भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 374

[ ६/४-१० अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्यं भक्तिशंसनात्। भक्तावतारमीशं तमद्वैताचार्यमाश्रये ॥५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४-५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो महाविष्णु, मायाके द्वारा इस जगत्की सृष्टि करते हैं, वे जगत्-कर्त्ता हैं; ईश्वर श्रीअद्वैताचार्य उनके ही अवतार हैं। हरिसे अभिन्न तत्त्व होनेके कारण उनका नाम 'अद्वैत' और भक्ति-शिक्षक होनेके कारण वे 'आचार्य' कहलाते हैं, उन भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य ईश्वरको मैं आश्रय करता हूँ॥४-५॥ अनुभाष्य-यः जगत्कर्त्ता महाविष्णुः (निमित्तकारणमाश्रयः) मायया अदः (विश्वं) सृजति, तस्य अवतारः एव अयम् ईश्वरः (उपादानकारणाश्रयः) अद्वैताचार्यः। हरिणा (विष्णुतत्त्वेन सह) अद्वैतात् (भेदरहित्यात् हेतोः) 'अद्वैतं', भक्तिशंसनात् (भजनोपदेष्टृत्वात् हेतोः) 'आचार्यं', भक्तावतारम् ईशं तम् अद्वैताचार्यम् आश्रये (प्रपद्ये)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। महाविष्णु निमित्त-कारणके आश्रय हैं और श्रीअद्वैताचार्य उपादान-कारणके आश्रय हैं॥४-५॥ श्रीअद्वैतका तत्त्व और महिमा :- अद्वैत-आचार्य गोसाञि साक्षात् ईश्वर। याँहार महिमा नहे जीवेर गोचर॥६॥ महाविष्णुके अवतार :- महाविष्णु सृष्टि करेन जगदादि कार्य। ताँर अवतार साक्षात् अद्वैत आचार्य॥७॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं साक्षात् ईश्वर हैं, इसलिये उनकी महिमा जीवबुद्धिसे अगोचर है। महाविष्णु जगत्की सृष्टि आदि कार्य करते हैं। श्रीअद्वैताचार्य उनके साक्षात् अवतार हैं॥६-७॥ कारणार्णवशायीके अभिन्नांश :- ये पुरुष सृष्टि-स्थिति करेन मायाय। अनन्त ब्रह्माण्ड सृष्टि करेन लीलाय॥८॥ इच्छाय अनन्त मूर्ति करेन प्रकाश। एक एक मूर्त्तये करेन ब्रह्माण्डे प्रवेश॥९॥ से पुरुषेर अंश-अद्वैत, नाहि किछु भेद। शरीर-विशेष ताँर,-नाहिक विच्छेद॥१०॥ अनुवाद-जो पुरुष (महाविष्णु) अपनी बहिरङ्गा शक्तिके द्वारा जगत्की सृष्टि और पालन करते हैं तथा अपनी लीलामें असंख्य ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं, जो अपनी इच्छासे अपनी अनन्त मूर्तियोंको प्रकाश करके उनके द्वारा एक-एक ब्रह्माण्डमें प्रवेश करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य उन पुरुषके अंश हैं और उनसे अभिन्न हैं। वास्तवमें वे उनसे भिन्न नहीं हैं, वे केवल उनका ही विग्रह-विशेष हैं॥८-१०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-एक ही माया उपादान-अंशसे 'प्रधान' और निमित्तांशसे 'माया' है। ३३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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