बोढुं प्रार्थयाम) अस्य (भगवतः कृष्णस्य) नृपासनं क्व (कुत्र)? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १४१ ॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०९