भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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नहीं है। उनमें एकत्वके साथ ही पृथक् प्रकाश सम्भव है, जैसे श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धमें नारदजीकी उक्ति—'बड़े ही आश्चर्यका विषय है कि एक ही श्रीकृष्णने एक ही समयमें अलग-अलग गृहोंमें सोलह हजार रमणियोंका पाणिग्रहण किया है।' पृथकत्वमें भी एकरूपत्व है, जैसे पद्मपुराणमें—'वही निर्गुण, निर्दोष, आदिकर्त्ता, पुरुषोत्तमदेव हरि अनेक रूप होकर पुनः एक रूपमें शयन करते हैं।' एकका ही अंश-अंशित्व तथा विरुद्ध-शक्तित्व है, जैसे श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धमें—'आप बहुमूर्त्ति होकर भी एकमूर्त्ति हैं, इसलिये भक्तलोग आपमें आविष्टचित्त होकर आपकी पूजा करते हैं।' और कूर्मपुराणमें कहा गया है—'वे सभी प्रकारसे स्थूल होकर भी स्थूल, अनणु होकर भी अणु, अवर्ण होकर भी श्यामवर्ण और रक्ताक्तलोचन (दोनों छोरोंमें लालिमावाले नेत्रोंसे युक्त) हैं। ये सभी गुण परस्पर विरोधी होकर भी अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे भगवान्में नित्य अवस्थित हैं। तो भी परमेश्वरमें अनित्यत्व आदि किसी प्रकारके दोषारोपण करना उचित नहीं है, क्योंकि ये सभी गुण परस्पर विरोधी होनेपर भी भगवान्में सभी प्रकार इसका सामञ्जस्य हो सकता है।' जैसे छठे स्कन्धमें परस्पर विरुद्ध-अचिन्त्यशक्तिका वर्णन हुआ है—'हे भगवन्! आपकी अप्राकृत लीला या क्रीड़ा दुर्बोध दिखलायी देती है अर्थात् साधारण कार्य-कारण-भाव आपमें दिखलायी नहीं देता; क्योंकि आप बिना किसी आश्रय और शरीरकी चेष्टाके, स्वयं निर्गुण होकर हम लोगोंकी सहायताकी अपेक्षा ना करके अपने स्वरूपके द्वारा ही इस सगुण विश्वकी सृष्टि, स्थिति और संहार करके भी निर्विकार रहते हैं। हे प्रभो! क्या आप देवदत्त-नामक प्राकृत व्यक्तिकी भाँति इस संसारमें देव-असुरादि रूप गुणविसर्गमें पतित होकर पराधीनतावशतः अपने देवताकृत सुख-दुःखादि फलको अपना मानकर स्वीकार करते हैं? अथवा पूर्ण-चित्-शक्तिमान् रहकर आत्माराम और विरक्त होकर इन सभी विषयोंमें उदासीन अर्थात् साक्षीके रूपमें ही अवस्थान करते हैं? यह हम लोग नहीं जानते हैं। आप षडैश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और आपमें अनन्त दिव्य गुण हैं। आप सभीके शासनकर्त्ता हैं और आपका माहात्म्य किसीकी भी बुद्धिका विषय नहीं हो सकता। वस्तुके स्वरूपबोधक विकल्प, वितर्क, विचार, प्रमाणाभास और कुतर्करूपी जालसे अच्छादित शास्त्रोंके द्वारा जिनकी बुद्धि मोहित हो गयी है, उन वादिगणोंका विवाद जिनको स्पर्श करनेमें असमर्थ है, उन अचिन्त्य शक्तिशाली आपमें पहले वर्णित दोनों गुण ही अविरोधी हैं। समस्त प्राकृत ज्ञानसे अतीत केवल शुद्धज्ञानमय आपमें आपकी इच्छाशक्तिके द्वारा क्या विषय दुर्घट हो सकता है? निर्विशेष और सविशेष अथवा चित्-गुणमय और निर्गुण—ये आपके दो भिन्न स्वरूप नहीं हैं, अपितु भावना-भेदसे आपके एक ही स्वरूपकी दो प्रकारकी प्रतीतिमात्र है। जिनकी बुद्धिका विषय सर्प आदि है, उनको रस्सीका एक टुकड़ा सर्पादि भिन्न-भिन्न रूपोंमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार जिनकी बुद्धि सम है और जिनकी विषम अर्थात् अनिश्चित है, आप उनके अभिप्रायके अनुसार उनमें भिन्न-भिन्न मतवाद प्रकाशित करते हैं।' इति। इसी श्लोककी कारिका—शरीरकी चेष्टा, भूमि आदि आश्रय और दण्ड-चक्र आदिकी सहायताके बिना विकारशून्य आपके कर्म अतिशय दुर्गम हैं। 'गुण-विसर्ग' शब्दके द्वारा देवासुर संग्रामादि कहा गया है। उसमें भाग लेना अर्थात् उसमें आसक्त होनेको पराधीनता कहा जाता

२७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत