भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

[ ५/२२८-२३२ कल्पना की है। किसीका कहना है—“श्रीगौराङ्ग राधाकृष्ण हों या ना हों, उनका गौर नाम ही हमें अच्छा लगता है, राधाकृष्ण नाममें हमारी वैसी रुचि नहीं है। हमारे लिये ‘नदीया-नागरी’ भावमें मधुर (सम्भोग)-रससे गौरकी उपासना ही ‘गौर-भक्ति’ है। नागरीभावसे गौरकी उपासना ना करनेपर श्रीगौराङ्गके स्वतन्त्र अवतारकी सार्थकता क्या है?” पूर्वकालमें ऐसे कुमत नहीं थे, परन्तु कलिके वृद्धिके साथ-साथ वैष्णवोंके कुछ गुटोंमें इस प्रकारके प्रबल भावोंको देखकर शुद्धभक्तोंके हृदयमें दुःख होता है। दुस्तर मायाके हाथोंकी कठपुतली होकर वे लोग श्रीगौराङ्गको श्रीराधाकृष्णकी अपेक्षा और भी कुछ बड़ा मानते हैं, अर्थात् ‘राधा एवं कृष्ण’ दोनोंका मिलित-तनु होनेके कारण श्रीगौराङ्ग अकेले श्रीकृष्णकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। अथवा कुछ लोग प्राकृत स्मार्त्त और पञ्चोपासक-समाजके विचारोंको ग्रहणकर श्रीगौर, श्रीगौरधाम, श्रीगौरशक्ति और श्रीगौरभक्तिके विरोधी होकर अपने प्राकृत ज्ञानके बलसे श्रीराधाकृष्ण-भजनकी कल्पना करते हैं। ये दोनों सम्प्रदाय ही षड्गोस्वामियोंके विशुद्धमतके विरोधी हैं, इसलिये वे भगवद्भक्तिविहीन, इन्द्रियपरायण, नास्तिक और कलिके दास हैं। सर्वदर्शी, सर्वज्ञ श्रीकविराज गोस्वामीने यह देख लिया था कि भविष्यमें ऐसे हरिविमुख दाम्भिक लोग अपनेको श्रीगौरसुन्दरका अत्यन्त प्रिय कहकर अपना परिचय देंगे और वास्तव श्रीगौर-वस्तुको विस्मृत होकर श्रीराधाकृष्णकी भक्तिको छोड़ देंगे। दुर्भागे जीवोंके साथ छल करनेके लिये वे अपनी कुवासनासे उत्पन्न निज-कल्पित श्रीगौराङ्गका बहुत आदर करेंगे। अधिक कहनेका प्रयोजन नहीं है, श्रीगान्धर्विका-गिरिधरके चरणयुगल ही वास्तवमें श्रीगौराङ्ग-पदाश्रितजनोंके एकमात्र आराध्य हैं॥ २२८-२२९॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे वैष्णव चरणकमलोंकी प्राप्ति :- से वैष्णवेर पदरेणु, तार पदछाया। अधमेरे दिल प्रभु-नित्यानन्द-दया॥ २३०॥ ‘ताँहा सर्व लभ्य हय’—प्रभुर वचन। सेइ सूत्र—एइ तार कैल विवरण॥ २३१॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुकी दयासे उन शुद्धवैष्णवोंकी चरणधूलि और चरणाश्रय इस अधमको प्राप्त हुए। श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा था कि ‘वहाँपर सब कुछ प्राप्त होगा’। इस सूत्रका मैंने यहाँपर विस्तृत रूपसे वर्णन किया है॥ २३०-२३१॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे सर्वाभीष्ट पूर्ण :- से सब पाइनु आमि वृन्दावन आय। सेइ सब लभ्य एइ प्रभुर कृपाय॥ २३२॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन आकर मैंने यह सब पाया है। यह सब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे ही सम्भव हुआ है॥ २३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘आय’—आकर॥ २३२॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये पञ्चम परिच्छेद। पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। ३२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत