श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाम-पार्श्वे श्रीराधिका सखीगण-सङ्गे। रासादिक-लीला प्रभु करे कत रङ्गे ॥ २२० ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने इस अधमको श्रीगोविन्दके दर्शन कराये। इसे शब्दोंके द्वारा वर्णन करना अत्यन्त कठिन है और इसे प्रकाशित करना भी उचित नहीं है। वृन्दावनमें स्थित योगपीठमें कल्पवृक्षोंके वनमें एक रत्नमण्डप है। उस मण्डपमें रत्नसिंहासनपर ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीगोविन्द विराजमान होकर अपने माधुर्यको प्रकाशित करते हुए सारे जगत्को मोहित कर रहे हैं। उनके बाईं ओर श्रीराधिका अपनी सखियोंके साथ स्थित हैं। उनके साथ श्रीगोविन्द रासलीला और अनेक प्रकारकी लीलाओंका आस्वादन करते हैं॥ २१७-२२० ॥ ब्रह्माके उपास्य और अष्टादशाक्षर-मन्त्रके अभिधेय-देवता :- याँर ध्यान निज-लोके करे पद्मासन। अष्टादशाक्षर-मन्त्रे करे उपासन ॥ २२१ ॥ अनुवाद—ब्रह्मा अपने लोकमें कमल-आसनपर बैठकर सदा जिनका ध्यान करते हैं और अष्टादशाक्षर-मन्त्रके द्वारा जिनकी उपासना करते हैं॥ २२१ ॥ अनुभाष्य—पद्मासन ब्रह्मा अपने ब्रह्मलोकके निवासियोंके साथ अभिधेय-विग्रह श्रीगोविन्दमूर्तिका ध्यान करते हैं। चौदह भुवनोंके निवासियोंके ध्येय वे श्रीगोविन्द अष्टादशाक्षर-मन्त्रके द्वारा अर्चित होते हैं॥ २२१ ॥ चौद्दभुवने याँर सबे करे ध्यान। वैकुण्ठादि-पुरे याँर लीलागुण-गान ॥ २२२ ॥ याँर माधुरीते करे लक्ष्मी आकर्षण। रूपगोसाञि करियाछेन से-रूप वर्णन ॥ २२३ ॥ अनुवाद—चौदह भुवनोंमें सभी लोग जिनका ध्यान करते हैं, वैकुण्ठवासी भी जिनका गुण-गान करते हैं और जिनकी माधुरी लक्ष्मीको भी आकर्षित करती है, उनकी उस रूप-माधुरीका श्रीरूप गोस्वामीने वर्णन किया है॥ २२२-२२३ ॥ अनुभाष्य—आदिलीला, ४/१४७ में—“कृष्ण-माधुर्यरे एक स्वाभाविक बल। कृष्ण-आदि नरनारी करये चञ्चल॥” श्रीरूप गोस्वामीने लघुभागवतामृत (संख्या ३५१-३५२)में श्रीकृष्ण-माधुर्यके उत्कर्षके विषयमें पद्मपुराणके एक उपाख्यानका वर्णन किया है— “श्रीकृष्णका माधुर्य देखकर लक्ष्मीदेवीको उसमें लोभ हो गया और इसलिये तपस्या करते देखकर श्रीकृष्णने उनसे पूछा—‘तुम तपस्या क्यों कर रही हो?’ लक्ष्मीजीने कहा—‘मैं गोपीरूपसे वृन्दावनमें आपके साथ विहार करना चाहती हूँ।’ श्रीकृष्णने कहा—‘यह तो अत्यन्त दुर्लभ है।’ लक्ष्मीजी पुनः बोलीं—‘प्रभो! मैं स्वर्णरेखाके रूपमें आपके वक्षस्थलपर रहना चाहती हूँ।’ तब श्रीकृष्ण बोले—‘ऐसा ही हो।’ तबसे लक्ष्मीजी श्रीकृष्णके वक्षस्थलपर स्वर्णरेखाके रूपमें रह रही हैं।” श्रीमद्भागवत (१०/१६/३६) में नागपत्नियाँ श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए कह रही पाँचवाँ अध्याय | ३२५