भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/१२०-१२५ ] भी—जिसके द्वारा अन्तिम सीमा प्राप्त होती है अर्थात् जो सबके बाद अवशिष्ट रूपमें रहते हैं, उन्हें 'शेष' कहा जाता है। जैसे मूल वस्तुसे उसका अवशिष्ट अभिन्न है, वैसे ही वासुदेवसे शेषका अभेदांशत्व कहा गया है अथवा जिनसे उनकी शेष नामक ख्याति है, वे 'शेष' हैं। लघुभागवतामृत (संख्या १९)में रुद्रतत्त्वके प्रसङ्गमें श्रीबलदेवभूषणकी टीका— “शेषवदिति—शार्ङ्गिणः शय्यारूपस्तदाधार-शक्तिः शेष ईश्वरकोटिः, भूधारी तु तदाविष्टौ जीवः।” अर्थात् “शार्ङ्ग-धनुषधारी विष्णुके शय्यारूप आधार-शक्ति 'शेष' ईश्वरकोटि हैं और भूधारी 'शेष' शक्त्याविष्ट जीवकोटिके अन्तर्गत आते हैं।” पुनः श्रीरामतत्त्वके प्रसङ्ग (संख्या २८)में— “सङ्कर्षणो द्वितीयो यो व्यूहो राम स एव हि। पृथ्वीधरेण शेषेण संभूय व्यक्तिमीयिवान्॥ शेषो द्विविधा—महीधारी शय्यारूपश्च शार्ङ्गिणः। तत्र सङ्कर्षणावेशाद् भूभृत् सङ्कर्षणो मतः। शय्यारूपस्तथा तस्य सख्यदास्याभिमानवान्॥” अर्थात् “जो चतुर्व्यूहके द्वितीय-सङ्कर्षण हैं, वे भूधारी शेषके साथ मिलकर श्रीबलराम रूपमें अवतीर्ण हुए। भूधारी और भगवान्‌की शय्यारूप भेदसे 'शेष' दो रूपोंमें हैं। भूधारी 'शेष' सङ्कर्षणके आवेशावतार हैं, इसलिये उन्हें भी 'सङ्कर्षण' कहते हैं। जो शय्यारूप हैं, वे अपनेको भगवान्‌के दास और सखा रूपमें मानते हैं॥”१२०॥ वे सर्वक्षण श्रीकृष्णकीर्तनमें रत और चतुःसनके उपदेष्टा :— सहस्र-वदने करे कृष्णगुण गान। निरवधि गुण गान, अन्त नाहि पान॥१२१॥ सनकादि भागवत सुने याँर मुखे। भगवानेर गुण कहे, भासे प्रेमसुखे॥१२२॥ दस देहसे श्रीकृष्णसेवा :— छत्र, पादुका, शय्या, उपाधान, वसन। आराम, आवास, यज्ञसूत्र, सिंहासन॥१२३॥ शेष-नामका कारण :— एत मूर्त्तिभेद करि' कृष्णसेवा करे। कृष्णेर शेषता पाञा 'शेष' नाम धरे॥१२४॥ सेइ त' अनन्त, याँर कहि एक कला। हेन प्रभु नित्यानन्द, के जाने ताँर खेला॥१२५॥ अनुवाद—वे अपने हजारों मुखोंसे निरन्तर श्रीकृष्णके गुणोंको कीर्तन करते हैं, परन्तु वे उसका अन्त नहीं पाते हैं। सनकादि ब्रह्माके मानस पुत्र चतुःसन उनसे भागवत श्रवण करते हैं और वे भी श्रीकृष्णके प्रेमसुखमें डूबकर उनके गुणोंको दोहराते रहते हैं। अनन्त-शेष छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, विश्रामपीठ, आवास, यज्ञसूत्र और सिंहासन रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। इतने रूप धारणकर वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवाकी अन्तिम सीमातक पहुँचनेके कारण उनका नाम 'शेष' हुआ है। उन 'अनन्त'को जिनकी पाँचवाँ अध्याय | ३०५