भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

५/१२६-१३४ ] नहीं है; सबके वचन सत्य हैं। श्रीकृष्ण सभी अंशोंके आश्रय हैं, इसलिये जब वे अवतीर्ण होते हैं, तब सभी अंश आकर उनमें मिल जाते हैं। जो श्रीकृष्णके जिस-जिस रूपको जानता है, वह वैसा ही कहता है। इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है, श्रीकृष्णमें सब कुछ सम्भव है॥ १२९-१३२॥ अनुभाष्य - 'श्रीकृष्ण क्षीरोदशायीके अवतार हैं', 'श्रीकृष्ण परव्योमपति नारायणके प्रथमव्यूह वासुदेवके अवतार हैं', 'श्रीकृष्ण नारायणके विलास हैं' आदि पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये लघुभागवतामृतमें (३६४ संख्यामें) श्रीरूप गोस्वामी श्रीमद्भागवतके ३/२/१५ श्लोकको उद्धृत करके कह रहे हैं- "अपने शान्तरूप अर्थात् वसुदेवादि भक्तोंको घोररूप कंसादि दैत्योंके द्वारा पीड़ित होते देखकर चित्-अचित्के ईश्वर परम-दयालु श्रीकृष्ण अजन्मा होकर भी वैकुण्ठनाथादि विलासके साथ युक्त होकर कृष्णलोकसे प्रपञ्चमें काष्ठमेंसे अग्निके समान प्रकट हुए।" श्रीकृष्णके व्यूह अपने विलास-परव्योमनाथके व्यूहके साथ एक होकर प्रपञ्चमें प्रादुर्भूत हुए। श्रीकृष्ण अपने प्रसिद्ध अवतार 'पुरुषादि', श्रीराम, नृसिंह, वराह, वामन, नर-नारायण, हयग्रीव और अजित आदिके साथ सदा मिलित होकर अवस्थान करते हैं। श्रीवृन्दावनमें भी श्रीकृष्णमें उन-उन अवतारादिकी लीलाएँ दिखलायी देती हैं। इसलिये ब्रह्माण्डपुराणमें कहा गया है— "जो वैकुण्ठमें चतुर्भुज हैं, जो श्वेतद्वीपके स्वामी हैं, जो नरके सखा नारायण हैं, वे ही पुरुषोत्तम नन्दनन्दन हैं। जैसे महाग्निसे लाखों चिङ्गारियाँ निकलकर पुनः उसीमें ही विलीन हो जाती हैं, वैसे ही श्रीकृष्णके अन्य-अन्य असंख्य मनोहर अवतार पुनः उन्हींमें मिलकर एक जाते हैं।" इसलिये पुराणादिमें श्रीकृष्णको कोई नरसखा नारायण, कोई उपेन्द्र अर्थात् वामन, कोई-कोई क्षीरोदशायी, कोई सहस्रशीर्षा गर्भोदशायी, कोई वैकुण्ठनाथके रूपमें कहते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण-स्वरूपमें अवस्थित मूलसङ्कर्षणसे इच्छामात्रसे प्रकटित बद्रीनाथादिरूप उन-उन लीलाओंका दर्शन करके उन-उन मुनियोंने उन-उन लीलाभेदयुक्त विष्णुचरितोंके अनुगामी होकर उन-उन विष्णुरूपोंमें श्रीकृष्णको ही अभिहित किया है। इसलिये मूल अवतारीको 'अवतार' कहनेपर भी तत्त्वतः कोई दोष नहीं होता। आदिलीला २/११०-११५ द्रष्टव्य है ॥ १२६-१३२॥ अतएव श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि। सर्व अवतार-लीला करि' सबारे देखाइ ॥ १३३॥ अनुवाद - इसलिये श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने सभी अवतारोंकी लीलाओंको करके सबको दिखलाया है॥ १३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इसलिये सर्वोच्च तत्त्व श्रीकृष्णचैतन्यने वराह-नृसिंहादि अवतार-लीला करके दिखलायी है॥१३३॥ एइरूपे नित्यानन्द अनन्त-प्रकाश । सेइभावे कहे- 'मुञि चैतन्येर दास' ॥ १३४॥ पाँचवाँ अध्याय | ३०७