श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/८-१२ ] महाविष्णु मायाकी इन दो वृत्तियोंमें दो रूपोंसे विराजमान हैं। महाविष्णु एक स्वरूपसे प्रकृतिमें स्थित होकर जगत्के निमित्त कारण हैं, वही विष्णुरूप है। दूसरे स्वरूपसे वे प्रधानमें स्थित होकर रुद्ररूपमें 'श्रीअद्वैत' हैं। इसलिये उन पुरुषसे श्रीअद्वैतका कुछ भी भेद नहीं है, केवल शरीरका भेद है॥१०॥ जगत्-उपादान प्रधानके अधिष्ठातृदेवता :- सहाय करेन ताँर लइया 'प्रधान'। कोटि ब्रह्माण्ड करेन इच्छाय निर्माण॥११॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य प्रधानको लेकर सृष्टिकार्यमें महाविष्णुकी सहायता करते हैं। वे अपनी इच्छासे उपादान रूपमें 'प्रधान'के द्वारा कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचनामें सहायता करते हैं॥११॥ मङ्गलमय श्रीअद्वैत :- जगत्-मङ्गल अद्वैत, मङ्गल-गुणधाम। मङ्गल-चरित्र सदा, 'मङ्गल' याँर नाम॥१२॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के मङ्गलस्वरूप हैं, क्योंकि वे सभी मङ्गलमय गुणोंके आधार हैं। उनका चरित्र अथवा लीला भी सदा सबके लिये मङ्गलमय है और उनका नाम भी 'मङ्गल' है अथवा उनका नाम ग्रहण करनेसे जीवका सब प्रकारसे मङ्गल होता है॥१२॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णु हैं और वे आचार्य हैं। विष्णुके सभी कार्य मङ्गलमय होते हैं। उनकी लीलाएँ मङ्गलमय हैं और उनमें माङ्गल्यका दर्शन करनेपर जीवका मङ्गल होता है। वे सभी मङ्गलके मूल हैं। उनका सेवोनमुख आचरण जगत्में सबके मङ्गलका विधान करता है। कुछ लोग कहते हैं कि श्रीअद्वैत प्रभुका दूसरा नाम 'मङ्गल' था। जगत्के जञ्जालमें फंसे लोग इस शुद्ध, नित्य, पूर्ण और मुक्त (सेवारूप) मङ्गलको ना समझकर आत्मवृत्ति 'भक्ति' से दूर हो जाते हैं। चिन्मयगुणशाली श्रीअद्वैताचार्यने कभी भी सकाम कर्मानुष्ठान अथवा निर्विशेष-मुक्तिलाभादि अमङ्गलका उपदेश नहीं किया। उनको अद्वय-विष्णुतत्त्व ना समझकर, भक्तिहीन और केवलाद्वैतवादि-ज्ञानसे जिन सभी मायामोहित असुरस्वभाव जीवोंने उनके अनुगमन करनेका दिखावामात्र किया था, अपनी मायाके द्वारा उनके स्वार्थ-पोषणरूपी छलके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यने उन अभक्तोंको जो दण्ड विधान किया, वह भी उनका मङ्गलाचरण ही था। विष्णुवस्तु अन्वय और व्यतिरेकभाव (अर्थात् पक्षपात और दण्ड), दोनोंके द्वारा जीवोंके मङ्गलका ही विधान करते हैं। अमङ्गलको मङ्गलके रूपमें प्रतिष्ठित करके विष्णुमायाके उपादानके मूल श्रीअद्वैताचार्यको नहीं जाना जा सकता। वे नैमित्तिक अवताररूपमें प्रकृतिमें उपादान-शक्तिका सञ्चार करते हैं। वे कोई अमङ्गलमय प्राकृत वस्तु नहीं हैं और वे अमङ्गलमय प्राकृत गुणोंके आश्रय नहीं हैं। उनके चरित्रका अनुकरण करनेसे ही जीवोंके मङ्गलका उदय होता है। उनका नाम श्रवण और कीर्तन करनेसे जीवोंके सब अमङ्गल विनष्ट हो जाते हैं। विष्णु-वस्तुमें किसी प्रकार अकल्याणकारी, खण्डित, निर्विशेष-धर्मका आरोप नहीं करना चाहिये। उनकी जो छठा अध्याय ३३३