श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६/१२-१५ वास्तविक सत्ता है, उस विषयमें अप्राकृत ज्ञान लाभ करनेपर ही जीवका परम मङ्गल होता है॥१२॥ असंख्य वैभव लेकर पुरुषके द्वारा सृष्टि :- कोटि अंश, कोटि शक्ति, कोटि अवतार। एत लञा सुजे पुरुष सकल संसार ॥१३॥ अनुवाद-आदिपुरुष महाविष्णु करोड़ों अंशों, करोड़ों शक्तियों और करोड़ों अवतारोंको लेकर इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं॥१३॥ मायाके दो रूप :- माया यैछे दुइ अंश—'निमित्त', 'उपादान'। 'माया'—निमित्त-हेतु, उपादान—'प्रधान' ॥ १४॥ दो मूर्तियोंसे कारणोदशायीके द्वारा सृष्टि :- पुरुष ईश्वर ऐछे द्विमूर्त्ति हइया। विश्व-सृष्टि करे 'निमित्त', 'उपादान' लञा ॥ १५॥ अनुवाद-मायाके जैसे दो अंश 'निमित्त' और 'उपादान' हैं, जिसमें गुणमयी माया 'निमित्त' है और 'प्रधान' उपादान। वैसे ही पुरुष अर्थात् महाविष्णु 'निमित्त' और ईश्वर अर्थात् श्रीअद्वैत 'उपादान'-दो रूप धारण करते हैं॥१४-१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार प्रकृतिमें 'निमित्त' और 'उपादान'-दो भाग होते हैं, उसी प्रकार पुरुष, 'महाविष्णु' रूपमें निमित्त और 'अद्वैत' रूपमें उपादान-ये दो मूर्तियाँ होकर विश्वकी सृष्टि करते हैं॥१५॥ अनुभाष्य-मध्य, २०/२७१ पयार द्रष्टव्य है। इस जगत्के मूलकारणके निर्णय करनेमें दो प्रकारकी विचार प्रणालियाँ दिखायी देती हैं। एक प्रकारका मत यह है—'सच्चिदानन्द-वस्तुसे गौणरूपमें इस जगत्की सृष्टि हुई है और मुख्यरूपमें परिकर-सहित गोलोक-वैकुण्ठादिका प्रकाश हुआ है।' दूसरा मत यह है-'असत्, अचित् और निरानन्द जगत्का मूल दुर्ज्ञेय, अव्यक्त और वस्तु-अभाव है।' प्रथम मत वेदोंके चरमफल वेदान्तमें व्यक्त है; और सांख्यादि स्मृतियोंने वस्तुवादके विरोधके उद्देश्यसे उसके विपरीत दूसरे मतको प्रकाश किया है। इस जगत्में अधिकांश ही अचित्की प्रतीति होती है। प्राणियोंमें जो चिदाभास-धर्म है, वह गुणमाया-रचित विश्वके साथ संलग्न है और उस प्रकार चेतनधर्म भी प्रकृतिके गुणोंसे उत्पन्न हुआ है-इस विचारसे उपादान-कारणके विषयमें कोई-कोई वेदान्त-मतके साथ भेद स्थापित करते हैं। सर्वकारण-कारण मूल वस्तु अर्थात् भगवान् ही शक्तिमान्-तत्त्व हैं और शक्ति भी शक्तिमान्में अवस्थित है। यह जगत् जिस प्रकारकी शक्तिसे प्रकट हुआ है, उससे भिन्न शक्तिसमूह भी उस बृहद्-पालक वस्तुमें नित्य अवस्थित है। जो लोग जगत्के विषयोंकी सेवामें आबद्ध हैं, वे जागतिक शक्तिकी उपलब्धि करके उसे ही केवल शक्तिमान् कहकर भगवान् मान लेते हैं। वे ऐसा अपसिद्धान्त करते हैं—एकमात्र शक्तिसे ही शक्तिमान्की उत्पत्ति होती है और खण्ड-शक्तिमान् वस्तुओंको प्राकृत ज्ञानसे अखण्ड-शक्तिमान् (भगवान्) मानकर उसे प्रकृतिसे ३३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत