श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ५/१३४-१३९ विभिन्नरूपोंसे, विभिन्न-भावोंसे, श्रीनित्यानन्दरामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :- कभु गुरु, कभु सखा, कभु भृत्य-लीला। पूर्वे येन तिनभावे व्रजे कैल खेला ॥ १३५ ॥ वृष हञा कृष्णसने माखामाखि रण। कभु कृष्ण करे ताँर पाद-सम्वाहन ॥ १३६ ॥ आपनाके भृत्य करि' कृष्णे प्रभु जाने। कृष्णेर कलार कला आपनाके माने ॥ १३७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुके भी अनन्त प्रकाश हैं। वे महाप्रभुके प्रेममें विभोर होकर स्वयंको उनका दास कहते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके कभी गुरुके रूपमें, कभी सखाके रूपमें, तो कभी दासके रूपमें लीला करते हैं; जैसे पहले श्रीबलरामने श्रीकृष्णके साथ इन तीन भावोंसे व्रजमें लीला की थी। खेलते हुए साँड़के समान श्रीबलराम श्रीकृष्णके साथ सिरसे सिरको लगाकर लड़ाई करते हैं, तो कभी स्वयं श्रीकृष्ण श्रीबलरामके चरणोंकी सेवा करते हैं। तो भी श्रीबलराम स्वयंको दास मानकर श्रीकृष्णको अपना प्रभु मानते हैं। वे स्वयंको श्रीकृष्णकी कलाकी कलाके रूपमें मानते हैं ॥ १३४-१३७ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/११/४०)- वृषायमाणौ नर्दन्तौ युयुधाते परस्परम्। अनुकृत्य रुतैर्जन्तूंश्चेरतुः प्राकृतौ यथा ॥ १३८ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १३८ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कभी तो साधारण बालकोंकी भाँति साँड़ बनकर हँकड़ते हुए दोनों भाई युद्ध करते हैं, तो कभी हंस-मयूर आदिका अनुकरण करते हुए उनकी ध्वनि करते हैं ॥ १३८ ॥ अनुभाष्य-इन दो श्लोकोंमें श्रीकृष्ण-बलरामकी बाल्यक्रीड़ाका वर्णन है- वृषायमाणौ (वृषवदाचरन्तौ) नर्दन्तौ (तद्वच्छब्दायमानौ) [कृष्ण-बलदेवौ] परस्परं युयुधाते। रुतैः (आनुकरणिकशब्दैः) जन्तून् अनुकृत्य प्राकृतौ बालकौ यथा तथा चेरतुः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १३८ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/१५/१४)- क्वचित् क्रीड़ा-परिश्रान्तं गोपोत्सङ्गोपबर्हणम्। स्वयं विश्रामयत्यार्यं पादसम्वाहनादिभिः ॥ १३९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १३९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कभी-कभी खेलते-खेलते थक जानेपर श्रीकृष्ण किसी सखाकी गोदमें सिर रखकर स्वयं शयन करते हैं और कभी श्रीबलदेवजीको सखाकी गोदमें शयन करवाकर उनके चरणोंकी सेवा करते हैं ॥ १३९॥ अनुभाष्य-क्वचित् क्रीड़ापरिश्रान्तं (क्रीड़या परिश्रान्तं) गोपोत्सङ्गोपबर्हणं (गोपोत्सङ्गः उपबर्हणम् उपादानं यस्य तम्) आर्यम् (अग्रजं बलदेवं) पादसम्वाहनादिभिः (पादसेवनादिभिः) स्वयं (कृष्णः) विश्रामयति (विगतश्रमं करोति)। ३०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत