भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 368

[ ५/२२३-२२६ हैं—'लक्ष्मीजी यद्यपि परमा सुन्दरी हैं, तो भी उन्होंने सब कामनाएँ त्यागकर आपके पदधूलीकी अभिलाषासे व्रत धारणकर बहुत समय तक तपस्या की थी॥'२२३॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२३९)— स्मेरां भङ्गीत्रय-परिचितां साचिविस्तीर्णदृष्टिं वंशीन्यस्ताधरकिशलयामुज्ज्वलां चन्द्रकेण। गोविन्दाख्यां हरितनुमितः केशीतीर्थोपकण्ठे मा प्रेक्षिष्ठास्तव यदि सखे बन्धुसङ्गेऽस्ति रङ्गः॥२२४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखे! यदि बन्धु-बान्धवोंका सङ्ग करनेके लिये तुम्हारा लोभ है, तो केशीघाटके निकट मन्द-मुस्कानयुक्त, त्रिभङ्ग मुद्रामें खड़े, बायीं ओर नेत्र-कटाक्ष करते, अधरकमलपर वंशीको धारण किये, किशलय (कोमल पत्तों) और मयूरपुच्छके द्वारा अत्यन्त शोभायमान श्रीगोविन्दकी श्रीमूर्तिके दर्शन नहीं करना। [तात्पर्य यह है कि श्रीगोविन्दकी श्रीमूर्तिका दर्शन करनेपर अन्यत्र वैराग्य उपस्थित होगा]॥२२४॥ अनुभाष्य—हे सखे! यदि तव बन्धुसङ्गे (पुत्रकलत्रादि-विषयिणां सङ्गे) रङ्ग (कौतूहलम्) अस्ति (विद्यते), तदा इतः (अस्मिन्) केशीतीर्थोपकण्ठे (यामुनतटस्थ-केशीतीर्थे) स्मेरां (स्मितान्वितां) भङ्गीत्रयपरिचितां (ग्रीवाकटिजानुभङ्गित्रयेण युक्तां) साचिविस्तीर्णदृष्टिं (तिर्यक्प्रशस्तावलोकनां) वंशीन्यस्ताधरकिशलयां (वंश्यां वेणौ न्यस्तः दत्तः अधर एव किशलयः नवपल्लवः यया तां) चन्द्रकेण (मयूरपिच्छेन) उज्ज्वलां (परमशोभामयीं) गोविन्दाख्यां हरितनुं (नन्दसूनुमूर्तिं) मा प्रेक्षिष्ठाः (अवलोकय, इति निषेधव्याजेन परमसौन्दर्याधारविग्रहम् अवश्यमेव द्रष्टव्यमभिप्रेतम्। तन्माधुर्ये अनुभूयमाने सर्वमेव तुच्छं मंस्यसे, तस्मादेनामेव पश्येत्यभिप्रायः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। यहाँ दर्शनका निषेध करनेका तात्पर्य है कि समस्त सौन्दर्यके आधार श्रीगोविन्दका अवश्य ही दर्शन करो। उस माधुरीको अनुभव करनेके बाद जगत्की सभी वस्तुएँ स्वतः ही तुच्छ लगेंगी, यही उस दर्शनका अभिप्राय है॥२२४॥ अप्राकृत श्रीविग्रहमें प्राकृत शिलाकाष्ठधातु-बुद्धि महापराध :— साक्षात् व्रजेन्द्रसुत, इत्थे नाहि आन। येबा अज्ञे करे ताँरे प्रतिमा-हेन ज्ञान॥२२५॥ सेइ अपराधे तार नाहिक निस्तार। घोर नरकेते पड़े, कि बलिब आर॥२२६॥ अनुवाद—निःसन्देह ये साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन हैं। जो मूर्ख है, वही उनको प्रतिमा मानता है। इस अपराधके कारण उसका उद्धार नहीं हो पाता है। और क्या कहूँ, वह अपराधी घोर नरकमें जाकर गिरता है॥२२५-२२६॥ अनुभाष्य—श्रीभक्तिसन्दर्भमें (२८६ संख्यामें)— “परमोपासकश्च साक्षात् परमेश्वरत्वेनैव तां पश्यन्ति। भेदस्फूर्तेर्भक्तिविच्छेदकत्वात् तथैव ह्युचितम्॥” ३२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत