भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 373

छठा अध्याय छठे अध्यायका कथासार-श्रीमद्-अद्वैताचार्य प्रभुका स्वरूप और महिमा दो श्लोकोंके विचारके द्वारा निरूपित हुए हैं। मायाकी दो वृत्तियाँ हैं-निमित्त और उपादान। प्रकृतिमें लक्षित निमित्त-कारणरूप पुरुषावतारका नाम 'महाविष्णु' है। उपादानरूप प्रधानतत्त्वमें महाविष्णुका द्वितीय स्वरूप ही 'श्रीअद्वैत' है। वे श्रीअद्वैत जगत्‌की सृष्टि आदि कार्योंके कर्त्ताविशेष हैं और उन्होंने भक्तभावको स्वीकार करके जगत्‌में भक्तिकी शिक्षा दी है। उन्हें श्रीचैतन्य महाप्रभुका दास कहनेसे उनकी महिमाकी ही वृद्धि होती है, क्योंकि अन्तर्भुक्त दास्यभावके अतिरिक्त किसी भी रसमें श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन नहीं किया जा सकता। (अमृतप्रवाह भाष्य) अद्वैताचार्यकी कृपासे तत्स्वरूपनिरूपणमें सामर्थ्य :- वन्दे तं श्रीमदद्वैताचार्यमद्भुतचेष्टितम्। यस्य प्रसादादज्ञोऽपि तत्स्वरूपं निरूपयेत् ॥ १॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपासे मूर्ख व्यक्ति भी उनके स्वरूपका निरूपण कर सकता है, उन अद्भुत चेष्टायुक्त श्रीमद्-अद्वैताचार्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य-यस्य (अद्वैतप्रभोः) प्रसादात् (अनुकम्पया) अज्ञः अपि तत्स्वरूपं (वस्तुतत्त्वं) निरूपयेत् (निरूपयितुं शक्नुयात्) तम् अद्भुतचेष्टितं (अद्भुतानि चेष्टितानि यस्य तं) श्रीमदद्वैताचार्यम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृताणुकणिका-उपासनाके द्वारा उन्होंने श्रीकृष्णचन्द्रको अवतीर्ण कराया, यही श्रीमद्-अद्वैताचार्यकी अद्भुत चेष्टा है॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥२॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमहाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु और श्रीमन्महाप्रभुके समस्त भक्तगण जययुक्त हों॥२॥ पञ्चश्लोके कहिल श्रीनित्यानन्द-तत्त्व। श्लोकद्वये कहि अद्वैताचार्येर महत्त्व ॥३॥ अनुवाद-पूर्व अध्यायमें पाँच श्लोकोंके द्वारा श्रीनित्यानन्द प्रभुका तत्त्व कहा गया था। अब दो श्लोकोंके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा कही जा रही है॥३॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें बारहवें और तेरहवें श्लोकोंकी व्याख्या :- श्रीस्वरूप गोस्वामी कड़चा- महाविष्णुर्जगत्कर्त्ता मायया यः सृजत्यदः। तस्यावतार एवायमद्वैताचार्य ईश्वरः ॥ ४॥