भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 369

अर्थात् “परमोपासकगण श्रीमूर्तिको साक्षात् परमेश्वर मानकर ही उसका दर्शन करते हैं। भगवान्‌के साथ भगवान्‌की श्रीमूर्तिका भेदज्ञान होनेपर भक्तिका विच्छेद होता है, इस कारण श्रीमूर्त्तिमें साक्षात् भगवद्बुद्धि करना ही कर्त्तव्य है। भक्तिसे विच्युत होनेपर जीव अभक्त होकर अपराध करने लगता है।” “अर्च्ये विष्णौ शिलाधी-र्गुरुषु नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धि- र्विष्णोर्वा वैष्णवानां कलिमलमथने पादतीर्थेऽम्बुबुद्धिः। श्रीविष्णोर्नाम्नि मन्त्रे सकलकलुषहे शब्दसामान्यबुद्धि- र्विष्णो-सर्वेश्वरेशे तदितरसमधीर्यस्य वा नारकी सः॥” अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीमूर्त्तिमें शिला बुद्धि, वैष्णव और गुरुदेवमें मरणशील मानव बुद्धि, वैष्णवोंमें जाति बुद्धि, विष्णु और वैष्णवोंके चरण धौतजलमें जल बुद्धि तथा सर्वपापनाशक विष्णुनाम और मन्त्रमें सामान्य शब्द बुद्धि एवं सर्वेश्वर विष्णुमें अन्य देवताओंके साथ समान बुद्धि रखता है, वह नारकीय है।” पद्मपुराणके इस श्लोकके अनुसार श्रीविष्णुविग्रहको जड़-द्रव्योंसे बनी वस्तु अथवा 'प्रतीक' माननेवाले जीवको 'नारकी' कहा जाता है। निर्विशेषवादी लोग प्राकृतदृष्टियुक्त रहकर प्रेमनेत्रोंसे श्रीमूर्तिके दर्शनसे वञ्चित हो जाते हैं। इसलिये वैष्णव-विचारसे वे लोग 'अपराधी मायावादी' कहलाते हैं। श्रीमद्भागवत (१०/८४/१३)में “यस्यात्मबुद्धिः” श्लोकमें “भौम इज्यधीः” आदि भावविशिष्ट व्यक्ति अर्थात् जन्मभूमिमें ही उपास्य बुद्धि रखनेवालेको अनभिज्ञतावशतः भगवत्-सेवाधिकार प्राप्त नहीं होता॥२२५-२२६॥ हेन ये गोविन्द प्रभु, पाइनु याँहा हैते। ताँहार चरण-कृपा के पारे वर्णिते॥२२७॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी कृपाका कौन वर्णन कर सकता है, जिनके द्वारा मैंने ऐसे प्रभु श्रीगोविन्दको प्राप्त किया?॥२२७॥ श्रीनित्यानन्द-गौरके आश्रयमें श्रीराधागोविन्द-भजन ही वैष्णवता :— वृन्दावने वैसे यत वैष्णवमण्डल। कृष्णनाम-परायण, परम मङ्गल॥२२८॥ याँर प्राणधन-नित्यानन्द श्रीचैतन्य। राधाकृष्ण-भक्ति बिने नाहि जाने अन्य॥२२९॥ अनुवाद—वृन्दावनमें जितने वैष्णव वास करते हैं, वे सभी परम मङ्गलमय, श्रीकृष्णनाम-परायण हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीचैतन्य महाप्रभु उनके प्राणधन स्वरूप हैं। वे लोग श्रीराधाकृष्णकी भक्तिके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते हैं॥२२८-२२९॥ अनुभाष्य—श्रीवृन्दावनवासी सभी वैष्णव ही परममङ्गलमय, श्रीकृष्णनाम परायण और भक्तिके अङ्गोंमें कीर्त्तनाख्या भक्तिके आश्रित हैं। श्रीगौर-नित्यानन्द उनके प्राणधन हैं। श्रीराधाकृष्णकी नित्यसेवाके अतिरिक्त वे लोग अन्य किसी काल्पनिक भक्तिको नहीं जानते हैं। आजकल प्राचीन शुद्धभक्तोंकी भजन-प्रणालीको त्यागकर कुछ लोगोंने नये पन्थोंकी

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